ऐ मिरे बे-दर्द शहर

By ahmad-farazJanuary 18, 2024
दिल सुलग उठता है अपने बाम-ओ-दर को देख कर
फैलने लगती हैं जब भी शाम की परछाइयाँ
इस क़दर वीरान लम्हे इस क़दर सुनसान रात
सोच में गुम हैं उफ़ुक़ से ता-उफ़ुक़ पहनाइयाँ


किस लिए रौशन करूँ दीवार-ओ-दर कोई तो हो
गुंग दीवारों में क्या हों अंजुमन-आराइयाँ
दूर हर शब जाग उठते हैं कई माह-ओ-नुजूम
आग भड़काती हैं संग-ओ-ख़िश्त की रा'नाइयाँ


रास्तों से ख़्वाब-गाहों तक मुसलसल मौज-ए-रंग
जिस तरह क़ौस-ए-क़ुज़ह की टूटती अंगड़ाइयाँ
ज़ख़्म-ए-नज़्ज़ारा लिए आँखों में चुप तकता रहा
गो मिरी नींदें भी मुझ से ले उड़ीं शहनाइयाँ


कल ज़रा सी देर चमके थे मिरे दीवार-ओ-दर
झिलमिला उट्ठी थीं मेरी रूह की गहराइयाँ
चंद लम्हों के लिए लौ दे उठा था इक चराग़
और दमक उट्ठी थीं कुछ लम्हे मिरी तन्हाइयाँ


आज इतना शोर क्यों है ऐ मिरे बेदर्द शहर
हर नज़र मेरी तरफ़ है इस क़दर रुस्वाइयाँ
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