एक ख़्वाहिश
By hafeez-aatishJanuary 3, 2024
ज़र्द पत्ते
बरहना पेड़ों की डालें
तक रही हैं आसमाँ
ख़ुश्क धरती पर दराड़ें पड़ गईं
प्यास की शिद्दत कि उफ़
लम्बे साए की तरह
ऊँचे पहाड़ों पर खड़ी
मुंतज़िर है ज़िंदगी की
और मैं इस ख़ुश्क धरती पर
एड़ी रगड़ कर ज़ोर से
फिर किसी चश्मे का ख़्वाहिश-मंद हूँ
बरहना पेड़ों की डालें
तक रही हैं आसमाँ
ख़ुश्क धरती पर दराड़ें पड़ गईं
प्यास की शिद्दत कि उफ़
लम्बे साए की तरह
ऊँचे पहाड़ों पर खड़ी
मुंतज़िर है ज़िंदगी की
और मैं इस ख़ुश्क धरती पर
एड़ी रगड़ कर ज़ोर से
फिर किसी चश्मे का ख़्वाहिश-मंद हूँ
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