एहतिजाज

By noon-meem-danishJanuary 4, 2024
हवा जब तक मिरे इस जिस्म की दीवार को
बोसीदा छलनी की तरह
सूराख़-दर-सुराख़ कर लेती नहीं
मैं साँस लेने की कोई क़ीमत नहीं दूँगा


ये आँधी
जब तलक घर के अंधेरे सर्द कोने में
मुसलसल टिमटिमाती बूढ़ी बत्ती को
बुझा देती नहीं


मैं रौशनी के हाथ बै'अत के लिए
अपने ये सूखे हाथ
ऊपर न उठाऊँगा
नया सूरज तुलूअ' जब तक नहीं होगा


मैं गलियों आँगनों
कच्चे मकानों
शहर की वीरान सड़कों
और दीवारों पे तारीकी मलूँगा


तीरगी फैलाउँगा
सूरज नया सूरज
तुलूअ' जब तक नहीं होगा
मैं सारे कोसने


और गालियाँ
हर सुब्ह हवा के दोष पे रख कर
उसे पैग़ाम भेजूँगा
यहाँ जब लोग


तारीकी में घुट के मर रहे होंगे
हँसूँगा
कोसने दूँगा
कि मैं मरने से पहले


इक दफ़ा
बस इक दफ़ा जी भर के जीना चाहता हूँ
मैं कि जो सदियों पुराने घर के
तीरा कमरे में पैदा हुआ था


बे-हिस-ओ-मुर्दा
सियह जिस्म और ज़ख़्मी रूह के हमराह
मगर इस बार मैं मरने से पहले
हँसते सूरज की शु'आ'ओं में नहाना चाहता हूँ


जिस की ख़ातिर
शहर की गलियों
मकानों आँगनों
सड़कों दीवारों पर


मैं तारीकी बिछाता हूँ
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