यादें
By bazm-ansariFebruary 5, 2024
महफ़ूज़ हैं यादों में अभी तक वो ब-तदरीज
दोहराता है अब तक वो फ़साने दिल-ए-नाकाम
आग़ाज़-ए-मोहब्बत के वो बीते हुए लम्हात
वो हश्र-ब-दिल सा’अत-ए-दीदार का हंगाम
वो सर्व-ओ-सनोबर की तरह क़ामत-ए-ज़ेबा
सीमाब की मानिंद वो रफ़्तार का 'आलम
लहजे में वो अंदाज़ नसीम-ए-सहरी का
वो फूल की सूरत लब-ओ-रुख़्सार का 'आलम
है याद तुझे भी कि नहीं ऐ मिरी महबूब
जब बाम से उतरा था तिरे हुस्न का ख़ुर्शीद
वो अर्ज़-ए-तमन्ना पे तिरे दिल का धड़कना
वो नीची नज़र से मिरे जज़्बात की ताईद
वो वक़्त भी है याद हम-आहंग थे दो दिल
ख़ामोश निगाहों से था इक़रार वफ़ा का
आया नहीं गो लफ़्ज़ मोहब्बत का ज़बाँ पर
हर बात से होने लगा इज़हार वफ़ा का
फिर तुझ से जुदा हो के गुज़ारे हैं वो दिन भी
वो भी दिल-ए-बेताब ने देखे हैं ज़माने
क्या क्या तिरे दीदार को तरसी हैं निगाहें
क्या क्या न मुलाक़ात के ढूँडे हैं बहाने
तन्हाई में हर शब वो सजाई हुई महफ़िल
वो तेरे तसव्वुर में गुज़ारी हुई रातें
ख़ुशबू का तिरी ज़िक्र-ए-हसीं बाद-ए-सबा से
वो चाँद सितारों से तिरे हुस्न की बातें
फिर दम से तिरे ये दिल-ए-वीराँ हुआ आबाद
फिर तेरी रिफ़ाक़त ने कई छेड़ दिए साज़
दुनिया को मगर कब थी गवारा ये रिफ़ाक़त
अब दाग़-ए-जुदाई है फ़क़त हमदम-ओ-दम-साज़
दिल आज टटोला है तो ये 'उक़्दा खुला है
सच ये है कि मैं ने तुझे चाहा ही नहीं था
कुछ इस में मिरा ज़ौक़-ए-परस्तिश भी था शामिल
पूजा था तुझे सिर्फ़ सराहा ही नहीं था
दोहराता है अब तक वो फ़साने दिल-ए-नाकाम
आग़ाज़-ए-मोहब्बत के वो बीते हुए लम्हात
वो हश्र-ब-दिल सा’अत-ए-दीदार का हंगाम
वो सर्व-ओ-सनोबर की तरह क़ामत-ए-ज़ेबा
सीमाब की मानिंद वो रफ़्तार का 'आलम
लहजे में वो अंदाज़ नसीम-ए-सहरी का
वो फूल की सूरत लब-ओ-रुख़्सार का 'आलम
है याद तुझे भी कि नहीं ऐ मिरी महबूब
जब बाम से उतरा था तिरे हुस्न का ख़ुर्शीद
वो अर्ज़-ए-तमन्ना पे तिरे दिल का धड़कना
वो नीची नज़र से मिरे जज़्बात की ताईद
वो वक़्त भी है याद हम-आहंग थे दो दिल
ख़ामोश निगाहों से था इक़रार वफ़ा का
आया नहीं गो लफ़्ज़ मोहब्बत का ज़बाँ पर
हर बात से होने लगा इज़हार वफ़ा का
फिर तुझ से जुदा हो के गुज़ारे हैं वो दिन भी
वो भी दिल-ए-बेताब ने देखे हैं ज़माने
क्या क्या तिरे दीदार को तरसी हैं निगाहें
क्या क्या न मुलाक़ात के ढूँडे हैं बहाने
तन्हाई में हर शब वो सजाई हुई महफ़िल
वो तेरे तसव्वुर में गुज़ारी हुई रातें
ख़ुशबू का तिरी ज़िक्र-ए-हसीं बाद-ए-सबा से
वो चाँद सितारों से तिरे हुस्न की बातें
फिर दम से तिरे ये दिल-ए-वीराँ हुआ आबाद
फिर तेरी रिफ़ाक़त ने कई छेड़ दिए साज़
दुनिया को मगर कब थी गवारा ये रिफ़ाक़त
अब दाग़-ए-जुदाई है फ़क़त हमदम-ओ-दम-साज़
दिल आज टटोला है तो ये 'उक़्दा खुला है
सच ये है कि मैं ने तुझे चाहा ही नहीं था
कुछ इस में मिरा ज़ौक़-ए-परस्तिश भी था शामिल
पूजा था तुझे सिर्फ़ सराहा ही नहीं था
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