ऐ मिरी हमदम-ओ-दम-साज़

By bazm-ansariFebruary 5, 2024
ऐ मिरी हमदम-ओ-दम-साज़ मिरी जान-ए-नफ़स
शोरिश-ए-बाद-ए-मुख़ालिफ़ से परेशाँ क्यों है
तेरे चेहरे की उदासी तिरे लहजे की थकन
ऐसा लगता है कोई टूट रहा हो जैसे


कह रही हैं तिरी जागी हुई बोझल आँखें
तेरे दिल पर कोई शब-ख़ून हुआ हो जैसे
इस क़दर गर्दिश-ए-दौराँ से हिरासाँ क्यों है
ऐ मिरी हमदम-ओ-दम-साज़ मिरी जान-ए-नफ़स


'इश्क़ में तीर-ए-मलामत तो नई बात नहीं
अहल-ए-दिल नावक-ए-दुश्नाम से कब डरते हैं
जिन के दामन पे नदामत का कोई दाग़ नहीं
वो जफ़ा-कारी-ए-इल्ज़ाम से कब डरते हैं


अपने ना-कर्दा गुनाहों पे पशेमाँ क्यों है
ऐ मिरी हमदम-ओ-दम-साज़ मिरी जान-ए-नफ़स
ये गिरानी-ए-शब-ए-हिज्र कहाँ तक आख़िर
तीरगी वक़्त के सैलाब से छट जाएगी


दिल पे जो कुछ भी गुज़रती है गुज़र जाने दे
जुरअत-ए-शौक़ से ये रात भी कट जाएगी
‘अज़्म-ए-रासिख़ है तो अंदेशा-ए-तूफ़ाँ क्यों है
ऐ मिरी हमदम-ओ-दम-साज़ मिरी जान-ए-नफ़स


शोरिश-ए-बाद-ए-मुख़ालिफ़ से परेशाँ क्यों है
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