फ़ैसला
By naseer-parwazJanuary 4, 2024
उजाले छीन लो मुझ से मुझे तारीकियाँ दे दो
बसीरत नक़्श-ए-बे-मा'नी
रिफ़ाक़त साया-ए-मुबहम
मैं अपने आप में टूटा हुआ पैकर
मुझे मंज़ूर अपनी ज़िंदगी से थक गया हूँ मैं
मिरी पहचान शायद खो गई अंजान राहों में
मैं अपने ज़ेहन की गहराइयों में बिखरा बिखरा मुज़्महिल लम्हा
मिरी आँखों ने अंधे ख़्वाब दिखलाए
चमकती रेत को दरिया कहा मैं ने
सुलगती धूप को साया कहा मैं ने
मैं नादाँ था कि मैं ने मौसमों से अपना-पन माँगा
ये ख़ुशबू तो फ़क़त एहसास है और कुछ नहीं शायद
ये सूरज ये समुंदर ये हवा ये रौशनी सारी
नहीं मेरे लिए कुछ भी
कोई रिश्ता नहीं मेरा किसी से भी
अक़ाएद तजरबे झोंके हवाओं के
हर इक साया पराया है
हर इक उम्मीद झूटी है
मैं तन्हा ही चला था अपने घर से जब चला था मैं
रहा हूँ उम्र भर तन्हा
अकेला ही चला जाऊँगा इक लम्बे सफ़र पर मैं
किसी दिन देख लेंगे सब
न खुलवाओ ज़बाँ मेरी
लिखी है आँसूओं ने दास्ताँ मेरी
हर इक काविश गई है राएगाँ मेरी
नहीं ता'बीर कोई मेरे ख़्वाबों की
नहीं क़ीमत यहाँ मेरी किताबों की
पढ़ा किस ने मुझे आख़िर
लिखा है जिस क़दर मैं ने
मुझे लगता है सब धुँदली लकीरें हैं
यहाँ के सारे दानिश-वर यहाँ के सारे दीदा-वर
सभी अहल-ए-बसीरत अहल-ए-दिल मीनार अज़्मत के
मेरी सूरत तो क्या है नाम से वाक़िफ़ नहीं कोई
यही एहसाँ करो मुझ पर मिरे सब हर्फ़ झुटला दो
मुझे गुमनामियों में दफ़्न कर दो और इतराओ
बसीरत नक़्श-ए-बे-मा'नी
रिफ़ाक़त साया-ए-मुबहम
मैं अपने आप में टूटा हुआ पैकर
मुझे मंज़ूर अपनी ज़िंदगी से थक गया हूँ मैं
मिरी पहचान शायद खो गई अंजान राहों में
मैं अपने ज़ेहन की गहराइयों में बिखरा बिखरा मुज़्महिल लम्हा
मिरी आँखों ने अंधे ख़्वाब दिखलाए
चमकती रेत को दरिया कहा मैं ने
सुलगती धूप को साया कहा मैं ने
मैं नादाँ था कि मैं ने मौसमों से अपना-पन माँगा
ये ख़ुशबू तो फ़क़त एहसास है और कुछ नहीं शायद
ये सूरज ये समुंदर ये हवा ये रौशनी सारी
नहीं मेरे लिए कुछ भी
कोई रिश्ता नहीं मेरा किसी से भी
अक़ाएद तजरबे झोंके हवाओं के
हर इक साया पराया है
हर इक उम्मीद झूटी है
मैं तन्हा ही चला था अपने घर से जब चला था मैं
रहा हूँ उम्र भर तन्हा
अकेला ही चला जाऊँगा इक लम्बे सफ़र पर मैं
किसी दिन देख लेंगे सब
न खुलवाओ ज़बाँ मेरी
लिखी है आँसूओं ने दास्ताँ मेरी
हर इक काविश गई है राएगाँ मेरी
नहीं ता'बीर कोई मेरे ख़्वाबों की
नहीं क़ीमत यहाँ मेरी किताबों की
पढ़ा किस ने मुझे आख़िर
लिखा है जिस क़दर मैं ने
मुझे लगता है सब धुँदली लकीरें हैं
यहाँ के सारे दानिश-वर यहाँ के सारे दीदा-वर
सभी अहल-ए-बसीरत अहल-ए-दिल मीनार अज़्मत के
मेरी सूरत तो क्या है नाम से वाक़िफ़ नहीं कोई
यही एहसाँ करो मुझ पर मिरे सब हर्फ़ झुटला दो
मुझे गुमनामियों में दफ़्न कर दो और इतराओ
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