प्यास

By prem-pal-ashkJanuary 4, 2024
ज़माने में हमेशा तिश्नगी ही काम आती है
इसी से आबरू-ए-मय-कदा की आब है क़ाएम
इसी के दम से सरशारी-ओ-मय-ख़्वारी रहे दाइम
इसी से रिंद की रिंदी भी रंगीं जाम पाती है


'इबादत रंग में आए सदा तिश्ना-लबी ही से
इसी के दम से हुस्न-ए-मा'रिफ़त भी होता है हासिल
इसी से फ़ैज़ पाते हैं ज़माने के सभी वासिल
इसी से फ़ैज़ पाते हैं ज़माने के सभी वासिल


मिलें मशहूद और शाहिद हमेशा तिश्नगी ही से
इसी की कैफ़ियत से दिल पे आता है नया जोबन
इसी के दम से रंगीं तितलियाँ फूलों पे मरती हैं
इसी पर हुस्न वालों की अदाएँ रक़्स करती हैं


इसी से 'इश्क़ वालों के कटे हैं सब कड़े बंधन
बुझा दी प्यास ही तू ने तू कैसा है मिरा साक़ी
न मरने की तमन्ना है न जीने की हवस बाक़ी
65500 viewsnazmHindi