दीवाली
By prem-pal-ashkJanuary 4, 2024
नूर के चश्मे 'इनायत कर दिए ज़ुल्मात ने
ज़िंदगी की एक इक कुल्फ़त मिटाने के लिए
सिर्फ़ पल-भर को ग़म-ए-जानाँ भुलाने के लिए
हर बरस आती है दीवाली 'अजब अंदाज़ से
लक्ष्मी का हो रहा है फिर से इस्तिक़बाल आज
साफ़-सुथरी दूध से धोई हर इक दीवार है
कोना कोना गोशा गोशा मतला’-ए-अनवार है
हो गए अफ़्सुर्दा चेहरे भी ख़ुशी से लाल आज
हम तवज्जोह दिल की दुनिया की तरफ़ देते नहीं
प्यार के दो बोल मीठे बोलना चाहें तो क्यों
दूसरों के ग़म की ख़ातिर हम भरें आहें तो क्यों
हम चराग़ों से कभी इक दर्स भी लेते नहीं
धन के मतवाले हैं हम हिर्स-ओ-हवस में चूर हैं
अस्ल में अपनी हक़ीक़त ही से कोसों दूर हैं
ज़िंदगी की एक इक कुल्फ़त मिटाने के लिए
सिर्फ़ पल-भर को ग़म-ए-जानाँ भुलाने के लिए
हर बरस आती है दीवाली 'अजब अंदाज़ से
लक्ष्मी का हो रहा है फिर से इस्तिक़बाल आज
साफ़-सुथरी दूध से धोई हर इक दीवार है
कोना कोना गोशा गोशा मतला’-ए-अनवार है
हो गए अफ़्सुर्दा चेहरे भी ख़ुशी से लाल आज
हम तवज्जोह दिल की दुनिया की तरफ़ देते नहीं
प्यार के दो बोल मीठे बोलना चाहें तो क्यों
दूसरों के ग़म की ख़ातिर हम भरें आहें तो क्यों
हम चराग़ों से कभी इक दर्स भी लेते नहीं
धन के मतवाले हैं हम हिर्स-ओ-हवस में चूर हैं
अस्ल में अपनी हक़ीक़त ही से कोसों दूर हैं
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