न तुम क़रीब आओ
By bano-tahira-sayeedJanuary 2, 2024
मिरे ख़याल पे जैसे कि छा गए हो तुम
दिल-ओ-निगाह में गोया समा गए हो तुम
इक अजनबी हो मगर पास आ गए हो तुम
न जाने कौन सा जादू जगा गए हो तुम
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
तुम्हारी साँवली सूरत में शाम-ए-हिज्राँ है
उदास आँखों में कुछ वहशत-ए-ग़ज़ालाँ है
लबों पे शिकवा-ए-ख़ामोश रंज-ए-दौराँ है
क़रीब-ए-दिल मिरे जैसे कोई ग़ज़ल-ख़्वाँ है
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
मैं ख़ुद हूँ आबला-पा कम-नसीब ख़ाक-बसर
है मेरी बज़्म फ़रोज़ाँ ब-फ़ैज़-ए-दाग़-ए-जिगर
भला कहाँ मैं कहाँ फ़ुर्सत-ए-फ़रेब-ए-नज़र
है फिर भी ख़्वाहिश-ए-दीदार और दीदा-ए-तर
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
ये क़ुर्ब-ए-रूह भी कितना 'अजब मु'अम्मा है
सुकून-ए-दिल भी है और दर्द-ए-बे-मुदावा है
किसी जनम की मोहब्बत का क्या ये तोहफ़ा है
कि ख़्वाब में भी ज़बाँ पर तुम्हारा क़िस्सा है
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
दिल-ओ-निगाह में गोया समा गए हो तुम
इक अजनबी हो मगर पास आ गए हो तुम
न जाने कौन सा जादू जगा गए हो तुम
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
तुम्हारी साँवली सूरत में शाम-ए-हिज्राँ है
उदास आँखों में कुछ वहशत-ए-ग़ज़ालाँ है
लबों पे शिकवा-ए-ख़ामोश रंज-ए-दौराँ है
क़रीब-ए-दिल मिरे जैसे कोई ग़ज़ल-ख़्वाँ है
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
मैं ख़ुद हूँ आबला-पा कम-नसीब ख़ाक-बसर
है मेरी बज़्म फ़रोज़ाँ ब-फ़ैज़-ए-दाग़-ए-जिगर
भला कहाँ मैं कहाँ फ़ुर्सत-ए-फ़रेब-ए-नज़र
है फिर भी ख़्वाहिश-ए-दीदार और दीदा-ए-तर
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
ये क़ुर्ब-ए-रूह भी कितना 'अजब मु'अम्मा है
सुकून-ए-दिल भी है और दर्द-ए-बे-मुदावा है
किसी जनम की मोहब्बत का क्या ये तोहफ़ा है
कि ख़्वाब में भी ज़बाँ पर तुम्हारा क़िस्सा है
ख़ुदा के वास्ते इतना न तुम क़रीब आओ
32393 viewsnazm • Hindi