गुरेज़
By bazm-ansariJanuary 19, 2024
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
सोचता हूँ कि मोहब्बत की जहाँ क़द्र नहीं
जज़्ब-ए-दिल जज़्बा-ए-उल्फ़त की जहाँ क़द्र नहीं
ऐसे माहौल से बेहतर है किनारा कर लूँ
महफ़िलें छोड़ के तन्हाई गवारा कर लूँ
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
जिस को मा'लूम नहीं प्यार की मंज़िल क्या है
जिस को एहसास नहीं दर्द-भरा दिल क्या है
ऐसे बे-दर्द ज़माने के नज़ारों को सलाम
बेवफ़ा हुस्न की रंगीन बहारों को सलाम
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
अहल-ए-दिल कुश्ता-ए-उफ़्ताद-ए-ज़माना हों जहाँ
बा-वफ़ा तीर-ए-मलामत का निशाना हों जहाँ
ऐसी राहों में वफ़ाओं का गुज़र क्या मा'नी
इन ख़लाओं में मोहब्बत का सफ़र क्या मा'नी
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
कौन कहता है कि हालात बदल जाएँगे
कौन कहता है कि दिन-रात बदल जाएँगे
रूह एहसास के बोझों से दबी जाती है
ज़िंदगी दर्द के साँचे में ढली जाती है
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न
सोचता हूँ कि मोहब्बत की जहाँ क़द्र नहीं
जज़्ब-ए-दिल जज़्बा-ए-उल्फ़त की जहाँ क़द्र नहीं
ऐसे माहौल से बेहतर है किनारा कर लूँ
महफ़िलें छोड़ के तन्हाई गवारा कर लूँ
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
जिस को मा'लूम नहीं प्यार की मंज़िल क्या है
जिस को एहसास नहीं दर्द-भरा दिल क्या है
ऐसे बे-दर्द ज़माने के नज़ारों को सलाम
बेवफ़ा हुस्न की रंगीन बहारों को सलाम
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
अहल-ए-दिल कुश्ता-ए-उफ़्ताद-ए-ज़माना हों जहाँ
बा-वफ़ा तीर-ए-मलामत का निशाना हों जहाँ
ऐसी राहों में वफ़ाओं का गुज़र क्या मा'नी
इन ख़लाओं में मोहब्बत का सफ़र क्या मा'नी
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न कर
कौन कहता है कि हालात बदल जाएँगे
कौन कहता है कि दिन-रात बदल जाएँगे
रूह एहसास के बोझों से दबी जाती है
ज़िंदगी दर्द के साँचे में ढली जाती है
उन से मिलने की तमन्ना दिल-ए-बेताब न
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