बच्चों की कहानियों शायरी

बच्चों की कहानियों पर जादूगर शायरी

भविष्य की शानदार कहानियों से प्रेरित एक प्यारी शायरी संग्रह का आनंद लें। इन बंदों में वो कहानी और जादू छिपे होते हैं जो बच्चों को सुनाने के लिए होती हैं, जिन्हें कवितात्मक शब्दों में व्यक्त किया गया है।

अब्बा जान भी बच्चों की तरह कहानियाँ सुन कर हँस रहे थे कि किस तरह हम भी ऐसे ही नन्हे बच्चे बन जाएँ। न रह सके बोल ही उठे
भई हमें भी एक कहानी याद है कहो तो सुनाऊँ?
आहा जी आहा। अब्बा जान को भी कहानी याद है अब्बा जान भी कहानी सुनाएँगे। सुनाइए अब्बा जान। अब्बा जान सुनाइए ना?
अब्बा जान ने कहानी सुनानी शुरू की



किसी शहर में एक था बादशाह
मगर बादशाह था बहुत ही ग़रीब
हमारा तुम्हारा ख़ुदा बादशाह


न आता था कोई इसके क़रीब
बादशाह और ग़रीब सब बच्चे सोचने लगे कि बादशाह ग़रीब भी हो सकता है या नहीं? शायद होता हो अगले ज़माने में अब्बा सुना रहे थे।
किए एक दिन जमा उसने फ़क़ीर
खिलाई उन्हें सोने चाँदी के खीर


फ़क़ीरों को फिर जेब में रख लिया
अमीरों वज़ीरों से कहने लगा
कि आओ चलें आज खेलें शिकार
क़लम और काग़ज़ की देखें बहार


मगर है समुंद्र का मैदान तंग
करे किस तरह कोई मच्छर से जंग
तो चिड़िया ये बोली कि ऐ बादशाह
करूँगी मैं अपने चिड़े का ब्याह


मगरमच्छ को घर में बुलाऊँगी मैं
समुंद्र में हरगिज़ न जाऊँगी मैं
अब्बा जान ने अभी इतनी ही कहानी सुनाई थी कि सब हैरान हो होकर एक दूसरे का मुँह तकने लगे। भाई जान से रहा न गया कहने लगे ये तो अजीब बे-माना कहानी है जिसका सर न पैर।
अब्बा जान बोले


क्यों भई कौन सी मुश्किल बात है जो तुम्हारी समझ में नहीं आई।
मँझले भाई ने कहा
समझ में आती है पता नहीं चलता।
ये सुन कर सब हँस पड़े


ख़ूब भई ख़ूब। समझ में आती है पता नहीं चलता। आपा ने कहा।
अब्बा जान। बादशाह ग़रीब था तो इसने फ़क़ीरों को बुला कर सोने-चाँदी की खीर कैसे खिलाई और फिर उनको जेब में रख लिया मज़ा ये कि बादशाह के पास कोई आता भी नहीं था। ये अमीर वज़ीर कहाँ से आ गए। शिकार में क़लम और काग़ज़ की बहार का क्या मतलब है और फिर लुत्फ़ ये कि समुंद्र का मैदान और ऐसा तंग कि वहाँ मच्छरे से जंग नहीं हो सकती। फिर बीच में ये बी चिड़िया कहाँ से कूद पड़ीं जो अपने चिडे का ब्याह करने वाली हैं। मगरमच्छ को अपने घोंसले में बुलाती हैं और समुंद्र में नहीं जाना चाहतीं।
नन्ही बोली
तौबा-तौबा आपा जान ने तो बखेड़ा निकाल दिया। ऐसी अच्छी कहानी अब्बा जान कह रहे हैं। मेरी समझ में तो सब कुछ आता है। सुनाइए अब्बा जान। फिर क्या हुआ?


अब्बा जान ने कहा
बस नन्ही मेरी बातों को समझती है...
हुआ ये कि



सुनी बात चिड़िया की घोड़े ने जब
वो बोला ये क्या कर रही है ग़ज़ब
मेरे पास दाल और आटा नहीं
तुम्हें दाल आटे का घाटा नहीं


ये सुनते ही कुर्सी से बनिया उठा
किया वार उठते ही तलवार का
वहीं एक मक्खी का पर कट गया
जुलाहे का हाथी परे हट गया


यहाँ सब बच्चे इतना हँसे कि हँसी बंद होने में न आती थी। लेकिन भाई जान ने फिर एतराज़ किया
ये कहानी तो कुछ ऊल-जलूल सी है
भई अब तो कुछ मज़ा आने लगा है। मँझले भाई ने कहा।
ख़ाक मज़ा आ रहा है नन्ही ने कहा तुम तो सब कहानी को बीच में काट देते हो। हाँ अब्बा जान जुलाहे का हाथी डर कर परे हट गया होगा तो फिर क्या हुआ?


अब्बा ने कहा
नन्ही अब बड़ा तमाशा हुआ कि

मचाया जो गेहूँ के अंडों ने शोर


किसके इंडों ने? गेहूँ के तो क्या गेहूँ के भी अंडे होते हैं?
भई मुझे क्या मालूम... कहानी बनाने वालों ने यही लिखा है?
ये कहानी किसने बनाई है?
हफ़ीज़ साहब ने।


अब्बा अब मैं समझा आगे सुनाइए।’’ अब्बा जान आगे बढ़े।
मचाया जो गेहूँ के अंडों ने शोर
लगा नाचने साँप की दुम पे मोर
खड़ा था वहीं पास ही एक शेर


बहुत सारे थे उसकी झोली में बेर
करेला बजाने लगा उठ के बैन
लिए शेर से बैर चुहिया ने छीन
चुहिया ने शेर से बेर छीन लिए। जी हाँ बड़ी ज़बरदस्त चुहिया थी ना। अब बच्चों को मालूम हो गया था कि अब्बा जान हमारी समझ आज़माने के लिए कहानी सुना रहे हैं।


और तू ये करेले ने बैन अच्छी बजाई अम्मी जान हँसते हुई बोलीं। नन्ही बहुत ख़फ़ा हो रही थी सिलसिला टूटता था तो उसको बुरा मालूम होता था। अब्बा जी कहिए-कहिए आगे कहिए आगे कहिए अब्बा जान...
अब्बा जान ने कहा
बेटी मैं तो कहता हूँ
ये लोग कहने नहीं देते।’’


हाँ क्या कह रहा था?
लिए शेर से बेर चुहिया ने छीन
ये देखा तो फिर बादशाह ने कहा
अरी प्यारी चिड़िया इधर को तो आ


वो आई तो मूँछों से पकड़ा उसे
हवा की कमंदों में जकड़ा उसे
बड़े भाई जान ने क़हक़हा मारा हह-हह हा-हा लीजिए बादशाह फिर आ गया और चिड़िया आ गई। चिड़िया भी मूँछों वाली मँझले भाई बोले
अब्बा जी ये हवा का कमंदें क्या होती हैं? अब्बा जान ने कहा


बेटे किताबों में उसी तरह लिखा है कमंद-ए-हवा चचा सा’दी लिख गए हैं।
आपा ने पूछा
अब्बा जी ये सा’दी के नाम के साथ चचा क्यों लगा देते हैं?
मगर नन्ही बहुत बिगड़ गई थी। उसने जवाब का वक़्त न दिया और मुँह बिसूरने लगी ओं-ओं कहानी ख़त्म कीजिए वाह सारी कहानी ख़राब कर दी अब्बा जान ने इस तरह कहानी ख़त्म की।


ग़रज़ बादशाह लाओ लश्कर के साथ
चला सेर को एक झींगुर के साथ
मगर राह में च्यूँटीयाँ आ गईं
चने जिस क़दर थे वो सब खा गईं


बड़ी भारी अब तो लड़ाई हुई
लड़ाई में घर की सफ़ाई हुई
अकेला वहाँ रह गया बादशाह
हमारा तुम्हारा ख़ुदा बादशाह


- hafeez-jalandhari


एक मोर था और एक था गीदड़। दोनों में मोहब्बत थी। दिनों की सलाह हुई कि चल कर बेर खाओ। वो दोनों के दोनों मिलकर चले किसी बाग़ में। वहाँ एक बेरी का दरख़्त था। जब उस दरख़्त के क़रीब पहुँचे। तो मोर उड़ कर उस दरख़्त पर जा बैठा। दरख़्त पर बैठ के पक्के-पक्के बेर तो आप खाने लगा और कच्चे-कच्चे बेर नीचे फेंकने लगा। गीदड़ ने कहा
या तो दोस्त पक्के-पक्के बेर दे। नहीं तो तू नीचे उतरेगा। तो मैं तुझे खा जाऊँगा। जब मोर का पेट भर गया। तो वो नीचे उतरा। गीदड़ ने उसे खा लिया।
जब उसे खा के आगे चला। तो एक बुढ़िया बैठे उपले चुन रही थी। जब उसके पास गया। तो उसे जा के कहा कि पक्के-पक्के बेर खाए अपना भाई मोर खाया। तुझे खाऊँ तो पेट भरे
बुढ़िया ने कहा जा परे! नहीं तो एक उप्ला मारूँगी। गीदड़ बुढ़िया को भी खा गया। आगे चला तो एक लकड़हारा लकड़ियाँ चीरता हुआ मिला। उससे कहा कि पक्के-पक्के बेर खाए। अपना भाई मोर खाया। उपले चुनती बुढ़िया खाई। तुझे खाऊँ तो पेट भरे उसने कहा परे हट! आगे चला तो मिला उसे एक तेली तेल तौल रहा था। उससे भी गीदड़ ने यूँ ही कहा कि पक्के-पक्के बेर खाए। अपना भाई मोर खाया। उपले चुनती बढ़िया खाई। लकड़ियाँ चीरता लकड़हारा खाया। तुझे खाऊँ तो पेट भरे। तेली ने कहा चल! नहीं तो एक कपा मारूँगा। गीदड़ तेली को भी खा गया। आगे गया तो दरिया मिला। वहाँ जा ख़ूब पानी पिया। जब पेट अच्छी तरह भर गया। तब सारे जंगल की मिट्टी समेट उसका चबूतरा बनाया और गोबर से उसे लेपा। और दरियाओं में से दो मेंडकियाँ पकड़ा अपने दोनों कानों में लटका लीं। और चबूतरे पर चढ़ बैठे। बहुत सी गाय-भैंसें आईं। उस दरिया पर। पानी पीने के वास्ते उनसे लड़ने लगा कि मैं पानी नहीं पीने दूँगा। उन्होंने कहा क्यों? कहा पहले इस तरह कहो कि चाँदी का तेरा चौंत्रा। कोई संदल लेपा जाए। कानों तेरे दो मुर्कियाँ कोई राजा बंसी बैठा हुए। उन्होंने कहा। अच्छा हम पहले पानी पी लें। फिर कहेंगे। जब गाय-भैंसें पानी पी चुकीं। तो गीदड़ ने कहा


अब कहो। तो उन्होंने कहा कि

मिट्टी का तेरा चौंत्रा। कोई गोबर लेपा जाए
कानों तेरे दो मेंडकियाँ। कोई गीदड़ बैठा हुए


गीदड़ ने जो ये सुना तो वो लड़ने लगा। गाय-भैंसों को जो आया गु़स्सा। उन्होंने एक सींग मारा गीदड़ का पेट फट गया और उसमें से जितने मोर और आदमी उसने खाए थे वो सब निकल आए और अपने-अपने घर चले गए। गीदड़ मर गया।

- unknown


जब मैं अपने उस्तादों का तसव्वुर करता हूँ तो मेरे ज़ह्न के पर्दे पर कुछ ऐसे लोग उभरते हैं जो बहुत दिलचस्प
मेहरबान
पढ़े लिखे और ज़हीन हैं और साथ ही मेरे मोहसिन भी हैं। उनमें से कुछ का ख़्याल कर के मुझे हंसी भी आती है और उन पर प्यार भी आता है। अब मैं बारी-बारी उनका ज़िक्र करूँगा।
जब मैं बाग़ हालार स्कूल (कराची) में के. जी. क्लास में पढ़ता था तो मिस निगहत हमारी उस्तानी थीं। मार-पीट के बजाय बहुत प्यार से पढ़ाती थीं। सफ़ाई-पसंद इतनी थीं कि गंदगी देख कर उन्हें ग़ुस्सा आ जाता था और किसी बच्चे के गंदे कपड़े या बढ़े हुए नाख़ुन देख कर उसकी हल्की-फुल्की पिटाई भी कर देती थीं। मुझे अब तक याद है कि एक दफ़ा मेरे नाख़ुन बढ़े हुए थे और उनमें मैल जमा था। मिस निगहत ने मेरे नाख़ुनों पर पैमाने से (जिसे आप स्केल या फट्टा कहते हैं।) मारा। चोट हल्की थी लेकिन उस दिन मैं बहुत रोया। लेकिन मिस निगहत ने गंदे और बढ़े हुए नाख़ुनों के जो नुक़्सान बताए वो मुझे अब तक याद हैं। और अब मैं जब भी अपने बढ़े हुए नाख़ुन देखता हूँ तो मुझे मिस निगहत याद आ जाती हैं और मैं फ़ौरन नाख़ुन काटने बैठ जाता हूँ।


पहली जमात में पहुँचा तो मिस सरदार हमारी उस्तानी थीं
लेकिन वो जल्द ही चली गईं और उनकी जगह मिस नसीम आईं जो उस्तानी कम और जल्लाद ज़्यादा थीं। बच्चों की इस तरह धुनाई करती थीं जैसे धुनिया रूई धुनता है। ऐसी सख़्त मार-पीट करती थीं कि इन्सान को पढ़ाई से
स्कूल से और किताबों से हमेशा के लिए नफ़रत हो जाए। जो उस्ताद और उस्तानियाँ ये तहरीर पढ़ रहे हैं उनसे मैं दरख़्वास्त करता हूँ कि बच्चों को मार-पीट कर न पढ़ाया करें। बहुत ज़रूरी हो तो डाँट-डपट कर लिया करें।
इस तहरीर को पढ़ने वाले जो बच्चे और बच्चियाँ बड़े हो कर उस्ताद और उस्तानियाँ बनें वो भी याद रखें कि मार-पीट से बच्चे पढ़ते नहीं बल्कि पढ़ाई से भागते हैं। बच्चों को ता'लीम से बेज़ार करने में पिटाई का बड़ा हाथ होता है। हाँ कभी-कभार मुँह का ज़ायक़ा बदलने के लिए एक-आध हल्का-फुलका थप्पड़ पड़ जाए तो कोई हर्ज नहीं


लेकिन अच्छे बच्चों को इसकी कभी ज़रूरत नहीं पड़ती।
उसके बा'द की जमातों में पढ़ाने वाले जो उस्ताद मुझे याद आते हैं
उनमें से एक ज़िया साहब हैं जो छटी जमात में हमें उर्दू पढ़ाते थे। अगर-चे ज़िया साहब हर वक़्त अपने साथ एक लचकीला बेद रखते थे लेकिन उसका इस्ति'माल कम ही करते थे। उन्होंने मेरी उर्दू का तलफ़्फ़ुज़ सही करने में बहुत मदद दी। उन्होंने उर्दू सिखाते और पढ़ाते हुए कई काम की बातें बताईं जिनसे मैंने बा'द में भी फ़ायदा उठाया। ज़िया साहब होमवर्क के तौर पर एक सफ़हा रोज़ाना ख़ुश-ख़त लिखने को कहते थे। उनका कहना था कि कुछ भी लिक्खो
इबारत कहीं से भी उतारो


चाहे किसी अख़बार से या रिसाले से या किताब से
और चाहो तो कोई कहानी ही लिख लाओ मगर लिक्खो ज़रूर
और लिक्खो भी साफ़-साफ़ और ख़ूबसूरत।
मैं किताब से कोई इबारत उतारने के बजाय अक्सर दिल से क़िस्से कहानियाँ बना कर लिख कर ले जाया करता था। शायद यहीं से मुझे कहानियाँ लिखने का चसका पड़ गया। कहानियाँ पढ़ने की लत तो पहले से थी ही। ज़िया साहब के लिए आज भी दिल से दुआ निकलती है। उनका सिखाया-पढ़ाया बहुत काम आया।


सातवीं जमात में जनाब तय्यब अब्बासी मिले जो हमें अरबी पढ़ाया करते थे। बच्चों से बड़ी मुहब्बत करते थे। बहुत मज़हबी आदमी थे। हुज़ूर-ए-अकरम सललल्लाहु अलइहि वसल्लम की हदीसें भी सुनाया करते थे। बच्चों की शाज़-ओ-नादिर ही पिटाई की होगी। क्लास बहुत शोर मचाती तो झूट-मूट ग़ुस्से से कहते
“क्या हो रहा है भई?”
और बच्चे इतने शरीर थे कि उनका नर्म सुलूक देख कर और शेर हो जाते और उन्हें बार-बार “क्या हो रहा है भई” कहना पड़ता। अब्बासी साहब का मुहब्बत भरा बरताव अब भी बहुत याद आता है।
आठवीं जमात में मैंने बाग़ हालार स्कूल छोड़ कर सीफ़ीह स्कूल में दाख़िला ले लिया। यहाँ जिस उस्ताद ने मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर क़ब्ज़ा जमा लिया वो सय्यद मुहम्मद ताहिर साहब थे। आप हमें उर्दू पढ़ाते थे। न सिर्फ़ उनके पढ़ाने का अंदाज़ बहुत उम्दा था बल्कि वो ख़ुश-मिज़ाज भी थे। क़हक़हा बहुत बुलंद आवाज़ में लगाते थे और देर तक हंसते रहते थे। हत्ता कि स्कूल की राह-दारियों में


स्टाफ़ रुम में या किसी जमात के कमरे में होते तो भी उनके क़हक़हे से पता चल जाता था कि ताहिर साहब यहीं कहीं हैं। उनकी दिलचस्प बातों पर पूरी क्लास दिल खोल कर क़हक़हे लगाया करती थी।
चुनाँचे हमारा उर्दू का पीरियड सबसे मज़े-दार होता था और लगता ही नहीं था कि पड़ाई हो रही है
लेकिन पढ़ाई साथ-साथ होती जाती थी। ताहिर साहब को सैकड़ों बल्कि हज़ारों शे'र याद थे। मौक़े के लिहाज़ से ग़ज़ब का शे’र पढ़ते थे। इससे मेरा शे’र-ओ-शायरी का शौक़ बहुत बढ़ गया। वो जमात में तालिब-ए-इल्मों से शे’र सुनाने की फ़र्माइश करते। अगर कोई लड़का अच्छा शे’र पढ़ता तो बहुत दाद देते और हौसला-अफ़ज़ाई करते। चुनाँचे मैंने इधर-उधर से किताबें ले कर बड़े-बड़े शायर
मसलन ग़ालिब


इक़बाल और मीर वग़ैरा के बे-शुमार शे’र एक कापी में लिख लिए और याद कर लिए
बल्कि बहुत से शे’र तो लिखने के दौरान ही याद हो गए। फिर तो ये होने लगा कि ताहिर साहब एक शे’र सुनाते और एक मैं सुनाता और पूरी क्लास “वाह-वा” कर के दाद के डोंगरे बरसाती।
ताहिर साहब ने हमें तीन साल तक यानी आठवीं
नौवीं और दसवीं में उर्दू पढ़ाई और हक़ ये है कि उर्दू पढ़ाने का हक़ अदा कर दिया। औरों का तो मैं नहीं कह सकता


लेकिन मेरे अंदर उन्होंने उर्दू ज़बान और उर्दू शे’र-ओ-अदब का एक ऐसा ज़ौक़ और मुताले का ऐसा शौक़ पैदा कर दिया जिसने आगे चल कर मेरी पढ़ाई और ज़िंदगी पर बहुत गहरा असर डाला। अल्लाह उन्हें ख़ुश रखे।
उन्हीं तीन सालों में शब्बीर साहब से भी रब्त-ज़ब्त रहा। अगर-चे साईंस के आदमी थे और अलजेब्रा और तबी'आत यानी फिज़िक्स पढ़ाते थे
लेकिन शायरी से और अदब से उन्हें भी बड़ा लगाओ था। इसी तरह हमारे एक उस्ताद अहमद साहब थे। वो ख़ुद शायर थे और कुछ दिनों तक मैं उनसे (शायरी पर) इस्लाह भी लेता रहा।
तीसरी-चौथी जमात में मैंने रिसाले


कहानियाँ और नॉवल इस तरह चाटना शुरू कर दिए जैसे वो क़ुलफ़ी या खट्टा-मीठा चूरन हो। उसी दौर में मैंने हमदर्द नौनिहाल पढ़ना शुरू कर दिया। और ये मेरे मन को ऐसा भाया कि आज तक इसे नहीं छोड़ सका बल्कि अब तो मेरा बेटा सज्जाद भी इसे पढ़ता है। हर माह जब अख़बार वाला हमदर्द नौनिहाल का ताज़ा शुमारा दे जाता है तो दोनों बाप-बेटे इस कोशिश में होते हैं कि इसे पहले मैं पढ़ लूँ
और अब तो सज्जाद की अम्मी जान मोहतरमा भी इस दौड़ में शरीक हो गई हैं।
हमदर्द नौनिहाल से मैंने बहुत कुछ सीखा। इससे मैंने उर्दू सीखी (उर्दू मेरी मादरी ज़बान नहीं है।) हमदर्द नौनिहाल से मैंने कहानियाँ और मज़मून लिखना सीखा। बे-शुमार मा'लूमात और अक़्ल की बातें इसने मुझे सिखाईं। दर-हक़ीक़त हमदर्द नौनिहाल भी मेरे उस्तादों में शामिल है। ये मेरा मोहसिन है। और ये बात मैं जनाब हकीम मुहम्मद सईद साहब या जनाब मसऊद अहमद बरकाती साहब को ख़ुश करने के लिए नहीं लिख रहा। ये सच्ची बात है। अपने उस्तादों के साथ नौनिहाल के लिए भी दिल से दुआ निकलती है। कितने ख़ुश-नसीब हैं पाकिस्तानी बच्चे कि उनके मुल्क से एक निहायत उम्दा रिसाला उनकी सही तर्बियत और रहनुमाई के लिए निकलता है।
भई अपने उस्तादों का ये ज़िक्र कुछ तवील होता जा रहा है


इसलिए में इसे ख़त्म करता हूँ लेकिन ठहरिए... ओफ़्फ़ो भई हद हो गई। उस्तादों का ये ज़िक्र इलयास साहब के बग़ैर भला कैसे मुकम्मल हो सकता है? उन्होंने हमें साल डेढ़ साल अंग्रेज़ी पढ़ाई। आठवीं में और कुछ अर्से नौवीं में। अंग्रेज़ी पढ़ाई क्या थी बस घोल कर पिला दी थी। अंग्रेज़ी ग्रामर की बा'ज़ चीज़ें उन्होंने जिस तरह हंसा-हंसा कर और मज़ाक़ ही मज़ाक़ में पढ़ा दीं वो इतने काम की निकलीं कि वहीं से सही माअनों में अंग्रेज़ी हमारी समझ में आने लगी और ये बुनियादी बातें शायद कोई और इस तरह न बता पाए। अल्लाह जाने इलयास साहब अब कहाँ हैं? लेकिन वो जहाँ कहीं भी हों अल्लाह-तआला उन्हें ख़ुश रखे और दुनिया-ओ-आख़िरत की ने'मतों से माला-माल करे। आमीन...
उन्होंने और ताहिर साहब ने हमें निहायत उम्दा तरीक़े पर अंग्रेज़ी और उर्दू पढ़ा कर बहुत बड़ा एहसान किया।
बल्कि दर-हक़ीक़त मेरे तमाम उस्ताद मेरे मोहसिन हैं
चाहे वो स्कूल के ज़माने के हों


कॉलेज के हों या यूनीवर्सिटी के। उन्होंने मुझ पर बड़ा एहसान किया। मुझे इल्म की दौलत से माला-माल किया। मुझे उस वक़्त अक़्ल और ता'लीम दी जब मैं कुछ भी नहीं जानता था।

- rauf-parekh


आख़िर प्रोग्राम बन ही गया। जून का पहला हफ़्ता था। हम लोग दिल्ली जाने की तय्यारियाँ करने लगे। हम सात आदमियों की टोली में मस्ख़रा रमेश भी था
जिसको हमने बड़ी मुश्किल से इस सफ़र के लिए तैयार किया था
क्यों कि हम जानते थे कि उसके बग़ैर सफ़र का लुत्फ़ आधा रह जाएगा। बनारस कैन्ट से अपर इंडिया ऐक्सप्रैस में हम सब सवार हो गए। इत्तिफ़ाक़ ही कहिए कि उस दिन कोई ख़ास भीड़ न थी और हम लोगों को ऊपर की बर्थें सोने के लिए मिल गईं। रात को ग्यारह बजे तक तो हम लोग रमेश की बातों से लुत्फ़ अंदोज़ होते रहे
मगर जब उसे नींद आने लगी तो हम लोगों ने भी सोने का इरादा लिया।


मेरी आँख उस वक़्त खुली जब मुर्ग़ की बाँग की कई आवाज़ें मेरे कानों के पर्दे से टकराईं। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। मुर्ग़ की बाँग मैंने ट्रेन के अंदर पहली बार सुनी थी। अगर ट्रेन के बाहर किसी मुर्ग़ ने बाँग दी भी हो तो वो अपर इंडिया ऐक्सप्रैस की घड़-घड़ाहट को चीर कर अंदर कैसे आ सकती थी? बड़ी अजीब बात थी। मैंने इतना ही सोचा था कि मेरी नज़र अपने सामने वाली बर्थ पर पड़ी जिस पर रमेश अपनी हंसी रोके बैठा था। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं उसकी हंसी का आबशार उबल पड़ा। नीचे बैठे हुए मेरे दूसरे साथी भी क़हक़हा लगाने लगे।
ये मुर्ग़ की बाँग हमारे दोस्त रमेश के गले ही का करिश्मा थी। वो मुख़्तलिफ़ परिंदों और जानवरों की बोलियों की नक़्ल उतारने में माहिर था।
टुंडला स्टेशन आया। हमने नाशता किया और फिर कम्पार्टमेंट में आ बैठे। नीचे की सीट पर एक गोल-मटोल से साहब लंबी ताने सो रहे थे। हम लोगों के क़हक़हे के बावजूद उनकी आँख नहीं खुली थी। रमेश ने शरारत भरी नज़रों से हमें देखा और उनके सिरहाने जा बैठा। हम लोग समझ गए कि अब अगला शो क्या होगा। रमेश ने मुर्ग़ की तीन-चार बाँगें उन साहब के कान के पास दीं और बाहर खिड़की में झाँकने लगा। हम लोग भी अपनी हंसी बुरी तरह रोके थे।
उन साहब ने सबसे पहले अपनी सीट के नीचे झाँक कर देखा और फिर इधर-उधर। उसके बाद उन्होंने जमाही ली। और चादर से अपने आपको ढक कर फिर दराज़ हो गए। पंद्रह मिनट तक बिलकुल ख़ामोशी छाई रही। हम लोग अपनी हंसी पी गए थे। पंद्रह मिनट के बाद रमेश ने फिर बाँग दी। इस बार वो साहब उठ खड़े हुए। उन्होंने बाक़ायदा चारों तरफ़ नज़रें दौड़ानी शुरू कीं और कई सीटों के नीचे झाँका भी


फिर अपनी सीट पर आ कर बैठ गए। हम लोगों को शक भरी निगाहों से घूरा और सीट की पुश्त से लग कर ऊँघने लगे। दस मिनट बाद रमेश ने बाँग का एक और लगाया।
उन साहब का ग़ुस्सा अपनी हद पार कर चुका था। उन्होंने सख़्त लहजे में हम लोगों को मुख़ातब किया
“देखने में तो आप शरीफ़ और पढ़े-लिखे मालूम होते हैं
मगर साथ में मुर्ग़े-मुर्ग़ियाँ ले कर चलते हैं और अपने साथ-साथ दूसरों को भी परेशान करते हैं।”


उन्होंने हमारी बेद की बुनी हुई बड़ी अटैची को घूरा और यूँ सर हिलाया जैसे समझ गए हों कि हम लोगों ने मुर्ग़े-मुर्ग़ियाँ इसी अटैची में बंद कर रखी हैं।
ग्यारह बज रहे थे। ट्रेन अपनी आख़िरी दौड़ ख़त्म कर रही थी कि एक टिकट-चैकर हमारे कम्पार्टमेंट में घुस आया। टिकट-चैकर हम लोगों का टिकट देख कर लौटने ही वाला था कि गोल-मटोल साहब ने टोका
“और मुर्ग़े-मुर्ग़ियाँ!”
चैकर फिर हम लोगों की तरफ़ मुख़ातिब हो गया


“कहाँ हैं मुर्ग़े-मुर्ग़ियाँ?”
गोल-मटोल साहब ने हम लोगों की अटैची की तरफ़ इशारा कर दिया।
“क्यों जनाब?” टिकट चैकर ने रमेश को इस तरह मुख़ातब किया जैसे वो कोई बड़ा मुजरिम हो।
“जी-जी



वो
मुर्ग़-मुर्ग़ियाँ…” रमेश ने बनावटी घबराहट का इज़हार किया।
“जी-जी कुछ नहीं। आपको उनका महसूल मा-जुर्माना अदा करना होगा। जल्दी कीजिए।” चैकर ने सख़्ती से कहा...


“जी लेकिन वो
मुर्ग़-मुर्ग़ियाँ हैं कहाँ?” रमेश ने सवालिया नज़रों से उसकी तरफ़ देखा।
चैकर के कहने पर जब रमेश ने अपनी अटैची खोली तो चैकर के साथ-साथ गोल-मटोल साहब की आँखें भी खुली की खुली रह गईं। अटैची कपड़ों से ऊपर तक भरी हुई थी।
चैकर ने हम लोगों से नज़र भी न मिलाई। सिर्फ़ गोल-मटोल साहब की तरफ़ एक बार गाली देने वाली नज़र से देखा और आगे बढ़ गया।


टिकट चैकर कम्पार्टमेंट के दरवाज़े से बाहर झाँक रहा था कि रमेश ने अजीब क़िस्म की चिड़ियों की बोली से कम्पार्टमेंट को गुँजा दिया।

- kamaluddin


आज मदरसे की छुट्टी थी। इतवार का दिन था। मैं अपनी सहेली अनुपमा के साथ बैठी होमवर्क के बहाने गप-शप कर रही थी। अचानक बाहर से कुछ बच्चों के शोर-ओ-गुल के साथ सपेरे के बीन की आवाज़ आई। हम दोनों दौड़ कर खिड़की पर पहुँचे। और खिड़की खोल कर बाहर झाँका। गली में महल्ले के बच्चे जमा थे। और साँप का तमाशा दिखाया जा रहा था।
सपेरा झूम-झूम कर बीन बजा रहा था। साँप का पिटारा खुला था और काला नाग अपना चौड़ा सा फन उठाए इधर-उधर घुमा रहा था। फिर सपेरे ने उसको बाहर निकाला और ज़मीन पर छोड़ दिया। वो लहरा-लहरा कर अपना नाच दिखाने लगा। कुछ निडर बच्चे उसे देख कर तालियाँ बजा रहे थे और कुछ नन्हे-मुन्ने बच्चे डर कर माओं के आँचल में मुँह छुपाए खड़े थे।
“क्यों अनु इसी तरह हम भी इसको पाल लें और फिर इसको सधा कर रोज़ तमाशा दिखाया करें?” मैंने अनुपमा से पूछा।
“मगर हम पकड़ेंगे कैसे? कभी-कभी हमारे यहाँ बरसात के ज़माने में चमेली की झाड़ी में साँप तो दिखाई देता है मगर माली बल्ली या दादा जी मोटा सा डंडा ले कर उसे मार फेंक देते हैं।” अनुपमा ने जवाब दिया।


“भई हमारे यहाँ तो कभी साँप दिखाई नहीं दिया।”
मैं कुछ सोच कर बोली
“अच्छा हमारे बावर्ची-ख़ाने के पीछे तरकारी की क्यारी में जहाँ अम्माँ ने तुरई और सेम की बेलें लगा रखीं हैं
बरसात आने पर वहाँ साँप ढूँढेंगे।”


“हाँ हाँ ज़रूर
मगर शोर मचा कर सबको बताना नहीं।” अनुपमा बोली।
“मगर उसे पकड़ेंगे कैसे?” मैंने सवाल किया।
“अरे एक मोटी सी रस्सी ढूँढ कर उसका फंदा बना लेना।” अनुपमा ने तरकीब समझाई।


“अहा... ये तो अच्छी तरकीब है
मगर फिर हमको एक बीन भी ख़रीदना चाहिए।”
“अरे बीन तो बाद में बजाना
पहले उसे दूध पिला कर पालना होगा। मगर सबसे छुपा कर।” अनुपमा ने समझाया।


“ठीक है मैं ईंधन वाली कोठरी में एक टोकरी में उसे छिपा दूँगी और भूरी बिल्ली की तरह छुपा कर उसे दूध पिलाया करूँगी।
“अच्छा चलो बरसात आने दो। साँप तो जब पकड़ेंगे। आओ अब तो पहाड़े याद कर लें और अंग्रेज़ी
उर्दू का काम पूरा कर लें
नहीं तो कल स्कूल में नया तमाशा होगा!” अनुपमा ने हंसते हुए किताब खोली।


गर्मी की छुट्टियाँ अब ख़त्म होने वाली थीं। बरसात का मौसम काली घटाओं
बादलों की गरज और बिजली की चमक के साथ शुरू हो चुका था। फिर छमा-छम बारिशें शुरू हो गईं। हर तरफ़ हरियाली छा गई
मुरझाए पेड़-पौदे हरे-भरे हो गए और इसके साथ ही मेरे दिमाग़ में साँप पकड़ने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। मैं किसी साँप की तलाश में फूलों की क्यारियों और तरकारियों की बेलों में घूमने लगी। फिर जब एक दिन शाम को तुरई की बेल में सितारा जैसी नन्ही-नन्ही दो आँखें चमकती नज़र आईं तो मैं ख़ुशी से उछल पड़ी। साँप बेल में उलझा हुआ बैठा था। मैं ख़ुशी और जोश में क़ुलाँचें भरती पीछे का दरवाज़ा खोल
अनुपमा के लॉन की दीवार कूद कर अनुपमा को घसीट लाई।


रस्सी का फंदा जो ईंधन की कोठरी में पहले ही से छिपा दिया गया था
फ़ौरन निकाला गया। अब अंधेरा बढ़ रहा था। हम जल्दी-जल्दी रस्सी पकड़े बेल के पास पहुँचे। मगर साँप वहाँ से उतर कर नाली में सर-सरा रहा था। हम दोनों उसका पीछा करते उसके साथ-साथ चल रहे थे। बार-बार रस्सी का फंदा फेंकते मगर वो उससे निकल कर झट से आगे बढ़ जाता।
अचानक वो मुड़ कर बावर्ची-ख़ाने के नीचे वाली नाली में हो लिया। हम दोनों कीड़े बने हुए नाली के किनारे-किनारे दबे पाँव बढ़ते रहे। अब वो बावर्ची-ख़ाने के बिलकुल नीचे पहुँच चुका था। बावर्ची-ख़ाने में वज़ीरन बुआ चूल्हे पर बड़ा सा तवा चढ़ाए छपा-छप चपातियाँ पका रही थीं। हम दोनों के जूतों की घस-फस सुन कर उन्होंने उधर घूम कर देखा।
“अरे लड़कियों शाम के वक़्त मोरी में क्या ढूँढ रही हो!”


“शश श!” मैंने सर उठा कर उनसे बिलकुल ख़ामोश रहने का इशारा करते हुए बावर्ची-ख़ाने की दो सीढ़ियाँ चढ़ कर उनके कान में कहा
“बुआ तुम्हें क़सम है
शोर न मचाना
हम साँप पकड़ रहे हैं। हम उसे पालेंगे और फिर तुम भी तमाशा देखना।”


“ओई मेरे अल्लाह!” वज़ीरन बुआ बौखला कर ज़ोर से चीख़ीं
“इलाही ख़ैर! शुकरन मियाँ




अए भय्या दौड़ियो! साँप है साँप!”
बुआ गला फाड़ कर उस वक़्त तक चीख़ती ही रहीं जब तक चचा मियाँ
जो नमाज़ के बाद जा-नमाज़ पर ही लेट गए थे
तेज़ी से टॉर्च और डंडा ले कर न आ गए। साँप अब दालान की नाली में था। हम दोनों उनसे लिपट गए।


“अच्छे चचा मियाँ
इसे हम पालेंगे
इसे न मारिए”
“लाहौल वला क़ुव्वत।” उन्होंने झुंझला कर हमें झटका दे कर अपनी टाँगों से अलग किया और टॉर्च डाल कर साँप को देखा और बड़ी फुर्ती के साथ छड़ी से उसे बाहर निकाल कर खुले हिस्से में डाला और फ़ौरन उसका सर कुचल दिया। हमें अपने इस इतने अच्छे मंसूबे के टूटने का इतना ग़म हुआ कि हमारी आँखों में आँसू आ गए।


“अरे तुम दोनों को क्या हुआ? रो क्यों रही हो?” चचा मियाँ ने हैरत से पूछा।
“जाईए हम नहीं बोलते आपसे!” मैंने उनसे रूठने के अंदाज़ में कहा।
“आपने हमारा सारा खेल बिगाड़ दिया। इस साँप को मार दिया। इसे तो हम पकड़ कर पालने वाले थे।” मैंने रुक-रुक कर कहा। “और हम फिर उसको सधा कर ऐसा तमाशा दिखाते जैसा उस दिन सपेरा दिखा रहा था।”
“हा हा हा...” चचा मियाँ ने ज़ोर-दार क़हक़हा लगाया।


“क्या पागल-पन समा गया है तुम्हारी नन्ही सी खोपड़ी में!” चचा मियाँ कह रहे थे... “जानती हो कुछ साँप ज़हरीले भी होते हैं... ये पालतू जानवर नहीं होते।”
“फिर वो सपेरा!” मैंने बात काटी...
“अरे भाई वो साँप पकड़ने का काम सीखते हैं। अपनी रोटी-रोज़ी कमाने के लिए। फिर वो साँप के दाँतों के नीचे जो ज़ह्र भरी थैली होती है
निकालना भी जानते हैं।” चचा मियाँ ने समझाया। फिर मेरा और अनुपमा का खिसियाना चेहरा देख कर चचा मियाँ ने चुम्कार कर कहा


“अच्छा कल हम तुम्हें एक खिलौने वाला कल-दार साँप दिला देंगे। फिर तुम सबको तमाशा दिखाती फिरना।”
“कोई हम नन्हे बच्चे हैं... जनाब तीसरी जमात में पढ़ते हैं।” मैंने हेकड़ी जताई।
चचा मियाँ मुस्कुराए
“ओहो बड़ी-बी तुम तो बड़ी क़ाबिल हो गई हो। तभी तो बग़ैर समझे बूझे ज़िंदा साँप पकड़ने चली थीं।”


- syeda-farhat


बड़ा सुनसान जज़ीरा था। ऊँचे-ऊँचे और भयानक दरख़्तों से ढका हुआ। जितने भी सय्याह समुंद्र के रास्ते उस तरफ़ जाते
एक तो वैसे ही उन्हें हौसला न होता था कि उस जज़ीरे पर क़दम रखें। दूसरे आस-पास के माही-गीरों की ज़बानी कही हुई ये बातें भी उन्हें रोक देती थीं कि उस जज़ीरे में आज तक कोई नहीं जा सका और जो गया वापिस नहीं आया। उस जज़ीरे पर एक अंजाना ख़ौफ़ छाया रहता है। इनसान तो इनसान परिंदा भी वहाँ पर नहीं मार सकता। ये और इसी क़िस्म की दूसरी बातें सय्याहों के दिलों को सहमा देती थीं। बहुतेरों ने कोशिश की मगर उन्हें जान से हाथ धोने पड़े।
एक दिन का ज़िक्र है कि चार आदमियों के एक छोटे से क़ाफ़िले ने उस हैबत-नाक जज़ीरे पर क़दम रखा। कमाल
एक कारोबारी आदमी था। वो बंबई के हंगामों से उकता कर एक पुर-सुकून और अलग-थलग सी जगह की तलाश में था। जब उसे मा’लूम हुआ कि वो जज़ीरा अभी तक ग़ैर-आबाद है तो वो अपनी बीवी परवीन


अपनी लड़की अख़तर
अपने लड़के अशरफ़ को जज़ीरे के बारे में बताया। दोनों भाई बहन ने जो ये बात सुनी तो बेहद ख़ुश हुए। क्योंकि उनके ख़्याल में उस जज़ीरे पर एक छोटे से घर में कुछ वक़्त गुज़ारना जन्नत में रहने के बराबर था।
आख़िर-ए-कार वो दिन आ ही गया जब कमाल अपने बच्चों के साथ उस जज़ीरे पर उतरा। जज़ीरा अंदर से बहुत ख़ूबसूरत था। जगह-जगह फूलों के पौदे लहलहा रहे थे। थोड़े-थोड़े फ़ासले पर फल-दार दरख़्त सीना ताने खड़े थे। ऊँचे-ऊँचे टीलों और सब्ज़ घास वाला जज़ीरा बच्चों को बहुत पसंद आया। मगर अचानक कमाल ने चौंक कर इधर-उधर देखना शुरू कर दिया। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने हलका क़हक़हा लगाया हो। पहले तो उसने इस बात को वह्म समझ कर दिल में जगह नहीं मगर दुबारा भी ऐसा ही हुआ तो उसके कान खड़े हुए। उसने दिल में सोच लिया कि माहीगीरों की कही हुई बातों में सच्चाई ज़रूर है। मगर उसने बेहतर यही समझा कि अपने इस ख़्याल को किसी दूसरे पर ज़ाहिर न करे। अगर वो ऐसा करता तो बच्चे ज़रूर डर जाते।
जब तक दिन रहा वो सब जज़ीरे की सैर करते रहे। रात हुई तो उन्हें कोई महफ़ूज़ जगह तलाश करनी पड़ी जहाँ वो ख़ेमा लगाना चाहते थे। आख़िर एक छोटे से टीले से नीचे उन्होंने ख़ेमा गाड़ दिया। मगर कमाल बार-बार यही सोच रहा था कि आख़िर वो हल्के से क़हक़हे उसे फिर सुनाई दिए। कमाल को परेशानी तो ज़रूर हुई मगर वो अपनी इस परेशानी को दूसरों पर ज़ाहिर नहीं करना चाहता था। इसलिए उसने अपनी बीवी से कहा


“अभी तो इसी जगह रात बसर की जाए
सुबह को ऐसी जगह देखूँगा जहाँ मकान बनाया जा सके।”
“मगर सुनो कमाल। क्या तुमने किसी के हँसने की आवाज़ सुनी है?” परवीन ने सहम कर पूछा।
“सुनी तो है।” कमाल ने आहिस्ता से कहा। “मगर इस बात को बच्चों से छुपाए रखना


मेरे ख़्याल में माहीगीर ठीक कहते थे। मगर डरने की कोई बात नहीं। मैं इतना बुज़दिल नहीं हूँ कि इन मा'मूली बातों से घबराऊँ।”
अभी वो बातें कर ही रहे थे कि अशरफ़ ने सहम कर कहा
“अब्बा! मैंने किसी की हंसी सुनी है और ये हंसी बहुत क़रीब ही से सुनाई दी है। क्या बात है? कहीं यहाँ भूत-वूत तो नहीं हैं?”
“पागल मत बनो अशरफ़। ये तो किसी परिंदे की आवाज़ है। मैं भी बहुत देर से सुन रहा हूँ।”


कमाल ने तो ये कह कर अशरफ़ को टाल दिया। मगर अशरफ़ सोच रहा था कि इस जज़ीरे में तो एक भी परिंदा नहीं है। फिर आख़िर अब्बा झूट क्यों बोल रहे हैं। जब उसकी समझ में कुछ न आया तो वो ख़ामोशी से अंदर ख़ेमे में जा कर लेट गया और सोचने लगा कि जब सुबह होगी तो ख़्वाह-म-ख़्वाह का डर भी उसके दिल से दूर हो जाएगा। रात को तो ऐसे ही ऊट-पटांग ख़्याल ज़ह्न में आया करते हैं।
सुबह भी आ गई। दूसरी जगहों की तरह यहाँ-परिंदों की चह-चहाहट बिलकुल नहीं थी। फूलों पर तितलियाँ नहीं मंडला रही थीं। एक पुर-असरार ख़ामोशी ने पूरे जज़ीरे को अपनी गोद में ले रखा था। कमाल ने सबको उठाया और फिर कहा
“आओ जज़ीरे के कोने-कोने को देखें
हो सकता है कि कहीं हमें कोई ऐसी जगह मिल जाए जहाँ पीने का पानी भी हो और जो समुंद्र से क़रीब भी हो। बस ऐसी ही जगह हम अपना छोटा सा घर बनाएँगे।”


ये सुन कर सबने सामान बाँधा और अपने कंधों पर लटका लिया। फिर ये छोटा सा कुम्बा घर बनाने के लिए जज़ीरे के अंदर बढ़ने लगा। शायद एक-दो फ़र्लांग चलने के बाद ही कमाल ठिठक गया। उसकी नज़रें सामने की तरफ़ जमी हुई थीं। उस जज़ीरे के ख़ूबसूरत से जंगल में एक निहायत ही ख़ूबसूरत मकान बना हुआ था। शायद ये मकान बहुत ऊँचा था। क्योंकि उसका ऊपर का हिस्सा दरख़्तों में छिप गया था। इसके इलावा वो सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात ये थी कि ये मकान बिलकुल शीशे का नज़र आता था। गो इसकी दीवारों के आर-पार कोई चीज़ नज़र नहीं आती थी। लेकिन दीवारों की चमक बताती थी कि वो शीशे की बनी हुई हैं। बिलकुल सामने एक दरवाज़ा था और दरवाज़े के आगे नन्ही-मुन्नी सी रविश थी।
“अब्बा! ये मकान किस का है?” अख़तर ने पहली बार पूछा।
“कोई न कोई यहाँ रहता ज़रूर है।” कमाल ने जवाब दिया। “माही गीर ग़लत कहते थे कि ये ग़ैर-आबाद जज़ीरा है।”
“अरे! मगर दरवाज़ा तो खुला हुआ है।” अशरफ़ ने हैरत से कहा।


“आ जाइए
अंदर आ जाइए। मैं तो बरसों से आपका इंतिज़ार कर रहा हूँ।” एक बड़ी भारी आवाज़ अंदर से आई।
“चलिए
अंदर चल कर तो देखें कौन है


कोई हमें बुला रहा है।” परवीन ने कमाल के कान में कहा।
कमाल ने आहिस्ता से दरवाज़ा खोला और फिर उसके साथ ही एक-एक कर के सब अंदर दाख़िल हो गए। अंदर का मंज़र देख कर वो हैरान रह गए क्योंकि उस शीशे के कमरे में फ़र्नीचर बिलकुल नहीं था और कमरा ख़ाली था। उनके अंदर दाख़िल होते ही अचानक दरवाज़ा बंद हो गया। कमाल ने जल्दी से आगे बढ़ कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की मगर ये देख कर उसकी हैरत की इंतिहा न रही कि दरवाज़ा बाहर से बंद हो गया है और अब खुल नहीं सकता। यका-यक वही क़हक़हे फिर सुनाई देने लगे। पहले उनकी आवाज़ मद्धम थी मगर अब बहुत तेज़ थी।
“ये क़हक़हे किस के हैं कौन हंस रहा है?” कमाल ने चिल्ला कर पूछा
मगर उसकी आवाज़ शीशे के मकान में गूँज कर रह गई।


चंद मिनट के बाद शीशे की दीवारों के बाहर का मंज़र नज़र आने लगा और कमाल ने देखा कि बाहर जंगल में धुआँ ज़मीन से उठ रहा है। बढ़ते-बढ़ते ये धुआँ आसमान तक जा पहुँचा और फिर उस धुएँ ने इनसान की शक्ल इख़्तियार कर ली। उन लोगों को शीशे के मकान में देखते ही उसने क़हक़हे लगाने शुरू कर दिए। उसके सर पर एक लंबी सी चोटी थी जो उसके कंधों पर झूल रही थी।
“मैं आज़ाद हूँ! मैं आज़ाद हूँ! हाहाहा!” उस लंबे आदमी ने क़हक़हे लगाते हुए कहना शुरू किया “मैं आज़ाद हूँ! ऐ अजनबी जानते हो
मैं पाँच सौ साल से इस शीशे की बोतल में बंधा था
लेकिन आज़ाद हूँ! हाहाहा!”


“लेकिन तुम हो कौन और हमें इस तरह क़ैद करने से तुम्हारा मतलब क्या है?” कमाल ने पूछा।
“मैं जिन हूँ। मैं दुनिया का हर वो काम कर सकता हूँ जो तुम नहीं कर सकते। पाँच सौ साल पहले एक माहीगीर ने मुझे एक मोटी सी बोतल के क़ैद-ख़ाने में से निकाला था। और जब मैंने उसे खाने का इरादा किया था तो उस कम्बख़्त ने मुझे धोके से बोतल में बंद कर दिया था। मैं वही जिन हूँ अजनबी
समझे!”
“मगर ये तो एक मन-घड़त कहानी है।” परवीन ने कहा।


“बहुत से अफ़साने दर-अस्ल हक़ीक़तों से ही जन्म लेते हैं।” जिन ने कहा
“माहीगीर ने मुझे बोतल में क़ैद किया था वो पाँच सौ साल के बाद टूट गई। मैं फिर आज़ाद हो गया और मैंने कुछ ऐसे काम किए जिनकी बदौलत मुझे बड़ी ताक़तों ने फिर से इस बोतल में
इस जज़ीरे में क़ैद कर दिया। मेरी आज़ादी की शर्त ये रखी गई कि इधर कोई इनसान इस जगह आ कर मेरी जगह ले-ले तो मैं आज़ाद हो सकता हूँ। और इसलिए आज ऐ बेवक़ूफ़ अजनबी तुमने मुझे आज़ाद किया है और अब मेरी जगह तुम इस बोतल के क़ैदी हो। हाहा हा।”
“ख़ुदा की पनाह! तो क्या ये मकान बोतल की शक्ल का है।” कमाल ने इधर-उधर देखते हुए कहा।


“अब मैं दुबारा क़ैदी बनने की ग़लती नहीं करूँगा।” जिन ने कहा
“अब दुबारा में क़ैद नहीं हूँगा। हा हा हा!”
ये सुनते ही कमाल की बुरी हालत हो गई। उसने दीवानों की तरह जल्दी से आगे बढ़ कर उस शीशे के दरवाज़े पर ज़ोर की एक लात रसीद की मगर नतीजा कुछ न निकला। हिम्मत हार कर वो बेबसी से जिनके मुस्कुराते हुए चेहरे को देखने लगा।
“बेवक़ूफ़ अजनबी। तुम अब यहाँ से कभी बाहर न निकल सकोगे। तुम ज़िंदगी भर के लिए क़ैद हो गए हो। अच्छा अब मैं चलता हूँ। मुझे बहुत से काम करने हैं। जब तुम ख़ुद मुझसे जाने के लिए कहोगे उस वक़्त जाऊँगा


इसलिए मुझे इजाज़त दो।”
“अभी आपको इजाज़त नहीं मिल सकती क्योंकि आप मुझे एक शरीफ़ जिन मा’लूम होते हैं।” अख़तर ने हौसला कर के कहा।
“वो तो मैं हूँ ही। कौन कहता है कि मैं शरीफ़ नहीं हूँ? बोलो?”
“अगर आप शरीफ़ हैं तो ठहरिए और मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए। ये एक पहेली है। अगर आपने इस पहेली का ठीक जवाब दे दिया तो हम अपनी मर्ज़ी से यहीं क़ैद हो जाएँगे और अगर आपने सही जवाब नहीं दिया तो मुझे उम्मीद है कि आप अपनी शराफ़त का मुज़ाहिरा करेंगे और हमें जाने देंगे। कहानियों में मैंने यही पढ़ा है कि शरीफ़ जिन क़ौल दे कर नहीं मुकरते। मैं आपको तीन मौक़े दूँगी। अगर तीनों बार सही जवाब न दे सके तो आप हार जाएँगे। बोलिए मंज़ूर है? आप ख़ामोश क्यों हैं। क्या आप डरते हैं?”


ये सुन कर जिन बड़े ज़ोर से हंसा और उसकी हंसी से जंगल के दरख़्त लरज़ने लगे। उसके बाद वो घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। और अपना मुँह शीशे की दीवार के पास ला कर ज़ोर से कहने लगा
“मैं डरता हूँ
हा हा हा! मैं जो पूरी दुनिया का मालिक हूँ। तुम जैसी नन्ही सी गुड़िया से डर जाऊँगा! हा हा हा! मैं दुनिया का सबसे अक़्ल-मंद जिन हूँ। अपनी शराफ़त का मुज़ाहिरा करते हुए मैं तुम्हें इसकी इजाज़त देता हूँ कि तुम मुझसे अपनी पहेली पूछो
बोलो वो क्या पहेली है?”


कमाल
परवीन और अशरफ़ हैरत से अख़तर को देख रहे थे जो इतने बड़े जिन से मुक़ाबला करने को तैयार थी।
“वो क्या चीज़ है जो पूरी दुनिया को घेरे हुए है? ज़मीन पर
समुंद्र में


हवा में
ख़ला में सब जगह मौजूद है। तुम उसे देख सकते हो मगर देख नहीं सकते। तुम उसे महसूस कर सकते हो मगर महसूस नहीं कर सकते। वो दुनिया की बड़ी से बड़ी फ़ौज से भी ताक़तवर है और अगर चाहे तो सूई के नाके में से निकल सकती है और दुनिया का हर इनसान उसे अच्छी तरह जानता है बताओ वो क्या है?”
जिन ने ये सुन कर क़हक़हा लगाया और कहा
“भोली गुड़िया


पहेली का जवाब ये है कि वो चीज़ ऐटम है। ऐटम हर जगह है लेकिन हम उसे देख नहीं सकते। सिर्फ साइंस-दाँ देख सकते हैं। हम उसे महसूस नहीं कर सकते लेकिन अगर किसी चीज़ को छूएँ तो महसूस कर सकते हैं। वो दुनिया की बड़ी से बड़ी फ़ौज से भी ताक़तवर है और अगर चाहें तो सूई के नाके में से भी निकल सकता है।”
“बिलकुल ग़लत।” अख़तर ने मुस्कुरा कर कहा
“दुनिया के बहुत से आदमी ऐटम को नहीं जानते।”
ये सुन कर जिन्न बहुत घबराया और बोला


“ठहरो
मुझे सोचने दो
हाँ ठीक है
अब सही जवाब मिल गया


वो चीज़ रौशनी है। रौशनी हर जगह है और हर आदमी उसे देख सकता है। क्यों?”
“अब भी ग़लत।” अख़तर ने ख़ुश हो कर कहा
“अंधे आदमी रौशनी कैसे देख सकते हैं?”
“बेवक़ूफ़ लड़की।” जिन ने घबरा कर कहा


“तुम मुझे नादान समझती हो और धोका देना चाहती हो। मैं जानता हूँ कि इस पहेली का कोई जवाब नहीं है
इसलिए अब मैं कोई जवाब न दूँगा।
“जवाब क्यों नहीं है?” अख़तर ने कहा
“इसका जवाब है सच


सच हर जगह है। तुम उसे देख सकते हो और महसूस भी कर सकते हो अगर तुम सच्चे हो और अगर तुम सच्चे नहीं हो तो तुम न उसे देख सकते हो और न महसूस कर सकते हो। दुनिया का हर शख़्स सच को जानता है। सच दुनिया की बड़ी से बड़ी फ़ौज से भी ताक़तवर है और एक सूई के नाके में से भी निकल सकता है।”
ये सुनते ही जिन ने एक ज़बरदस्त क़हक़हा लगाया और कहा
“तुमने मुझसे चालाकी से काम लिया और मैंने भी तुमसे। मैंने भी चालाकी से तुमसे सही जवाब मा’लूम कर लिया। तुमने मुझे तीन मौक़े दिए थे और मैंने दो ही मर्तबा मैं तुमसे ठीक जवाब हासिल कर लिया। कहो कैसी रही? क्योंकि तुमने तीसरे मौक़े का इंतिज़ार किए बग़ैर ही सही जवाब बता दिया इसलिए तुम हार गईं।”
अख़तर तो अब चुप हो गई मगर कमाल ने आगे बढ़ कर कहा


“ये तुम्हारी कमज़ोरी की पहली निशानी है। तुमने एक बच्ची से चालाकी से ठीक जवाब मा'लूम कर लिया। सच जितना बड़ा है
तुम उतने बड़े नहीं हो। मेरी बच्ची ने ये बात साबित कर दी है।”
“बकवास मत करो। मैं हर चीज़ से बड़ा हूँ।” जिन ने जवाब दिया।
“ग़लत है


तुम सच से बड़े नहीं हो।” कमाल ने कहा
“सच एक सूई के नाके में से निकल सकता है। तुम नहीं निकल सकते। हमारे पास इस वक़्त कोई सूई नहीं है जो हम इसका तजुर्बा करें लेकिन इस दरवाज़े में ताले के अंदर कुंजी डालने का सुराख़ तो है। मुझे यक़ीन है कि सूई का नाका तो फिर छोटा सा है मगर तुम इस बड़े से सुराख़ में से भी नहीं गुज़र सकते।”
“ये झूट है
मैं सब कुछ कर सकता हूँ। सूई के नाके में से भी गुज़र सकता हूँ और ताले के सुराख़ में से भी। लो देखो


मैं धुआँ बन कर अभी तुम्हें ये तजुर्बा कर के दिखाता हूँ।”
इतना कहते ही जिन हवा में तहलील होने लगा और फिर धुआँ बनने लगा। उसके धुआँ बनते ही कमाल ने जल्दी से अपनी पानी का छागल निकाली और उसकी डाट खोल कर सब पानी फ़र्श पर गिरा दिया। जैसे ही जिन धुआँ बन कर ताले के सुराख़ से अंदर आने लगा। कमाल ने जल्दी से छागल का मुँह उस सुराख़ से लगा दिया। जब तमाम धुआँ छागल में चला गया तो कमाल ने डाट मज़बूती के साथ बंद कर दी और हंस कर कहा
“हाँ वाक़ई तुम ताले के सुराख़ में से निकल सकते हो
और फिर छागल में क़ैदी हो सकते हो।”


“तुमने मुझे धोका दिया
चालाकी से मुझे बंद कर दिया।” जिन ने छागल में से चिल्लाना शुरू किया
“मुझे आज़ाद करो।”
“तुमने सच की बड़ाई को नहीं माना इसलिए तुम हार गए।” इतना कह कर कमाल ने दरवाज़े को खोलना चाहा तो वो खुल गया।


“लो दरवाज़ा भी खुल गया। अब मैं तुम्हें समुंद्र में वापिस फेंके देता हूँ ताकि तुम दुबारा बाहर निकल कर कोई नया फ़ितना न खड़ा कर सको। तुमने हमें इस बोतल का क़ैदी बनाया था। लेकिन अब तुम ख़ुद क़ैदी हो गए।”
जिन इल्तिजा करता रहा मगर कमाल ने एक न सुनी और फिर बाहर आ कर उसने छागल समुंद्र में फेंक दी। एक ज़ोर दार तड़ाख़ा हुआ और शीशे का वो क़ैदख़ाना टुकड़े-टुकड़े हो गया
जिसकी शक्ल बोतल की सी थी और जिसका क़ैदी ये छोटा सा कुम्बा था।

- siraj-anwar


कहते हैं कि बहुत पुराने ज़माने में शेर उड़ सकता था। और उस वक़्त कोई भी शय उसके सामने ठहर नहीं सकती थी। वो नहीं चाहता था कि कोई उसके शिकार किए हुए जानवरों की हड्डियों को तोड़े। वो उनके ढाँचे जूँ के तूँ रखना चाहता था। लिहाज़ा उसने उनकी रखवाली के लिए दो सफ़ेद कव्वों को एक जोड़ा बनाया। उन्हें उसने हड्डियों के गिर्द बनाए गए हिसार की दीवार पर बिठाया और ख़ुद शिकार करने के लिए निकल गया। अब ये उसका मामूल बन चुका था। लेकिन एक दिन बड़ा मेंढक उधर आन पहुँचा। उसने तमाम हड्डियों को टुकड़े कर दिया।
“आदमी और जानवर ज़्यादा ज़िंदा क्यों नहीं रहते?” उसने कव्वों से कहा।
“जब वो आए तो उसे ये भी कहना कि मैं इधर जोहड़ के किनारे रहता हूँ
अगर वो मुझसे मिलना चाहता है तो फिर उसे ख़ुद वहाँ आना होगा।”


उधर शेर कुछ आराम करने के लिए घास पर लेटा हुआ था। उसने उड़ना चाहा लेकिन उसने महसूस किया कि वो ऐसा नहीं कर सकता। अब वो सख़्त ग़ुस्से में था। उसने सोचा कि हिसार पर यक़ीनन कुछ न कुछ हुआ है लिहाज़ा वो घर की तरफ़ चल दिया।
“तुमने क्या किया है कि मैं अब उड़ नहीं सकता?” वो जब घर पहुँचा तो उसने कव्वों से पूछा।
“कोई यहाँ आया था और उसने हड्डियों के टुकड़े कर दिए।” कव्वों ने जवाब दिया और बोले
“अगर तुम उससे मिलना चाहते हो तो वो तुम्हें जोहड़ के किनारे मिल सकता है।”


शेर जब वहाँ पहुँचा तो मेंढक जोहड़ में पानी के किनारे के साथ बैठा हुआ था। “हो!” वो शेर को देखते ही ऊँची आवाज़ में बोला और फ़ौरन पानी में ग़ोता लगा कर जोहड़ के दूसरे किनारे पर जा निकला। शेर भी चक्कर लगा कर वहाँ पहुँच गया लेकिन मेंढक दुबारा ग़ोता लगा गया। बड़ी कोशिश के बावजूद शेर जब उसे न पकड़ सका तो मायूस हो कर घर वापस आ गया।
कहा जाता है कि तब से आज तक शेर अपने पैरों पर चलता है। और सफ़ेद कव्वे भी तब से बिलकुल बहरे हो चुके हैं। जब उनसे पूछा गया था कि
क्या हुआ है? और उन्होंने जवाब में बस इतना कहा था कि
“इस मुआमले में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।”


क्या तुम बता सकते हो कि
हुआ क्या था?

- nasar-malik


एक थी मैना
एक था कव्वा
मैना का घर मोम का था और कव्वे का नून का था। मैना ने एक दिन खिचड़ी पकाई। बाज़ार बंद हो गया था। नमक न मिला तो उसने अपने बच्चे को कव्वे के पास भेजा कि अपने घर में से ज़रा सा नून दे-दे। मैना के बच्चे ने जब कव्वे से ये बात जा कर कही तो कव्वा बहुत ख़फ़ा हुआ और कहने लगा
“जा-जा बड़ा बेचारा नमक माँगने वाला आया


तेरी हंडिया की ख़ातिर मैं अपने घर की दीवार तोड़ दूँ
तब तुझको नमक दूँ
ऐसे बेवक़ूफ़ मैना के महल्ला में रहते होंगे।”
मैना का बच्चा अपना सामना ले कर माँ के पास आ गया और उसने दोनों हाथ उठा कर ख़ुदा से दुआ की कि


इलाही घमंड करने वालों को नीचा दिखा
ये दुआ करनी थी कि ऐसा मेंह बरसा कि जल-थल भर गए। कव्वे का घर तो नून का था
सब बह गया
मैना का घर मोम का था


उसको कुछ भी नुक़्सान न पहुँचा। जब कव्वे का घर बर्बाद हो गया तो वो मैना के पास आया और उससे कहने लगा
“बी मैना रात की रात मुझे अपने घर में ठहरा लो।”
मैना ने जवाब दिया
“तू ग़ुरूर का कलिमा बोला था और मुझको नमक न दिया था। ख़ुदा ने उसका बदला दिखाया है


अब मैं तुझे घर में क्यों ठहराऊँ
तू बड़ा ख़ुद-ग़रज़ और ख़ुदा का गुनहगार बंदा है।”
कव्वे ने बहुत आजिज़ी की तो मैना को तरस आ गया और उसने ख़याल किया कि ऐसा न हो ख़ुदा मुझसे भी नाराज़ हो जाए कि तूने मुसीबत-ज़दा की मदद क्यों न की
इस वास्ते उसने दरवाज़ा खोल दिया और कव्वे को अंदर बुला लिया। कव्वे ने कहा


“आपा मैना मैं कहाँ बैठूँ?”
मैना बोली
“चूल्हे पर बैठ जा।”
कव्वे ने कहा


“मैं जल मरूँगा
मैं जल मरूँगा।”
मैना ने कहा
“अच्छा जा मेरी चक्की पर बैठ जा।”


कव्वा बोला
“मैं पिस मरूँगा
मैं पिस मरूँगा।”
मैना ने कहा


“अच्छा मेरे चरखे पर बैठ जा।”
कव्वा बोला
“मैं कट मरूँगा
मैं कट मरूँगा।”


तो मैना ने कहा
“अच्छा
कोठरी में जा बैठ
वहाँ मेरे चने भरे हुए हैं। उनको न खा लीजो।”


कव्वे ने कहा
“तौबा है आपा मैना
तुम भी कैसी बदगुमान हो। तुम तो मुझ पर एहसान करो
घर में जगह दो और मैं तुम्हारे हाँ चोरी करूँगा। तौबा तौबा! उसका तो ख़याल भी न करना।”


मैना ने कोठरी खोल दी और कव्वा अंदर जा कर बैठ गया। आधी रात को मैना की आँख खुली तो कोठरी में कुछ खाने की आवाज़ आई। मीना ने पूछा
“भाई कव्वे क्या खा रहे हो।”
बोला
“आपा मैना


मेरी ससुराल से बन आए थे। वो सर्दी में चबा रहा हूँ।”
मैना चुपकी हुई
पिछली रात को मैना की आँख फिर खुली तो खाने की आवाज़ आई और मैना ने फिर पूछा तो कव्वे ने वही जवाब दिया। कव्वा सब जानवरों से पहले जागा करता है। मैना अभी बिछौनों से उठी भी न थी जो कव्वा कोठरी से निकल कर भाग गया। मैना ने उठ कर देखा तो सारी कोठरी ख़ाली थी। कव्वे ने सब चने खा लिए थे। उस वक़्त मैना ने कहा
“बदज़ात और शरीर के साथ एहसान करने का ये बदला है।”


- laila-khwaja-bano


नन्ही शीला एक दिन अपनी गुड़ियों के लिए चाय बना रही थी
कि यकायक उसके घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई। शीला ने ख़याल किया कि उसकी कोई सहेली उससे मिलने आई है। लेकिन जब उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि एक औरत अपने तीन बच्चों को गोद में लिए खड़ी है।
उस औरत के बाज़ुओं के साथ सात रंग के ख़ूबसूरत पर भी लगे थे और माथे पर एक सितारा जगमगा रहा था और लिबास तो ऐसा था जैसे तितली के परों का बना हो।
शीला उसे मुस्कुराता देख कर कहने लगी


“ख़ूबसूरत औरत
तुम कौन हो?”
औरत बोली
“मैं हूँ सितारा परी।”


शीला ने पूछा
“तुम्हें मुझसे क्या काम है?”
सितारा परी बोली
“ज़रा मुझे अपने घर में दाख़िल होने की इजाज़त दो।”


शीला कहने लगी
“घर में घुस कर क्या करोगी?”
सितारा परी बोली
“अपने बच्चों को तुम्हारे ग़ुस्ल-ख़ाने में नहलाऊँगी।”


शीला ने जवाब दिया
“अच्छा नहला लो।”
अब परी अपने बाल-बच्चों को ग़ुस्ल-ख़ाने में नहलाने लगी और शीला अपनी ख़ूबसूरत मेहमान को तवाज़ो की लिए दौड़ कर बाज़ार से बिस्कुट लेने चली गई। वापस आई तो देखा कि उसकी ख़ूबसूरत मेहमान ग़ायब है। लेकिन ग़ुस्ल-ख़ाना ख़ुशबुओं से महक रहा है।
शीला ने हैरत से ग़ुस्ल-ख़ाने में इधर-उधर नज़र दौड़ाई तो देखा कि परी अपना एक ख़ूबसूरत दस्ताना अलगनी पर भूल गई है। दस्ताना प्यारा था। उसे देखते ही शीला के मुँह से मारे ख़ुशी के एक चीख़ निकल गई। उसने दौड़ कर उसे पहन लिया। दस्ताना पहनते ही वो एक और ही दुनिया में पहुँच गई।


उसने देखा कि वो बालाई के एक पहाड़ पर खड़ी है जिससे दूध की नदियाँ नीचे को बह रही हैं। पहाड़ पर चाँदी के छोटे-छोटे चमचे भी बिखरे थे। शीला ने एक चमचा उठा लिया और बालाई के पहाड़ों की मज़ेदार चोटियाँ खाने लगी। बालाई खाने के बाद उसे प्यास महसूस हुई तो वो नीचे उतर आई। दूध की नद्दियों के किनारे मिस्री के कटोरे रखे थे एक कटोरा नदी के दूध से भर कर उसने पिया और फिर आगे बढ़ी। हर तरफ़ बाग़ ही बाग़ नज़र आ रहे थे। जिनमें रंग-बिरंग शर्बत के फ़व्वारे नाच रहे थे। फ़व्वारों के हौज़ के किनारों पर ज़मुर्रद के छोटे-छोटे गिलास रखे थे। उसने एक फ़व्वारे से शर्बत का एक गिलास पिया। फिर दूसरे फ़व्वारे से फिर तीसरे फ़व्वारे से क्योंकि हर फ़व्वारे के शर्बत का मज़ा नया था।
उसके बाद शीला ने बाग़ को ग़ौर से देखना शुरू किया। मालूम हुआ कि उसमें चहकने वाले पंछी भी मिठाई के हैं। एक कोयल और एक बुलबुल शीला ने पकड़ कर खाई। और फिर आगे बढ़ी। आगे एक बड़ा ख़ूबसूरत बाज़ार आ गया
जिसमें हर तरफ़ परियाँ ही परियाँ नज़र आती थीं। शीला उनमें जा घुसी और बाज़ार का तमाशा देखने लगी।
दुकानों पर बड़ी-बड़ी अजीब चीज़ें बिक रही थीं। रंग-बिरंग फूल


तितलियाँ
सितारे
मोती
कल के उड़ने वाले पंछी


गुल-दान
मुरब्बे
जैम
चॉकलेट और तरह-तरह के खिलौने।


यकायक शीला को सितारा परी अपने बच्चों के साथ एक दुकान पर खड़ी नज़र आई। वो एक दुकान से अपने बच्चों के लिए नर्गिस के फूल चुरा रही थी।
शीला चिल्ला कर बोली
“सितारा परी! दुकानदार के फूल क्यों चुरा रही हो?”
सितारा परी ने मुड़ कर उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुरा कर बोली


“शीला मेरे क़रीब आओ।”
जब शीला उसके पास आई तो सितारा परी ने उसकी आँखों पर अपने नर्म-नर्म हाथ रख दिए और बोली
“शीला
जो कुछ देख रही हो


न देखो। जो कुछ सोच रही हो
न सोचो। जो कुछ देख चुकी हो
भूल जाओ।”
इसके बाद सितारा परी ने ज़ोर से एक ख़ूबसूरत क़हक़हा लगाया और अपने नर्म-नर्म हाथ शीला की आँखों से हटा लिए।


शीला डर गई। उसने आँखें फाड़-फाड़ कर चारों तरफ़ देखना शुरू किया। अब वहाँ कुछ भी न था। वो अपने बिस्तर पर लेटी थी।
उसके भैया का सफ़ेद मुर्ग़ा कुक्कड़ूँ कूँ कुक्कड़ूँ कूँ कर रहा था कि आसमान पर सुबह का सितारा उसकी तरफ़ देख-देख कर शरारत से मुस्कुरा रहा था।

- raja-mehdi-ali-khan


एक था कछुआ। अक्सर समुंदर से निकल कर रेत पर बैठ जाता और सोचने लगता दुनिया भर की बातें
समुंदर के तमाम कछुए उसे अपना गुरु मानते थे इसलिए कि वो हमेशा अच्छे और मुनासिब मश्वरे दिया करता था। मसलन रेत पर अंडे देने के लिए कौन सी जगह मुनासिब होगी
उमूमन दुश्मन अंडों को तोड़ दिया करते थे इसलिए इस बुज़ुर्ग कछुए की राय लेना ज़रूरी समझा जाता था। गुरु ने अंडे देने के लिए जो जगह बताई वहाँ कोई दुश्मन कभी नहीं पहुँच सका
फिर गुरु जी समुंदर की लहरों को देख कर अंदाज़ा लगा लेते थे कि समुंदरी तूफ़ान कब आएगा


समुंदर की लहरें कितनी तेज़ हो सकती हैं।
तमाम कछुए अपने बाल बच्चों को लेकर साहिल के क़रीब किस मुक़ाम पर रहें। तूफ़ान कितनी देर रहेगा
ये समझो बच्चो ज़हीन
दूर अंदेश


फ़लसफ़ी क़िस्म का कछुआ था वो।
एक सुबह समुंदर से निकल कर वो कछुआ रेत पर बैठा सोच रहा था
हम तो समुंदर और रेत पर रहते हैं
पास ही जो बस्ती है वहाँ लोग किस तरह रहते होंगे। सोचते-सोचते उसकी ख़्वाहिश हुई कि वो बस्ती की तरफ़ जाए और अपनी आँखों से वहाँ का हाल देखे। तुम तो जानते ही हो कि कछुए की चाल कैसी होती है


बहुत ही आहिस्ता-आहिस्ता चलता है ना वो। अपनी ख़ास चाल से आहिस्ता-आहिस्ता चला और पहुँच गया बस्ती में।
बस्ती में पहुँचते ही उसे एक आवाज़ सुनाई दी
‘छप-छप’ फिर ये आवाज़ बंद हो गई
थोड़ी देर बाद फिर वही आवाज़ सुनाई दी


‘छप-छप’ फिर ये आवाज़ रुक गई। कछुए को यक़ीन आ गया कि ये पानी की आवाज़ है। कहीं क़रीब ही पानी में कोई चीज़ उछल रही है। फिर आवाज़ आई
‘छप-छप’ कछुए की समझ में ये बात आ गई कि पानी की आवाज़ बहुत पास से आ रही है और उसमें कोई जानवर उछल रहा है। वो आहिस्ता-आहिस्ता अपनी ख़ास चाल से उस जानिब चला कि जहाँ से आवाज़ आ रही थी और पहुँच गया एक कुँएँ के पास। अंदर झाँक कर देखा तो वहाँ पानी नज़र आया। पानी में आवाज़ एक मेंढक की उछल-कूद से हो रही थी। मेंढक फिर उछला और आवाज़ आई
‘छप-छप।’
कछुए ने पूछा


“भाई मेंढक
बड़े ख़ुश नज़र आ रहे हो
बात क्या है
ख़ूब उछल रहे हो कुँएँ के पानी में?”


मेंढक ने जवाब दिया
“मैं हमेशा ख़ुश रहता हूँ और कुँएँ के पानी में इसी तरह उछलता रहता हूँ।”
कछुए ने कुछ सोचते हुए कहा
“कुँआँ गहरा तो है लेकिन तुम अंदर नहीं जा सकते।”


“भला मैं अंदर क्यों जाऊँ
गहराई में तो मेरा दम घुट जाएगा मेंढक ने जवाब दिया।”
“तुम सिर्फ़ उसकी सतह ही पर उछल कूद कर सकते हो।” कछुए ने कहा।
“हाँ इस पानी में मुझे इसी तरह छपाक-छपाक करते हुए अच्छा लगता है।”


“और पानी तो ईंटों की दीवारों से घिरा हुआ है
तुम ईंटों के दरमयान बंद हो।”
“कमाल करते हो भाई अगर कुँएँ के गिर्द दीवार न हो तो पानी बह जाएगा और मैं भी बह जाऊँगा फिर कुँआँ कहाँ रहेगा।” मेंढक ने कहा।
“वही तो मैं सोच रहा हूँ।” फ़लसफ़ी कछुए ने कुछ कहना चाहा लेकिन ख़ामोश रहा।


“क्या सोच रहे हो भाई
इस कुँएँ में तुम समा नहीं सकते यही सोच रहे हो ना... मेरी क़िस्मत पर रश्क आ रहा है तुम्हें।” मेंढक ने तंज़िया अंदाज़ में कहा।
“नहीं मेंढक जी
मैं तो ये सोच रहा हूँ कि तुम कुँएँ के मेंढक हो और हमेशा कुँएँ के मेंढक ही बने रहोगे


तुमने समुंदर नहीं देखा
समुंदर देखोगे ना तो इल्म होगा कि पानी क्या होता है।” कछुए ने अपनी बात समझाई।
“समुंदर क्या होता है?” मेंढक ने पूछा।
“समुंदर पानी का एक बहुत बड़ा


बहुत ही बड़ा और बहुत ही बड़ा कुँआँ होता है जो दीवारों के दरमयान नहीं होता। उसके गिर्द कोई दीवार नहीं होती ईंटों-पत्थरों की कोई दीवार नहीं होती। जहाँ तक देखोगे ना पानी ही पानी नज़र आएगा। समुंदर ने सारी दुनिया को घेर रखा है। हम समुंदर ही में रहते हैं। तुम वहाँ नहीं रह सकते।”
“क्यों नहीं रह सकते भला?” मेंढक ने दरयाफ़्त किया।
“इसलिए कि तुम उसके बहाव में बह जाओगे और तुम्हारी ख़बर ता-क़यामत किसी को नहीं मिलेगी। हाँ एक बात हो सकती है।” फ़लसफ़ी कछुए ने सोचते हुए कहा...
“क्या? कौन सी बात?” मेंढक ने पूछा।


“ये हो सकता है कि तुम कुँएँ से निकल कर मेरे साथ समुंदर की तरफ़ चलो
देखो समुंदर क्या है
उसकी लहरें कैसी हैं
हम कछुए वहाँ किस तरह रहते हैं।”


“नहीं भाई
मैं तो इसी कुँएँ में ख़ुश हूँ। मैं नहीं जाता समुंदर-वमुंदर देखने
तुम्ही को मुबारक हो समुंदर।”
“तो तुम ज़िंदगी भर फिर कुँएँ के मेंढक ही बने रहोगे।” कछुए ने ग़ैरत दिलाई...


“यही मेरी तक़दीर है तो मैं क्या करूँ?” मेंढक ने जवाब दिया
उसके लहजे में उदासी थी।
“देखो तक़दीर-वक़दीर कोई चीज़ नहीं होती। हम अपनी तक़दीर ख़ुद बनाते हैं
तुम चाहो तो ख़ुद अपनी तक़दीर बना सकते हो।” कछुए ने समझाने की कोशिश की।


“भला किस तरह? तुम तो कहते हो कि मैं समुंदर में जाऊँगा तो पानी में बह जाऊँगा
मेरा अता-पता भी न होगा।”
“ये तो सच्ची बात है लेकिन तुम समुंदर के अंदर नहीं उसके पास रह सकते हो
जिस तरह दूसरे सैंकड़ों-हज़ारों मेंढक रहते हैं। वहाँ बड़े-बड़े मेंढक भी होते हैं और छोटे-छोटे भी तुम्हारी तरह


समुंदर के किनारे कई मुक़ामात पर पानी जमा रहता है कि जिसमें मेंढक रहते हैं। वहाँ रह कर समुंदर का नज़्ज़ारा भी करते हैं
निकलते हुए ख़ूबसूरत सूरज को भी देखते हैं
डूबते हुए प्यारे सूरज का मंज़र भी देखते हैं
सूरज की ख़ूबसूरत रौशनी को लहरों पर देख कर उछलते हैं


ख़ुश होते हैं
तुमसे ज़्यादा छपाक-छपाक छप-छप करते हैं। उनके बाल बच्चे हैं जो खिलखिला कर हंसते हैं। रात में चाँदनी का मज़ा लूटते हैं
उन्हें साहिल की ठंडी हवाएँ मिलती हैं
वहाँ उनकी ग़िज़ा का भी इंतिज़ाम है। तुम्हें इस कुँएँ में क्या मिलता है। बाहर निकल कर तो देखो दुनिया कितनी ख़ूबसूरत और कितनी प्यारी है


हवाओं में दरख़्त किस तरह झूमते हैं
समुंदर की लहरें किस तरह उठती हैं
कैसी कैसी ख़ूबसूरत मछलियाँ साहिल तक आती हैं। तुम तो कुँएँ के अंदर बंद हो दुनिया से अलग
मेरे साथ चल कर देख लो अगर समुंदरी इलाक़ा तुम्हें पसंद आए तो वहीं रह जाना और पसंद न आए तो वापस आ जाना और बन जाना कुँएँ का मेंढक। मैं तो तुम्हें दुनिया और इसकी ख़ूबसूरती दिखाना चाहता हूँ। तुमने कुँएँ के अंदर रह कर भला देखा क्या है


कुछ भी तो नहीं। बोलो चलोगे मेरे साथ समुंदर की तरफ़ या यहाँ रहोगे कुँएँ का मेंढक बन कर?” कछुए ने साफ़ जवाब तलब किया।
मेंढक सोचने लगा ये तो सच है कि मैंने दुनिया को नहीं देखा है इसी कुँएँ में जन्म लिया और इसी में उछल कूद कर रहा हूँ
दुनिया और इसकी ख़ूबसूरती को देख लेने में मज़ायक़ा क्या है।
“चलो तुम्हारे साथ चलता हूँ। जगह पसंद न आई तो वापस आ जाऊँगा।” मेंढक ने कहा।


“ठीक है ऐसा ही करना लेकिन मुझे यक़ीन है कि तुम्हें समुंदर की आज़ाद फ़िज़ा और दुनिया की ख़ूबसूरती बहुत भली लगेगी और तुम वहाँ से वापस आना पसंद न करोगे। कुँएँ का मेंढक बन कर रहने वाले घुट-घुट कर मर जाते हैं। उन्हें दुनिया कब नज़र आती है।”
मेंढक बाहर आ गया और दोनों समुंदर की जानिब रवाना हो गए। समुंदर के साहिल पर पहुँचते ही मेंढक की बाँछें खिल गईं। भला उसने कब देखा था ये माहौल
कब देखा था समुंदर की ख़ूबसूरत लहरों को
उभरते हुए सूरज को


मछलियों के ख़ूबसूरत रंगों को और कछुओं की फ़ौज को और मेंढकों के हुजूम को।
कुँएँ का मेंढक ख़ुश हो गया
पहली बार उसे ठंडी हवा नसीब हुई
पहली बार उसने देखा दुनिया कितनी बड़ी है


पहली बार देखा कि तमाम कछुए
तमाम मछलियाँ और तमाम आबी-जानवर और तमाम छोटे-बड़े मेंढक कितने आज़ाद हैं। सब ख़ुशी से नाच रहे हों जैसे।
ये सब देख कर मेंढक ने कछुए से कहा
“भाई तुमने मुझ पर बड़ा एहसान किया है


कुँएँ की ज़िंदगी से बाहर निकाला है। अब तो मैं हरगिज़-हरगिज़ कुँएँ के अंदर नहीं जाऊँगा यहीं रहूँगा अपने नए दोस्तों के साथ। दुनिया देखूँगा
दुनिया की ख़ूबसूरती का नज़्ज़ारा करूँगा
ख़ूब खाऊँगा
नाचूँगा


गीत गाऊँगा।
कुँएँ के मेंढक के इस फ़ैसले से कछुआ बहुत ख़ुश हुआ। उसने ये ख़ुश-ख़बरी सबको सुनाई
कुछोओं को
मेंढकों को


मछलियों को
तमाम आबी जानवरों और आबी परिंदों को
सब ख़ुशी से नाचने लगे गाने लगे।
कुँएँ के मेंढक ने सोचा


“अगर मैं कुँएँ में रहता तो ये जश्न कब देखता।” उसने ज़रा फ़ख़्र से सोचा
“भला ऐसा इस्तिक़बाल कब किसी मेंढक का हुआ होगा।”
गुरु कछुए और इस मेंढक में गहरी दोस्ती हो गई। नई आज़ाद ख़ूबसूरत सी प्यारी दुनिया को पाकर मेंढक भूल गया कुँएँ को।

- shakil-ur-rahman


गर्मियों की एक तपती दोपहर में जब सूरज आग बरसा रहा था और लू के थपेड़े सूखे पत्तों को बगूलों की शक्ल में उड़ा रहे थे
फज़लू अपने आम के बाग़ में तोतों को उड़ाने में मशग़ूल था। शरीर तोते हरे-हरे पत्तों में छुपे चोरी-चोरी आम कुतर रहे थे। फज़लू मिट्टी का ढेला रस्सी की ग़ुलील में रख घुमाता और दरख़्त की तरफ़ उछाल देता। तोतों का ग़ोल टें-टें करता भर्रा मार कर उड़ता और किसी दूसरे दरख़्त पर जा बैठता। हर तरफ़ सन्नाटा था सिर्फ़ मस्जिद के पीछे वाली पनचक्की की फ़क़-फ़क़ की आवाज़ आ रही थी। वो कुछ देर के लिए जामुन के दरख़्त की छाओं में सुस्ताने के लिए बैठ गया। अभी उसने बाँसुरी जेब से निकाल कर होंटों से लगाई ही थी कि सामने कुकुरवंदों की झाड़ियों में से एक ख़ूँ-ख़्वार चीता बरामद हुआ। चीते ने क़रीब आ कर बड़े दोस्ताना अंदाज़ में फज़लू से कहा
“क्यों भाई फज़लू क्या हाल हैं? इस बार तो तुम्हारे बाग़ में ख़ूब बहार आई हुई है।”
चीते को देख कर फज़लू की सिट्टी गुम हो गई और उसके होंटों से बाँसुरी फिसल कर घास पर गिर गई और उसने सिटपिटा कर कहा


“शुक्र है जनाब। बस अल्लाह का करम है।”
“दोस्त ज़रा जल्दी करो। मेरे लंच का वक़्त है। वो सामने जो दो बैल बंधे हैं उनमें से सफ़ेद वाला ले आओ। उसका गोश्त यक़ीनन लज़ीज़ होगा।”
पहले तो फज़लू की जान में जान आई कि जंगल के बादशाह की उस पर बुरी नज़र नहीं है। इसके बाद उसने कुछ सोच कर इल्तिजा की
“हुज़ूर ये बैल तो मेरी रोटी-रोज़ी का सहारा हैं। इसके बग़ैर में खेती कैसे करूँगा।”


“भई हमसे ये फ़ुज़ूल बातें मत करो। ये तुम्हारा मुआमला है। जल्दी बैल नहला कर लाओ इतने मैं पंजे और दाँत तेज़ कर लूँ।”
“जो हुक्म सरकार
लेकिन आप यक़ीन करें कि इस बूढ़े बैल के मुक़ाबले में मेरी गाय का गोश्त बहुत नर्म और लज़ीज़ होगा। अगर आप कहें तो मैं घर से गाय खोल लाऊँ।” फज़लू ने काँपते हुए कहा।
“अच्छा तो फिर दौड़ता हुआ जा और फटाफट आ। सोच ले अगर देर हुई तो मैं तेरे दोनों बैलों को हड़प कर जाऊँगा।” शेर दहाड़ा...


फज़लू सीधा अपने दोस्त शरफ़ू दर्ज़ी के पास गया। शरफ़ू न सिर्फ़ बहुत ज़हीन था बल्कि फज़लू से उसकी गहरी दोस्ती भी थी। फज़लू ने अपने दोस्त को पूरी कहानी सुनाते हुए तजवीज़ माँगी कि कैसे भूके चीते से पीछा छुड़ाया जाए।
शरफ़ू थोड़ी देर तक अपने गंजे सर पर दो उंगलियों से तबला बजाता रहा और फिर बोला
“ठीक है दोस्त। तुम फ़िक्र न करो मैं कुछ बंद-ओ-बस्त करता हूँ।”
शरफ़ू ने अलमारी में से सफ़ेद लट्ठे के दो थान निकाले। कपड़ा ज़मीन पर बिछा कर उसने काटना शुरू किया और दस मिनट में दस फुट लंबा एक पायजामा तैयार कर लिया। इसके बाद उसने अपने छप्पर से दो बाँस निकाले और फज़लू से कहा कि वो ये बाँस रस्सी से अच्छी तरह अपने पैरों में बाँध ले। इसके बाद शरफ़ू ने वो पाएजामा बाँसों और फज़लू के पैरों पर चढ़ा दिया। जब फज़लू दीवार का सहार लेकर खड़ा हुआ तो उसका क़द पंद्रह फिट हो चुका था और शरफ़ू उसके सामने बौना लग रहा था। फज़लू लेट कर दरवाज़े से निकला और बाग़ की तरफ़ चल दिया। रास्ते में लोग हैरत से उसको मुड़-मुड़ कर देख रहे थे। फज़लू ने सर पर एक बड़ा पग्गड़ बाँधा हुआ था और वो हुंकारता हुआ जा रहा था।


“अरे मुझे भूक लग रही है। बहुत दिन हो गए किसी चीते का गोश्त नहीं खाया। दो दिन पहले एक शेर खाया था लेकिन मज़ा नहीं आया।”
बाग़ की मेंढ़ पर भूक से बिलबिलाते चीते ने देखा कि एक देव नुमा मख़लूक़ उसे खाने के लिए बेचैन है तो वो दुम दबा कर भाग निकला।
जिस तरह इन्सानों को एक न एक ख़ुशामदी की ज़रूरत होती है जो उसकी झूटी तारीफ़ करता रहे उसी तरह गीदड़ झगड़ालू
चीते का ख़ास चमचा था जो हर वक़्त उसकी ख़ुशामद में लगा रहता ताकि चीते की झूटी हड्डियाँ उसे मिल सकें। गीदड़ झगड़ालू जामुन के दरख़्त के नीचे छिपा ये सारा माजरा देख रहा था। चीते को दुम दबा कर भागता देख कर उसने चीते को रोक कर कहा


“हुज़ूर आप कहाँ भागे जा रहे हैं। फज़लू ने आपको बेवक़ूफ़ बनाया है। ये भूत नहीं फज़लू का दोस्त शरफ़ू दर्ज़ी है। उसने आपको डराने के लिए भेस बदला है।”
“मुझे मालूम है तू झूटा है। तू मुझे उस भूत के हवाले कर के चम्पत हो जाएगा।” चीते ने ग़ुस्से से कहा।
“हुज़ूर अगर आप मुझे झूटा समझते हैं तो मेरी दुम अपनी दुम से बाँध लें ताकि आपकी मुसीबत के वक़्त मैं भाग न सकूँ।”
ये सुन कर चीते को इत्मेनान हुआ और उसने अपनी दुम गीदड़ झगड़ालू की दुम से बाँध ली और वापस बाग़ का रुख़ किया। शरफ़ू ने गीदड़ और चीते को खुसर-पुसर करते हुए देख लिया था और उसने ताड़ लिया था कि चीता वापस आ कर हमला करने की कोशिश करेगा। शरफ़ू जल्दी से नीम के दरख़्त पर लगे शहद की मक्खियों के छत्ते के नज़दीक गया और ज़ोर से उस पर हाथ मारा। शहद की मक्खियाँ उसके चेहरे पर लिपट गईं और डंक मारने शुरू कर दिए। शरफ़ू ने क़रीब रखी चूने की बाल्टी से चौंका निकाल कर अपने चेहरे पर मिल लिया। उसे मालूम था कि चूना शहद की मक्खियों के काटे का फ़ौरी ईलाज है। अब उसका चेहरा सूज कर ग़ुब्बारा हो गया था और चूना लगने की वजह से बहुत भयानक लग रहा था। चीते और गीदड़ को अपनी तरफ़ आता देख शरफ़ू ने कहा


“शाबाश गीदड़ मियाँ
तुम हमारे साथ मिल कर चीते को बाँध कर लाने में कामयाब हो गए हम तुम्हें खाने के बाद ईनाम देंगे।”
चीते ने जो क़रीब आ कर शरफ़ू को देखा तो वो उसे भूत समझ कर काँप गया। उसको गीदड़ पर भी बहुत ग़ुस्सा आ रहा था जो उसको फाँस कर वापस लाया था। चीता डर कर भाग खड़ा हुआ। क्योंकि गीदड़ उसकी दुम से बंधा हुआ था इसलिए वो भी गड्ढों
काँटों में घिसटता जा रहा था


एक पत्थर से टकरा कर वो चीते की दुम से अलग हुआ और पानी से भरे एक गहरे गड्ढे में जा गिरा।
फज़लू की जान में जान आई और उसे अक़्लमंद और मेहरबान दोस्त को गले लगाने के लिए जामुन के दरख़्त पर चढ़ना पड़ा।

- waqar-mohsin


आज नन्ही कंवल को ज़ुकाम हो गया था। बात ये हुई कि सर्दी बहुत थी और कंवल को पानी में खेलना बहुत अच्छा लगता था। घर में अम्मी और नर्सरी में आँटी बहुत मना करतीं
बहुत रोकतीं
आंटी नर्सरी में समझातीं
मगर रबर के ग़ुबारों में पानी भर कर उसका फ़व्वारा बनाना


उसे दूसरों पर फेंकना और पानी के सारे खेल उसे बहुत अच्छे लगते थे और नंगे पाँव घूमने में तो उसे बहुत ही मज़ा आता था। बस फिर उसे ज़ुकाम हो गया। नाक से पानी
आँखों से पानी
आँखें लाल
आछ्छीं


खों-खों और फिर बुख़ार भी हो गया। अब वो नर्सरी कैसे जाती। तो उसे छुट्टी करनी पड़ी।
घर पर अकेले लेटे-लेटे उसका जी बहुत घबरा रहा था। अम्मी घर के काम में लग गई थीं। बहन-भाई सब अपने-अपने स्कूल चले गए थे और अब्बा अपने दफ़्तर। पड़ोस के बच्चे भी सब अपने-अपने स्कूल जा चुके थे और बाहर गली में खेलने पर अम्मी बहुत ख़फ़ा होती थीं।
जब लेटे-लेटे उसका जी घबराया तो वो चुपके से उठी और घर के सामने छोटे से बाग़ीचे में चली गई और आहिस्ता-आहिस्ता अपनी गेंद से खेलने लगी। मगर अकेले कब तक खेलती... बस उसका ध्यान फूलों पर इधर से उधर उड़ती तितलियों की तरफ़ चला गया। रंग-बिरंगी तितलियाँ। लाल
पीली


नीली तितलियाँ
फूलों पर नाचती फिर रही थीं। वो एक तितली के पीछे भाग रही थी कि उसकी नज़र एक भँवरे पर गई।
भुन-भुन करता काला-कलूटा भंवरा जल्दी-जल्दी एक फूल से दूसरे फूल पर और दूसरे से तीसरे पर उड़ता फिर रहा था। जब वो किसी फूल पर बैठता तो फूल की पतली सी डंडी झूलने लगती। नन्ही कंवल थोड़ी देर भँवरे को ग़ौर से घूरती रही और फिर जैसे कोई अपने आपसे बोलने लगे
उसने बोलना शुरू कर दिया...


“मियाँ भँवरे
मियाँ भँवरे
तुम इतने परेशान क्यों हो? और तुम इतने काले-कलूटे क्यों हो? ये सब तितलियाँ तो कितनी रंग-बिरंगी और सुंदर हैं?”
नन्ही कंवल एक आवाज़ सुन कर एक दम चौंक पड़ी।


“क्या तुम मेरी कहानी सुनोगी?” उसने फिर वही आवाज़ सुनी और फिर उसे यक़ीन हो गया कि ये भँवरे की ही आवाज़ है। भंवरा भुन-भुन कर रहा था और उसी में से ये आवाज़ थी।
“क्यों! क्या तुम्हारी कोई कहानी है?” कंवल ने हैरत से पूछा...
“हाँ सुनो।” भँवरे ने जवाब दिया।
“मैं एक देस का राजा था। यहाँ से बहुत दूर देस का। मुझे सोने-चाँदी हीरे-मोती से बड़ा प्यार था। मेरा महल सोने का था। उसमें चाँदी के दरवाज़े थे


हीरे-मोती के पर्दे थे। मैं सोने-चाँदी के बर्तनों में खाता-पीता था।
एक दिन मैंने अपने बाग़ में टहलते हुए सोचा। ये फूल-पत्ते
हरी-हरी घास सब सूख कर कूड़े का ढेर बन जाते हैं
और हाँ मुझे चिड़ियों की चूँ-चूँ


कबूतरों की गुटर-गूँ का शोर भी अच्छा नहीं लगता था। बस मैंने एक दम हुक्म दिया। ये सारे बाग़ उजाड़ दिए जाएँ। फूल-पत्ते नोच कर फेंक दिए जाएँ। चिड़ियों को मार दिया जाए। बाग़ में सोने-चाँदी के फूलों के पौदे लगाए जाएँ
उनमें सोने-चाँदी की घंटियाँ बाँधी जाएँ।
बस मेरा हुक्म होने की देर थी। तमाम बाग़ उजड़ गए। चिड़ियाँ मर गईं। तितलियाँ भाग गईं और जगह-जगह सोने-चाँदी की घंटियाँ लगा दी गईं। मगर उसके बाद क्या हुआ ये मत पूछो!”
“क्या हुआ?” कंवल ने हैरत से पूछा...


“मेरे देस के बच्चे जो बाग़ों में खेलते-फिरते थे
तितलियों के पीछे दौड़ते फिरते थे
चिड़ियों के मीठे गीत सुनते थे वो सब उदास हो गए। और फिर बीमार हो गए। अब पढ़ने-लिखने में उनका दिल न लगता था। इसलिए बच्चों के माँ-बाप परेशान हो गए। वो मुझसे नाराज़ हो गए। उन्हें बहुत ग़ुस्सा आया और एक दिन देस के सारे बच्चों ने और उनके माँ-बाप ने मेरे महल को घेर लिया। मुझे महल से निकाल दिया। मेरे सारे बदन पर कालक मल दी। उन्होंने कहा
“तुम ने हमारे देस को उजाड़ दिया है। हमारे बच्चों को दुखी कर दिया है। उन्हें बीमार कर डाल दिया है। तुम्हारा सारा सोना-चाँदी हमारे किस काम का है। जाओ यहाँ से चले जाओ। बाग़ की रूठी हुई बहारों


फूलों
कलियों
हरी-हरी घास और झूमते पौदों को ले आओ। उन सब नाचती-गाती चिड़ियों और रंग रंगीली थिरकती तितलियों को लाओ जिन्हें तुमने देस से भगा दिया है। उन सब को मना लाओ तो इस देस आना।”
बस उसी दिन से मैं रूठे फूलों


कलियों और तितलियों को मनाता फिर रहा हूँ। मैं तुम्हारे इस हरे-भरे देस में फूलों
पत्तों और हरी-हरी घास की ख़ुशामद करता फिर रहा हूँ। नन्ही कंवल! क्या तुम उनसे मेरे देस चलने के लिए कह दोगी। अब मुझे फूलों
पत्तों
कलियों


तितलियों
चिड़ियों
सबसे बहुत प्यार हो गया है।”
नन्ही कंवल की अम्मी को जब अपने काम से ज़रा छुट्टी हुई तो वो उसे देखने उसके बिस्तर के पास आईं और जब वो वहाँ न मिली तो वो सीधी बाग़ में पहुँचीं। उन्होंने देखा कि कंवल फूलों की इक क्यारी के पास धूप में लेटी सो रही है और एक भंवरा उसके फूल जैसे लाल-लाल कल्ले के पास भुन-भुन करता हुआ उड़ रहा है।


- syeda-farhat


गर्मी में एक शेर शिकार को निकला। चिलचिलाती धूप में
तपती हुई ज़मीन पर चलने से वो जल्द ही थक गया और एक बड़े से साया-दार घने दरख़्त के नीचे आराम करने लेट गया।
अभी वो सोया ही था कि कुछ चूहे अपने बिलों से बाहर निकले और नादानी से उसकी पीठ पर उछलने कूदने लगे। इससे शेर की आँख खुल गई। वो ग़ुर्राया और ग़ुस्से में आ कर एक चूहे को अपने पंजे में दबोच लिया। अभी वो उसे मारने ही वाला था कि चूहे ने निहायत आजिज़ी से कहा
“ऐ जंगल के बादशाह मुझ ग़रीब पर रहम कीजिए। मुझ जैसे छोटे और कमज़ोर को मारने से आपकी ख़ानदानी शराफ़त पर आँच आएगी और सारे जंगल में बदनामी होगी कि जंगल के बादशाह शेर ने एक चूहे को मार दिया है।


ये बात सुन कर शेर ने उस पर तरस खाया और डरते-काँपते चूहे को आज़ाद कर दिया।
कुछ दिन बाद वही शेर शिकार के लिए जंगल में निकला। अभी शिकार की तलाश में वो इधर-उधर फिर ही रहा था कि अचानक शिकारियों के जाल में फंस गया। उसने निकलने के लिए बहुत हाथ-पाँव मारे
लेकिन जाल से न निकल सका। आख़िर परेशान और लाचार हो कर वो पूरे ज़ोर से दहाड़ा। जैसे ही चूहे ने शेर की दहाड़ने की आवाज़ सुनी
वो तेज़ी से वहाँ पहुँचा। देखा कि वही शेर है जिसने उसकी जान बख़्शी थी। वो शेर के पास गया और कहा


“ऐ बादशाह सलामत मैं आपका दोस्त हूँ। आपने मेरी जान बख़्शी थी। आप बिल्कुल फ़िक्र मत करें।”
ये कह कर वो जल्दी-जल्दी अपने नन्हे तेज़ दाँतों से जाल काटने लगा और ज़रा सी देर में जाल काट कर शेर को आज़ाद करा दिया।
जब शेर आज़ाद हुआ तो उसने सोचा कि वो भी इस एहसान के बदले कोई एहसान करे। ये सोच कर उसने चूहे से कहा
“ऐ दोस्त तूने मुझ पर एहसान किया है। जो तू मुझसे माँगेगा


मैं दूँगा। बोल क्या माँगता है?”
चूहा ये सुन कर ख़ुशी के मारे फूला न समाया और भूल गया कि वो अपने लायक़ क्या माँगे और कौन सी ऐसी चीज़ माँगे कि शेर उसे दे भी सके। अपनी हैसियत भूल कर उसने जल्दी से कहा
“ऐ बादशाह सलामत अपनी शेर-ज़ादी की शादी मुझसे कर दीजिए।
शेर ज़बान दे चुका था। उसने चूहे की बात मान ली और रिश्ता क़ुबूल कर लिया।


शादी के दिन नौजवान शेर-ज़ादी बन-ठन कर निकली और झूमती-झामती अठखेलियाँ करती हुई बे-फ़िक्री से चलने लगी। दूल्हा चूहा उसके इस्तक़बाल के लिए सामने खड़ा था कि बे-ख़्याली में इत्तिफ़ाक़ से शेर-ज़ादी दुल्हन का पाँव दूल्हा चूहे पर पड़ गया और वो बेचारा वहीं पिस कर ढेर हो गया।

- jameel-jalibi


“अब तक इस मकान में झाड़ू नहीं दी गई?” शमीम ने रौब जमाया...
“तो बड़ी काम-चोर हो गई है शहनाज़।”
और शहनाज़ अपने फटे हुए दुपट्टे से घरौंदे को इस तरह तनदही से साफ़ करने लगी जैसे वाक़ई वो इस घर की मामा हो और शमीम उसकी मालकिन। लोग अक्सर कहा करते हैं कि बच्चों में अमीर-ओ-ग़रीब की तमीज़ नहीं होती। वो खेलते वक़्त ये ख़्याल नहीं करते कि उनका साथी अमीर है या ग़रीब। लेकिन शहनाज़ को मालूम था कि ये हक़ीक़त नहीं है। वो समझती थी अगर ये बात सच होती तो शमीम और उसकी अमीर सहेलियाँ हमेशा ख़ुद शहज़ादी बन कर और मसहरी पर लेट कर उससे पैर न दबवाया करतीं। कभी उसे भी शहज़ादी बनने का हक़ हासिल था। लेकिन उसे इस हक़ से महरूम कर दिया गया था। खेलों में भी उसे मामा
चोर और बंदर जैसे ही पार्ट अदा करने पड़ते थे। ये बे-इंसाफ़ी क्यों की जाती थी उसके साथ? क्या सिर्फ़ इसलिए कि वो एक ग़रीब उस्तानी की लड़की थी।


आह! उसने सोचा
“अगर मेरे अब्बा जान की टाँगें फ़ौज में ज़ख़्मी न हो जातीं तो मैं भी शमीम की तरह मज़े करती। और बे-चारी अम्मी को स्कूल में दो सौ रुपय माहवार की नौकरी न करनी पड़ती।”
वो तक़रीबन पूरे घरौंदे को साफ़ कर चुकी थी। बे-ख़याली में उसका हाथ ग़लत पड़ा और घरौंदे का बावर्ची-ख़ाना गिर गया। एक-दो हत्तड़ उसकी पीठ पर पड़ा।
“कमीनी!” शमीम चीख़ी।


“हमारा बावर्ची-ख़ाना गिरा दिया। चल निकल यहाँ से
हमें तुझ जैसी काम-चोर मामा की ज़रूरत नहीं है।” और फिर उसने चोटी पकड़ कर उसे घरौंदे की हद से बाहर निकाल दिया। वो चुप-चाप मुँह लटका कर कल्लू तेली के चबूतरे पर बैठ गई और देखती रही कि प्रोफ़ेसर अल्ताफ़ हुसैन की लड़की रिहाना को बुला कर शमीम उसी के साथ खेलने लगी। फिर घर जा कर वो सूजी
घी
शकर और कई छोटे बर्तन ले आई। दोनों ने मिल कर हंडकलिया पकाई। जितना खाया गया खाया और बाक़ी अपने कुत्ते रूबी को बुला कर खिला दिया।


और उस रात टूटे हुए पलंग पर लेट कर शहनाज़ को हमेशा की तरह जल्द ही नींद न आई। उसका नन्हा सा दिमाग़ इधर-उधर चक्कर काटता रहा। और फिर न जाने कब नींद की देवी ने उसे अपनी आग़ोश में ले लिया। शहनाज़ ने ख़्वाब में देखा कि उसके लंगड़े अब्बा जान अच्छे हो गए हैं। उनका नाम भी अब सिर्फ़ सिद्दीक़ नहीं रहा बल्कि शमीम के डैडी सर मुहम्मद याक़ूब की तरह उन्हें भी सर मुहम्मद सिद्दीक़ कहा जाता है और फिर उसने देखा कि उसके पास शमीम और रिहाना की तरह भड़कीली पोशाकें
क़ीमती जूते और बहुत अच्छे अच्छे खिलौने हैं। फिर उसने अपने बाग़ में झूला डलवाया। उसे यूँ महसूस हुआ जैसे वो ख़ुद झूले पर बैठी है और शमीम पीछे खड़ी हो कर उसे झूला झुला रही है। पींग बढ़ती गई
बढ़ती ही गई और फिर झूले की रस्सी टूट गई। उड़ा उड़ा धड़ाम
वो टूटी हुई पलंगड़ी के नीचे पड़ी थी और अम्मी जान उसके ऊपर झुकी थीं।


“क्या हुआ मेरी बच्ची?” उन्होंने कहा...
“कुछ नहीं अम्मी
कुछ भी तो नहीं।” वो अपने आँसू पी कर बोली...
और दूसरे दिन सुबह वो दिन-भर शमीम के घर नहीं गई। शाम को अम्मी स्कूल से आईं तो देखा कि वो अब तक मुँह लपेटे बिस्तर पर पड़ी थी।


“आज हमारी बेटी खेलने नहीं गई?” उन्होंने पूछा…
“नहीं।” अब्बा जान ने जवाब दिया
“आज तो सुबह से घर में है।”
“जाओ बेटी


दिन-भर घर में घुसे रहना ठीक नहीं।” उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा
“जा कर खेल आओ।”
वो बाहर आई तो जैसे शमीम उसी का इंतिज़ार कर रही थी।
“अरे शहनाज़!” वो घरौंदे में से चीख़ी


“तुम तो जैसे पर्दे में ही बैठ गईं
आओ खेलें।”
शहनाज़ का दिल बाग़-बाग़ हो गया। लेकिन जैसे ही क़रीब पहुँची उसे मालूम हो गया कि शमीम इतनी मीठी-मीठी बातें क्यूँ कर रही थी। चने की दाल
घी


शकर और बहुत सा दूसरा सामान छोटे-छोटे बर्तनों में रखा था। शहनाज़ चने का हलवा बहुत लज़ीज़ बनाती थी इसी लिए अब उसका इंतिज़ार किया जा रहा था।
“लो ज़रा जल्दी से हलवा तैयार कर डालो।” शमीम ने अहकाम देना शुरू कर दिए। शहनाज़ जल्दी-जल्दी काम करने लगी। दाल भूनी
क़िवाम तैयार किया और फिर थोड़ी देर बाद चने का सोंधा-सोंधा लज़ीज़ हलवा तैयार हो गया। “अच्छा अब तुम जाकर हमारे घर से बुक़चा उठा लाओ।”
शमीम ने दूसरा हुक्म दिया और हलवा साफ़ करना शुरू कर दिया। शहनाज़ तेज़ी से भागी। बंगले में जा कर आया से बुक़चा लिया और फिर तेज़ी से वापस लौटी


उसे डर था कि उसके पहुँचने से पहले हलवा साफ़ न हो जाए और हुआ भी यही। घरौंदे पर पहुँच कर उसने देखा... कुत्ता रूबी जल्दी-जल्दी हलवा खा रहा था और शमीम और रिहाना पास ही खड़ी तालियाँ बजा-बजा कर हंस रही थीं।
उन्होंने जल्दी से शहनाज़ के हाथ से गुड़ियों का बुक़चा ले लिया और कहा
“शहनाज़ अब तुम्हारी छुट्टी तुम्हीं ने तो कल हमारा घरौंदा ख़राब कर दिया था।”
बे-चारी शहनाज़ फिर कल्लू तेली के चबूतरे पर बैठ गई। शमीम ने एक नया गुड्डा बुक़चे से निकाल कर रिहाना को दिखाया


“ये मेरे डैडी सतरह रुपय का लाए हैं। देखो कितना अच्छा है। इस बटन को दबाओ ज़रा।”
रिहाना ने बटन दबाया
“अरे!”
वो ख़ुशी से उछलने लगी। शहनाज़ की आँखें फटी की फटी रह गईं। सेलूलाइड का बे-जान गुड्डा जल्दी-जल्दी हाथ पैर चला रहा था। उसने पास जा कर देखा। गुड्डा पलकें भी झपका रहा था।


“शमीम
क्या ये पलकें भी झपकाता है?” उसने बे-इख़्तियार हो कर पूछा और जवाब में तड़-तड़ उसके गाल पर दो चपत पड़े।
“कमीनी को कितनी बार कहा कि हमारे साथ न खेला कर। चल यहाँ से!” शमीम ने फटकारा...
“बे-हया है बे-हया रिहाना ने नमक छिड़का।”


“अम्मी
शमीम के पास बड़ा निराला गुड्डा है।” वो आँखों में आँसू भरे हुए कह रही थी... “बड़ा ही निराला गुड्डा। हाथ पैर चलाता है
आँखें भी झपकता है
मुझे भी ला दो ना ऐसा ही गुड्डा।” वो अम्मी के कंधे पर सर रख कर सिसकने लगी।”


“अरी पगली
तेरे पास तो उससे भी अच्छा है।”
“कहाँ?”
“वो देख।” और उसने आँखें फाड़ कर देखा। झूले पर नन्हा अशफ़ाक़ अँगूठा मुँह में डाले चूस रहा था।


“मेरा गुड्डा...” उसने लपक कर नन्हे को उठा लिया। और वो मुस्कुराने लगा।
“अम्मी मेरा गुड्डा तो हंस भी लेता है। क्या शमीम का गुड्डा भी हंस सकता है?” और जवाब में अम्मी और अब्बा जान दोनों मुस्कुरा दिए। लेकिन साथ ही साथ न जाने क्यों दोनों की आँखों में आँसू भी झलक रहे थे?

- muzaffar-hanfi


बहुत दिन हुए जापान में एक बुड्ढा और एक बुढ़िया रहते थे। उनके घर एक चिड़ा रोज़ आता और दाना-दुनका चुन कर उड़ जाता। दोनों मियाँ बीवी उस चिड़े का इंतिज़ार करते रहते। वो उसके लिए दाना और एक प्याली में पानी रख देते। चिड़ा आता दाना खाता इधर-उधर घूमता
कभी उनके कंधों पर बैठता कभी हाथों पर और उड़ जाता।
एक दिन बुढ़िया अपने सहन में चिड़े का इंतिज़ार कर रही थी कि उसकी बद-मिज़ाज पड़ोसन आई और कहने लगी
“क्या अपने चिड़े का इंतिज़ार कर रही हो? अब वो मुआ तुम्हारे यहाँ कभी नहीं आएगा


अरे हाँ कम्बख़्त ने नाक में दम कर रखा था
आज मेरे चावल उड़ा गया
कल मेरी दाल हज़म कर गया
मैंने भी कल उसकी चोंच तोड़ के रख दी।”


बुड्ढे-बुढ़िया दोनों को पड़ोसन की राम-कहानी सुन कर बड़ा रंज हुआ। वो सोचने लगे अब बेचारा चिड़ा भूकों मर जाएगा
कम से कम अब वो किसी इन्सान के तो पास भी नहीं फटकेगा कि इन्सान का क्या भरोसा।
आख़िर उन्होंने फ़ैसला किया कि चलो जंगल में चल कर चिड़े का घोंसला तलाश करें और उससे इन्सान के बुरे बरताव के लिए माफ़ी माँगें।
बुढ़िया और उसका बुड्ढा दोनों जंगल में पहुँचे और ढूंडते-ढूंडते उन्होंने अपने दोस्त चिड़े का पता लगा लिया। चिड़ा उन दोनों को देख कर बाहर निकला। उसकी चिड़िया और दो बच्चे भी साथ थे। वो सब इन नेक इन्सानों को देख कर बहुत ख़ुश हुए और ख़ूब चहचहाए।


चिड़ा बोला
“आज मुझे कितनी ख़ुशी है कि मेरे मेज़बान आज ख़ुद मेरे मेहमान हैं
जो अच्छा बरताव आप दोनों मेरे साथ करते रहे हैं और जिस मुहब्बत से आप मेरे साथ पेश आते रहे हैं उसका शुक्रिया भला मैं क्यूँ-कर अदा कर सकता हूँ?”
चिड़ियों ने फिर बहुत से फल-फलार ला कर इकट्ठे कर दिए जो सबने मिल कर ख़ूब खाए।


जब बहुत देर इसी तरह गुज़र गई तो बुड्ढे-बुढ़िया ने चिड़े से घर जाने की इजाज़त माँगी
चिड़ा जल्दी से बहुत छोटी-छोटी दो टोकरियाँ लाया और कहने लगा
“इनमें से एक टोकरी हल्की है और एक भारी है
दोनों में से आप एक ले लीजिए


बताईए कौन सी टोकरी आप लीजिएगा?”
बुड्ढा बोला
“हम पर आपकी ख़ातिर-दारी का एहसान ही क्या कम है जो अब ये तोहफ़ा ले कर इस एहसान का बोझ और बढ़ाएँ।”
चिड़ा


“नहीं ये हरगिज़ नहीं हो सकता
इन दोनों में से एक टोकरी तो आपको लेनी ही होगी।”
बुड्ढा
“अच्छा अगर आपकी यही मर्ज़ी है तो हमें हल्की वाली टोकरी दे दीजिए।”


ग़रज़ चिड़े-चिड़िया का शुक्रिया अदा करके और अपने घर आने की दावत दे कर बुड्ढा-बुढ़िया दोनों वो हल्की टोकरी लिए हुए अपने घर पहुँचे और उस टोकरी को कमरे में रख दिया। ज़मीन पर रखते ही वो मुन्नी सी टोकरी जो मुश्किल से एक आलू के बराबर होगी बड़ी होने लगी और बढ़ते-बढ़ते एक अच्छे ख़ासे संदूक़ के बराबर हो गई
दोनों को बड़ा ता’ज्जुब हुआ
मगर जब इस संदूक़ को खोला तो और भी ज़्यादा ता’ज्जुब हुआ। सारा संदूक़ बहुत क़ीमती रेशम के कपड़ों और जवाहरात से भरा हुआ था। चिड़े की दोस्ती ने उनको उम्र भर के लिए बे-फ़िक्र कर दिया। अब उन्हें कभी ग़रीबी का मुँह देखना नहीं पड़ेगा।
अब सुनो


इन दोनों को ख़ुश-हाल देख कर बद-मिज़ाज पड़ोसन दौड़ी हुई आई और सारा हाल मालूम कर के सीधी जंगल को रवाना हो गई। बुड्ढे के बताए हुए पते के मुताबिक़ उसे जल्द ही चिड़े का घोंसला मिल गया। पड़ोसन ने घोंसले पर दस्तक दी। चिड़ा बाहर निकला और उसको देखते ही नाक-भौं चढ़ा कर बोला
“क्यों क्या काम है?”
पड़ोसन बोली
“मुझे बड़ा अफ़सोस है कि मैंने उस दिन तुम्हारी ज़रा सी चोंच तोड़ दी


बात ये थी कि मुझे ग़ुस्सा आ गया था। किसी की चीज़ ग़ारत होती है तो ग़ुस्सा आ ही जाता है
ख़ैर अब इन बातों को छोड़ो मैं तुम्हारी मेहमान हूँ
मुझे कोई तोहफ़ा दो।”
चिड़ा उसकी बातें सुन कर मुस्कुराया और अंदर जाकर वो मुन्नी-मुन्नी टोकरियाँ उठा लाया और कहने लगा


“इनमें से एक टोकरी ले लो।”
लालची औरत ने फ़ौरन भारी वाली टोकरी उठा ली और सीधी अपने घर को सिधारी
यहाँ तक कि चिड़े का शुक्रिया भी अदा नहीं किया।
ये टोकरी बुड्ढे-बुढ़िया वाली टोकरी से भी ज़्यादा अजीब थी


उनकी टोकरी तो घर पहुँच कर बड़ी हुई थी
ये रास्ते ही में बढ़ने लगी और होते-होते इतनी बड़ी और इतनी भारी हो गई कि इस औरत के सँभाले न सँभलती थी। मगर बुढ़िया बहुत ख़ुश थी। वो समझ रही थी इसमें जवाहरात भरे हुए हैं और जवाहरात तो भारी होते ही हैं। ग़रज़ किसी न किसी तरह उसे घसीट कर घर ले ही आई। दो-चार मिनट दम लेने के बाद थके-माँदे हाथों से संदूक़ खोला इक दम दो भुतने उसके अंदर से क़हक़हा लगाते हुए बाहर निकल पड़े और इस औरत को पकड़ कर उस जज़ीरे में ले गए जहाँ ऐसे लोगों को सख़्त सज़ा दी जाती है जो जानवरों को सताते हैं और उन पर ज़ुल्म करते हैं।

- afsar-merathi


किसी गाँव में एक बूढ़ा और बुढ़िया रहा करते थे। उनके पास पूची नाम का एक कुत्ता था। उसको दोनों बहुत प्यार करते थे।
एक दिन जब बूढ़ा अपने खेत में काम कर रहा था
पूची उसे खींच कर एक तरफ़ ले गया और भौंक-भौंक कर पंजों से ज़मीन कुरेदने लगा। बूढ़ा जितना भी उसे हटाने की कोशिश करता पूची उतने ही ज़ोर से भौं-भौं करते हुए फिर ज़मीन कुरेदने लगता। आख़िर बूढ़े ने फावड़ा उठा कर उस जगह को खोदना शुरू किया। खोदने पर वहाँ से हीरे और मोतियों से भरा हुआ घड़ा निकला जिसे पाकर बूढ़ा बहुत ख़ुश हुआ और सारा ख़ज़ाना लेकर अपने घर आ गया।
बूढ़े का एक पड़ोसी था। बेहद लालची। उसने बूढ़े को ख़ज़ाना लाते हुए देखा तो पूछ लिया। बूढ़ा था सीधा-साधा। उसने पड़ोसी को ख़ज़ाना मिलने का सारा वाक़िया कह सुनाया। जलन की वजह से पड़ोसी की नींद उड़ गई।


अगले दिन उसने मीठी-मीठी बातें कर के बूढ़े से एक दिन के लिए पूची को माँग लिया। उसे लेकर वो सीधे अपने खेत में गया और बार-बार कुत्ते को तंग करने लगा कि वो उसे भी ख़ज़ाना दिखाए। आख़िर पूची ने एक जगह रुक कर पंजों से ज़मीन कुरेदनी शुरू ही की थी कि पड़ोसी ने झट फावड़े से वो जगह खोद डाली। खोदने पर हीरे-मोतियों के बजाय उसे मिला कूड़ा और गंदा कचड़ा। पड़ोसी ने झल्लाहट में आव देखा न ताव और पूची को मार कर फेंक दिया। जब पूची के मालिक बूढ़े को मालूम हुआ तो वो बहुत दुखी हुआ। उसने पूची की लाश को गाड़ कर वहाँ पर एक पेड़ उगा दिया। हैरानी की बात कि दो दिन में ही वो बढ़ कर पूरा पेड़ बन गया। बूढ़े ने उस पेड़ की लकड़ी से ओखली बनाई। नए साल के पकवान बनाने के लिए उसमें धान कूटने लगा तो ओखली में पड़ा धान सोने और चाँदी के सिक्कों में बदलने लगा। पड़ोसी को भी मालूम हुआ तो वो ओखली उधार माँग कर ले गया। जब उसने ओखली में धान कूटे तो धान गंदगी और कूड़े में बदल गया। पड़ोसी ने ग़ुस्से में ओखली को आग में जला डाला। बूढ़े ने दुखे हुए दिल से जली हुई ओखली की राख इकट्ठा की और उसे अपने आँगन में छिड़क दिया। वो राख जहाँ-जहाँ पड़ी वहाँ सूखी घास हरी हो गई और सूखे हुए पेड़ों की डालियाँ फूलों से लद गईं।
उसी वक़्त वहाँ से बादशाह की सवारी निकल रही थी। बादशाह ने फूलों से लदे पेड़ों को देखा। उसका दिल ख़ुश हो गया और उसने बूढ़े को अशर्फ़ियों की थैली इनाम में दी।
हासिद पड़ोसी ने ये देखा तो बची हुई राख उठा ली और बादशाह के रास्ते में जा कर एक सूखे पेड़ पर राख डाली। पेड़ वैसा ही ठूँट बना रहा पर राख उड़ कर बादशाह की आँखों में जा पड़ी। बादशाह के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और उसे ख़ूब पीटा। बूढ़ा आस पड़ोस में ‘फूल वाले दादा जी’ के नाम से मशहूर हो गया।

- afsar-merathi


एक दफ़ा का ज़िक्र है कि एक बत्तख़ दरिया के किनारे रहती थी क्योंकि उसका नर मर चुका था। वो बेचारी हमेशा बीमार रहती थी। एक दिन उसकी तबीयत ज़्यादा ख़राब हो गई तो वो डाक्टर के पास गई। डाक्टर ने उसे बताया कि तुम्हारी बीमारी ऐसी है कि तुम जल्द मर जाओगी। उसे ये सुनकर सदमा हुआ क्योंकि उसके पास एक अण्डा था। उसे डर लगा कि अगर मैं मर गई तो इस अंडे का क्या होगा जिसके ख़ोल से जल्द ही बच्चा निकलने वाला था और फिर उस बच्चे को कौन संभालेगा। लिहाज़ा वो अपने सब दोस्तों के पास गई जो जंगल में रहते थे।
उसने अपने दोस्तों को अपनी सारी कहानी सुनाई लेकिन उन्होंने मदद करने से इनकार कर दिया। बेचारी बत्तख़ ने इसकी काफ़ी मिन्नतें कीं कि ख़ुदा के लिए तुम लोग मरने के बाद मेरे बच्चे को अपना साया देना लेकिन किसी ने उसकी बात न मानी।
बेचारी बत्तख़ भी क्या करती। उसके ज़ह्न में ख़्याल आया कि क्यों न मैं अपने भाई मुर्ग़े के पास जाऊँ
वो ज़रूर मेरी मदद करेगा लिहाज़ा वो मुर्ग़े के पास गई और उसे सारा क़िस्सा सुनाया


“मुर्ग़ भाई आप मेरे बच्चे के मामूँ जैसे हो प्लीज़ आप ही मेरे बच्चे को अपना साया देना।”
बोला
“मैं तुम्हारे बच्चे को रख लेता लेकिन मेरी बेगम मुर्ग़ी ये बात नहीं मानेगी लिहाज़ा मुझे बहुत अफ़सोस से कहना पड़ रहा है कि मैं ये काम नहीं कर सकता लिहाज़ा तुम मुझे माफ़ कर देना।”
बत्तख़ इधर से मायूस हो कर अपने घर वापिस आ गई और सोचना शुरू कर दिया कि अब क्या किया जाए। अचानक उसके ज़ह्न में एक तरकीब आई और उसने मौक़ा ढूँढ कर ये काम अंजाम दे दिया और ख़ुद जा कर एक दरख़्त के किनारे बैठ गई। उसके बाद बत्तख़ की तबीयत और बिगड़ गई और ऐसी बिगड़ी कि उसकी मौत हो गई।


जब मुर्ग़ी के बच्चे अंडों से बाहर निकले तो उनमें एक बत्तख़ का बच्चा भी था। मुर्ग़ तो सब जान गया था लेकिन उसने मुर्ग़ी को बताना मुनासिब न समझा। मुर्ग़ी ने काफ़ी शोर-शराबा किया और बोली मेरे बच्चों के साथ बत्तख़ का बच्चा नहीं रहेगा।
मुर्ग़ ने उसे काफ़ी समझाया लेकिन मुर्ग़ी ने उसका कहना नहीं माना। मुर्ग़ी ने अपने बच्चों को मना कर दिया कि बत्तख़ के बच्चे से किसी को बात नहीं करनी है। सबने मुर्ग़ी की बात मान ली लेकिन दो चूज़ों ने अपनी माँ की बात न मानी और वो जो ख़ुद खाते थे
अपने साथ इस बत्तख़ के बच्चे को भी खिलाते थे। मुर्ग़ी को बत्तख़ के बच्चे से सख़्त नफ़रत थी
वो उसे देखना भी पसंद नहीं करती थी।


एक दिन मुर्ग़ी के ज़ह्न में ख़्याल आया कि हम सब मिल कर दरिया के किनारे सैर को जाऐंगे। हम सब वापस आ जाऐंगे और बत्तख़ के बच्चे को वहीं छोड़ आएँगे। इस तरह से जान छूट जाएगी।
वो लोग सैर को निकले। वहाँ पहुँचते ही एक चूज़ा दरिया के किनारे चला गया और डूबने लगा। ये देखकर मुर्ग़ी ज़ोर-ज़ोर से चीख़ने चिल्लाने लगी चूँकि बत्तख़ के बच्चे को तैरना आता था लिहाज़ा उसने फ़ौरन दरिया में तैरना शुरू कर दिया और उस चूज़े को निकाल कर बाहर आया।
मुर्ग़ी ने जब ये देखा तो अपने किए पर काफ़ी शर्मिंदा हुई और उसने बत्तख़ के बच्चे से माफ़ी माँग कर उसे अपना बेटा बना लिया। इस तरह वो सब हंसी-ख़ुशी रहने लगे।
देखा बच्चो कैसे बत्तख़ के बच्चे ने मुर्ग़ी को बचाया और कैसे उसका भला हुआ। इसीलिए तो कहते हैं कि कर भला तो हो भला।


- hammad-sultan


आख़िर जोजो ने बिल्ली के गले में घंटी बाँधने का बीड़ा उठाया।
बरकत फ़्लोर मिल चूहों की एक क़दीम और वसीअ रियासत थी। गंदुम की बोरियों के साथ सूखी रोटियों की बोरियाँ भी मौजूद होती थीं ताकि दोनों को मिला कर आटा तैयार किया जा सके और यूँ हाजी बरकत अली की आमदनी और लोगों के पेट के अमराज़ में इज़ाफ़ा होता रहे। जब गंदुम और सूखी रोटियों की नई खेप आती तो चूहों की ईद हो जाती। जब सेर हो कर खाने के बाद उनके पेट लटक जाते तो वो नए-नए ख़्वाब देखने लगते और इस क़िस्म की तक़रीरें होतीं...
एक बुज़ुर्ग चूहा अपनी दाढ़ी खुजाते हुए बोले



“मेरे अज़ीज़ हम-वतनों
आख़िर हम कब तक चूहेदानों और बिल्ली का शिकार होते रहेंगे। आख़िर कब वो इन्क़िलाब आएगा जब हर गोदाम
हर बावर्ची-ख़ाना और हर परचून की दुकान पर हमारी हुकूमत होगी?”
अगला नौजवान चूहा दोनों टाँगों पर खड़ा हो कर पहलवानों की तरह रान पर हाथ मारते हुए


“इस बार ना-मुराद बिल्ली मुझे नज़र आ जाए फिर देखना उसका क्या हश्र करता हूँ। ज़ुल्म सहना भी ज़ालिम की हिमायत है।”
अगला ज़ईफ़ चूहा खाँसते हुए
“हम सदियों से बिल्ली के मज़ालिम से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं एक बार फिर कहता हूँ
अगर हम बिल्ली के गले में घंटी बाँधने में कामयाब हो जाएँ तो हम हमेशा के लिए महफ़ूज़ हो जाएँगे।”


बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की तदबीर वाक़ई चूहों की क़ौम में एक अरसे से गर्दिश कर रही थी। इस सिलसिले में कुछ संजीदा और इन्क़िलाबी इक़दामात भी हुए लेकिन कामयाबी हासिल न हो सकी। एक बार चंद नौजवान वो घंटा घसीट लाए जो स्कूल में लकड़ी के हथौड़े से बजाया जाता है। नतीजा ये हुआ कि वो भारी थाली नुमा घंटा सिपाहियों से सँभल न सका और दो-तीन उसी के नीचे दब कर रहलत फ़र्मा गए। दूसरी बार कुछ कम-फ़ह्म नौजवान किसी बैल की घंटी घसीट लाए। उसके घसीटने में ऐसा शोर मचा कि सोई हुई बिल्लियाँ जाग गईं और यूँ तमाम इन्क़िलाबी बिल्लियों के हत्थे चढ़ गए।
जोजो एक निहायत चालाक
शरीर और निडर चूहा था। वालदैन के बार-बार मना करने के बावजूद वो चूहे-दान में लगा मक्खन पनीर या डबल-रोटी का टुकड़ा साफ़ निकाल लाता और चूहे-दान का मुँह हैरत से खुले का खुला रह जाता। जोजो भी अपने बुज़ुर्गों के दावे और अहमक़ाना तक़रीरें सुनता रहता। आख़िर उसने बिल्ली के गले में घंटी बाँधने का बीड़ा उठाया। उसने अपने तीनों दोस्तों चूँचूँ
गोगो और चमकू को अपनी स्कीम तफ़सील से समझाई और तंबीह कर दी कि इस स्कीम की इत्तेला किसी बुज़ुर्ग को न दी जाए।


चमकू का घर बोतल-गली की मशहूर दुकान मक्का इत्र हाऊस में था। चारों दोस्त वहाँ से एक ख़ूबसूरत सुनहरी इत्र की ख़ाली शीशी लेकर आए और उसे साफ़ करके एक मख़मल की डिबिया में रख दिया। अगले दिन चारों दोस्त वो शीशी लेकर फूलबाग पहुँचे। एक क्यारी में चम्बेली के फूल आँखें मूँदे सो रहे थे। जोजो ने उनकी नाज़ुक गर्दन हिला कर कहा
“चम्बेली बहन
माफ़ करना हम आपकी नींद में मुख़िल हुए। आपकी बहुत मेहरबानी हो अगर आप अपनी ख़ुशबू के चंद क़तरे इनायत कर दें।”
चम्बेली ने मुस्कुराते हुए चंद क़तरे शीशी में टपका दिए।


इसके बाद चारों दोस्त गुलाब के पास गए जो खिलखिला कर बुलबुल से बातें कर रहा था। चूँचूँ ने गुलाब को सलाम कर के कहा
“फूलों के राजा
अगर आप हमें अपनी ख़ुशबू के चंद क़तरे दे दें तो आपका बहुत एहसान होगा।”
“अरे हमारा तो काम ही ख़ुशबू बाँटना है। भर लो शीशी।” गुलाब ने हंसकर कहा...


यूँ चारों दोस्त बेला
चम्पा
रात की रानी
दिन का राजा के पास भी गए और उनकी ख़ुशबुओं के क़तरे भी हासिल कर लिए और सुनहरी शीशी पत्तों में छिपा दी।


बिल्लियों ने अपने-अपने इलाक़े बाँट रखे थे और बरकत फ़्लोर मिल पर मानो चम्पा की हुकूमत थी। जोजो को इल्म था कि 22 जनवरी को बी चम्पा की सालगिरह है और उस दिन फ़्लोर मिल की छत पर इलाक़े की बिल्लियाँ जमा हो कर जश्न मनाएँगी और यूँ उस दिन चारों दोस्त अपनी ज़िंदगियाँ दाँव पर लगा कर एक चूहे-गाड़ी पर वो ख़ुशबुओं से भरी शीशी लाद कर उस वक़्त छत पर पहुँचे जब बिल्लियों का जश्न उरूज पर था। फ़र्श पर एक सफ़ेद दस्तर-ख़्वान पर गोश्त की बोटियों
नर्म-नर्म हड्डियों और मछलियों का ढेर था। मिट्टी के कूँडों में दूध भरा हुआ था। चारों दोस्त एक कोने में ख़ामोशी से बैठ गए।
कुछ देर बाद जब बी चम्पा की नज़र उन चारों पर पड़ी तो उसकी दुम और कमर के बाल खड़े हो गए और उसने चीख़ कर कहा
“तुम! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारी महफ़िल में आने की!”


एक और मेहमान बिल्ली होंटों पर ज़बान फेरते हुए बोली
“चलो अच्छा हुआ। अब खाने के मीनू में इन चारों का भी इज़ाफ़ा हो जाएगा।”
जोजो ने अदब से सर झुका कर कहा
“चम्पा बहन हमारी नीय्यत साफ़ है। हम लोग आपकी सालगिरह पर ऐसा नायाब तोहफ़ा लेकर आए हैं कि आपका दिल बाग़-बाग़ हो जाएगा।”


और ये कहते हुए जब जो-जो ने ख़ुशबू की शीशी का ढकना खोला तो मस्त कर देने वाली ख़ुशबू चारों तरफ़ फैल गई। मानो चम्पा ने हैरत से सुनहरी शीशी की तरफ़ देखा और फिर चंद क़तरे अपने रेशमी बालों पर लगा लिए जिससे उसके पूरे जिस्म से ख़ुशबुओं की लपटें उठने लगीं। चम्पा ने ख़ुश हो कर कहा
“वाक़ई तुम लोगों का तोहफ़ा लाजवाब है। इसलिए हम इस ख़ुशी में आज तुम लोगों को नोश फ़रमाने का इरादा तर्क करते हैं।”
इसके बाद जब भी बी चम्पा ख़ुशबू लगा कर निकलतीं तो चारों तरफ़ महक फैल जाती और तमाम चूहे महफ़ूज़ मुक़ामात पर पहुँच जाते और यूँ जोजो की अक्लमंदी से आख़िर-ए-कार चूहे बिल्ली के गले में घंटी बाँधने के बजाय उन्हें ख़ुशबू में मुअत्तर करने में कामयाब हो गए और उनका सदियों पुराना बिल्ली से होशियार रहने का ख़्वाब पूरा हो गया।

- waqar-mohsin


चलती ट्रेन में चढ़ने वाले नौजवान को नवाब काशिफ़ ने हैरत भरी नज़रों से देखा। वो अंदर आने के बाद अपना साँस दुरुस्त कर रहा था। शायद ट्रेन पर चढ़ने के लिए उसको काफ़ी दूर दौड़ना पड़ा। नवाब काशिफ़ ने उससे कहा
“नौजवान
ट्रेन पर चढ़ने का ये तरीक़ा दुरुस्त नहीं
इस तरह आदमी हादसे का शिकार हो सकता है।”


“ज़िंदगी तो है ही हादिसात का नाम चचा।” नौजवान मुस्कुराया...
“ओहो अच्छा
ये जुमला तो ज़रा अदबी क़िस्म का है... क्या तुम्हारा त’अल्लुक़ अदब से है?” नवाब काशिफ़ के लहजे में हैरत अभी बाक़ी थी।
“मेरा अदब से त’अल्लुक़ बस पढ़ने की हद तक है चचा।”


“चचा... तुम मुझे पहले भी चचा कह चुके हो
तुम्हारे मुँह से चचा कहना कुछ अजीब सा लगा। ख़ैर... मैं तुम्हें बताए देता हूँ कि ये केबिन मैंने मख़सूस करवा रखा है। लिहाज़ा इसमें किसी और के लिए सीट नहीं है।”
“लेकिन चचा
ये जगह तो चार-पाँच आदमियों की है?”


“हाँ
ये फ़ैमिली केबिन है। मेरी फ़ैमिली तीन स्टेशनों के बाद सवार होगी।”
“ओह
अच्छा


मैं तीसरा स्टेशन आने से पहले ही उतर जाऊँगा। आप फ़िक्र न करें।”
“लेकिन भई
ये पूरा केबिन मेरे लिए मख़सूस है।”
“मैं सुन चुका हूँ... लेकिन आप देख चुके हैं। मैं चलती ट्रेन में सवार हुआ हूँ


ख़ैर मेरा वुजूद अगर आपको इतना ही ना-गवार गुज़र रहा है तो मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगा। इतनी देर के लिए तो आपको बर्दाश्त करना पड़ेगा। मुझे अफ़सोस है।”
“अच्छा ख़ैर
बैठ जाएँ बरखु़र्दार।”
नौजवान सामने वाली सीट पर बैठ गया। फिर घड़ी पर नज़र डालते हुए बोला


“अगला स्टेशन कितनी देर में आ जाएगा?”
“पैंतालीस मिनट तो ज़रूर लगेंगे।”
“ओह... तब तो काफ़ी वक़्त है। मैं ज़रा नींद ले सकता हूँ?”
“ज़रूर


क्यों नहीं।” नवाब काशिफ़ ने मुँह बनाया...
नौजवान ने जेब में हाथ डाला
उसका हाथ बाहर निकला तो उसमें च्युइंगम के दो टुकड़े थे। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा
“चचा


च्युइंगम।”
“मैं बच्चा नहीं हूँ।” नवाब साहब ने मुँह बनाया...
“ये च्युइंगम बहुत ख़ास क़िस्म के हैं। इनसे से ख़ास क़िस्म के लोग शुग़्ल करते हैं। आपके लिए अगर ये अनोखी चीज़ साबित न हो तो फिर कहियेगा। आप एक च्युइंगम मुँह में रख कर देख लें। अभी अंदाज़ा हो जाएगा।” ये कहते हुए उसने दूसरा च्युइंगम का काग़ज़ बाएं हाथ और दाँतों की मदद से उतार लिया और उसको मुँह में रख लिया।
ग़ैर इरादी तौर पर नवाब काशिफ़ ने च्युइंगम उठा लिया


उसका काग़ज़ उतार कर उसे मुँह में रख लिया। वो जल्दी से बोले
“इसमें शक नहीं
च्युइंगम बहुत ख़ास क़िस्म का है।”
“और पेश करूँ? रास्ते भर शुग़्ल कर सकेंगे आप।”


“नहीं भई
मुझे मुसलसल मुँह चलाना पसंद नहीं। आदमी बकरा नज़र आने लगता है।”
“आपकी मर्ज़ी
वैसे आपकी शक्ल-सूरत कुछ जानी-पहचानी सी नज़र आ रही है। शायद मैंने आपको कहीं देखा है। क्या नाम है भला आपका?


नवाब साहब ने तंज़ से कहा
“वाह
वाह-वा...”
“ये कैसा नाम हुआ?”


“हद हो गई। मैंने अपना नाम नहीं बताया। पहले तो तुम चलती ट्रेन पर सवार हो गए
वो भी मेरे मख़सूस केबिन में
फिर जगह हासिल कर ली। उसके बाद च्युइंगम पेश किया और अब मेरा नाम पूछ रहे हो। ख़ैर तो है नौजवान
इरादे तो नेक हैं?”


नौजवान ने ना-गवारी से कहा
“अच्छी बात है
न बताएँ नाम
मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगा।”


“बुरा मान गए बरखु़र्दार... ख़ैर सुनो
मेरा नाम नवाब काशिफ़ है।”
“नवाब काशिफ़!” नौजवान के लहजे में हैरत शामिल हो गई...
“हाँ क्यों


क्या तुम मुझसे मेरा मतलब है मेरे नाम से वाक़िफ़ हो?”
“सुना हुआ सा लगता है। इसी तरह आपका चेहरा भी शनासा है
ख़ैर अभी मैं यहाँ तक़रीबन चालीस मिनट और ठहरूँगा
इस दौरान अगर याद आ गया तो बताऊँगा।”


नवाब काशिफ़ ने जमहाई लेते हुए कहा
“अच्छी बात है
हा हा
शायद मुझे नींद आ रही है।”


“मेरा भी यही हाल है।”
“तब फिर कुछ देर नींद ले लेते हैं। स्टेशन पर पहुँच कर जब ट्रेन रुकेगी तो आँख ख़ुद-ब-ख़ुद खुल जाएगी।”
नवाब साहब बोले
“ठीक है फिर जमहाई ली और उनकी आँखें बंद हो गईं। नीम-दराज़ तो पहले ही थे


अब पैर फैला कर लेट गए।
उनकी आँख खुली तो उनके घर के अफ़राद उन्हें बुरी तरह झिंजोड़ रहे थे। उन्हें आँखें खोलते देख कर उनकी बेगम बोल उठीं
“आप घोड़े बेच कर सो गए थे? हम लोग कितनी देर से आपको जगाने की कोशिश कर रहे हैं।”
नवाब साहब चौंक कर बोले


“ओहो अच्छा
हैरत है
तीन स्टेशन गुज़र गए
लो मुझे पता ही नहीं चला और


और वो नौजवान?”
उनकी बड़ी बेटी ने हैरान हो कर पूछा
“कौन नौजवान? किस की बात कर रहे हैं डैडी?”
“और हाँ


उसे तो अगले स्टेशन पर ही उतर जाना था। यहाँ तक तो उसे आना ही नहीं था।”
“किसकी बात कर रहे हैं? अभी तक नींद में हैं क्या?”
“नहीं
मैं अब नींद में नहीं हूँ। मैं बताता हूँ


उसके बारे में।”
फिर वो अपने घर के अफ़राद को नौजवान के बारे में बताने लगे। च्युइंगम के ज़िक्र से उनका बेटा चौंका। वो बोला
“कहीं वो कोई चोर तो नहीं था।”
नवाब काशिफ़ बोले


“अरे नहीं
वो तो बहुत भोला-भाला नौजवान था।”
“फिर भी आप अपनी जेबों की तलाशी ले लें।”
“ज़रूरत तो कोई नहीं


ख़ैर... तुम कहते हो तो मैं देख लेता हूँ।”
उन्होंने अपनी जेबों का जायज़ा लिया। शेरवानी की अंदरूनी जेब टटोलते ही वो बोले
“बटवा मौजूद है और सारी नक़दी इसी में थी
इसका मतलब है वो चोर नहीं था।”


बेटे ने कहा
“बटवा भी तो निकालें ना।”
उसके कहने पर नवाब साहब ने जेब से बटवा निकाल लिया। दूसरे ही लम्हे वो बहुत ज़ोर से उछले… “अरे ये क्या ये तो मेरा बटवा नहीं है।”
“क्या!” उन सब के मुँह से निकला...


नवाब साहब ने घबराहट के आलम में बटवे का जायज़ा लिया। बटवे में काग़ज़ात भरे हुए थे। उन्होंने काग़ज़ात निकाल लिए। वो अख़बारात के तराशे थे। जराइम की ख़बरों के तराशे। उनके बटवे के दूसरे हिस्से में चंद तस्वीरें थीं। ये तसावीर उसी नौजवान की थीं और उनमें एक तस्वीर ग़ालिबन उसके बचपन की थी।
बेगम साहिबा ने तेज़ लहजे में कहा
“तो वो आपका बटवा ले उड़ा।”
“हाँ यही बात है। मुझे अफ़सोस है। ओह


ओह! अरे!”
एक बार फिर वो ज़ोर से उछले। उनकी नज़रें बचपन वाली तस्वीर पर चिपक सी गई थीं। उनके दिमाग़ में घंटियाँ सी बजने लगीं। दिमाग़ साएँ-साएँ करने लगा। बच्चे की मुस्कुराती तस्वीर उनके दिल-ओ-दिमाग़ में उतरती जा रही थी।
तस्वीर वाला बच्चा अपने मामूँ से प्यार भरे लहजे में कह रहा था
“मामूँ जान आप कहाँ जा रहे हैं।”


“मुन्ने मैं फ़िल्म देखने जा रहा हूँ।”
“आप मुझे भी ले चलें ना...”
“लेकिन मुन्ने मेरे पास सिर्फ़ एक टिकट के पैसे हैं। मेरे पास ज़्यादा पैसे नहीं हैं
क्या तुम्हारे पास पैसे हैं?”


“जी मामूँ जान पैसे? जी नहीं तो।”
“तब फिर तुम एक काम करो। अपने अब्बू की दुकान पर जाओ
वो तो दुकान-दारी में लगे होंगे। उनके गल्ले में से कुछ नोट चुपके से निकाल लाओ। उन्हें पता भी नहीं चलेगा। फिर मैं तुम्हें फ़िल्म दिखाने ले चलूँगा।
“अच्छा मामूँ जान!” मुन्ने ने कहा और दौड़ गया।


जल्द ही वो वापस आया तो उसके हाथ में दस-दस रुपय के कई नोट थे। उन नोटों को देख कर इन्होंने मुँह बनाया और कहा
“इनसे टिकट नहीं आएगा। एक बार और जाओ।”
मामूँ ने झूट बोला। हालाँके उस ज़माने में फ़िल्म का टिकट चंद आनों में मिलता था।
“जी अच्छा मामूँ।” मुन्ना गया और चंद नोट और ले आया।


मामूँ ने फिर कहा
“नहीं भई
अभी टिकट के पैसे पूरे नहीं हुए।”
बच्चे ने कहा


“अच्छा मामूँ
एक चक्कर और सही।”
इस तरह मुन्ने को मामूँ ने कई चक्कर लगवाए
तब फ़िल्म दिखाई


लेकिन फिर मुन्ने को पैसे उड़ाने का चसका पड़ गया। रोज़-रोज़ वो इस काम में माहिर होता गया और उसकी ये आदत उसे बुरी सोहबत में ले गई। एक दिन वो घर से भाग गया। बीस साल बाद मामूँ जान की उससे मुलाक़ात इन हालात में हुई थी कि उसकी तस्वीर उसके हाथ में रह गई थी।
“आप... आप इस तस्वीर को इस तरह क्यों घूर रहे हैं। क्या आप जानते हैं ये किसकी तस्वीर है। इस तरह तो शायद हम इसको गिरफ़्तार करा सकें।”
नवाब काशिफ़ बोले
“नहीं


हम उसे गिरफ़्तार नहीं करवाएँगे।”
“लेकिन क्यों
आपको उस चोर से हमदर्दी क्यों है?”
“गिरफ़्तार ही करना है तो मुझे गिरफ़्तार कराओ।”


वो एक साथ बोले
“जी क्या मतलब?”
और वो उन्हें मुन्ने की और अपनी पुरानी कहानी सुनाने लगे।

- ishtiyaq-ahmad


एक आदमी गाड़ी में भूसा भर कर लिए जा रहा था। रास्ते में कीचड़ थी। गाड़ी कीचड़ में फंस गई। वो आदमी सर पकड़ कर बैठ गया और लगा चीख़ने
“ऐ प्यारी परियों
आओ और मेरी मदद करो। मैं अकेला हूँ
गाड़ी को कीचड़ से निकाल नहीं सकता।”


ये सुनकर एक परी आई और बोली
“आओ मैं तुम्हारी मदद करूँ। ज़रा तुम पहियों के आस-पास से कीचड़ तो हटाओ।” गाड़ी वाले ने फ़ौरन कीचड़ हटा दी।
परी बोली
“अब ज़रा रास्ते से कंकर-पत्थर भी हटा दो।”


गाड़ीबान ने कंकर-पत्थर भी हटा दिए और बोला
“प्यारी परी
अब तो मेरी मदद करो।”
परी हंसते हुए बोली


“अब तुम्हें किसी की मदद की ज़रूरत नहीं। तुमने अपना काम आप कर लिया है। घोड़े को हाँको। रास्ता साफ़ हो गया है।”

- kishwar-naheed


एक दफ़ा' का ज़िक्र है कि चाँदनी रात में एक दुबले-पतले
सूखे-मारे भूके भेड़िए की एक ख़ूब खाए पीए
मोटे-ताज़े कुत्ते से मुलाक़ात हुई। दुआ-सलाम के बाद भेड़िए ने उससे पूछा
“ऐ दोस्त तू तो ख़ूब तर-ओ-ताज़ा दिखाई देता है। सच कहता हूँ कि मैंने तुझसे ज़्यादा मोटा-ताज़ा जानवर आज तक नहीं देखा। भाई ये तो बता कि इसका क्या राज़ है? मैं तुझसे दस गुना ज़्यादा मेहनत करता हूँ और इसके बावुजूद भूका मरता हूँ।”


कुत्ता ये सुनकर ख़ुश हुआ और उसने बे-नियाज़ी से जवाब दिया
“ऐ दोस्त अगर तू भी मेरी तरह करे तो मुझे यक़ीन है कि तू भी मेरी तरह ख़ुश रहेगा।”
भेड़िए ने पूछा
“भाई जल्दी बता


वो बात क्या है?”
कुत्ते ने जवाब दिया
“तू भी मेरी तरह रात को घर की चौकीदारी कर और चोरों को घर में न घुसने दे। बस यही काम है।”
भेड़िए ने कहा


“भाई मैं दिल-ओ-जान से ये काम करूँगा। इस वक़्त मेरी हालत बहुत तंग है। मैं हर रोज़ खाने की तलाश में सारे जंगल में हैरान-ओ-परेशान मारा-मारा फिरता हूँ। बारिश
पाले और बर्फ़-बारी के सदमे उठाता हूँ
फिर भी पेट पूरी तरह नहीं भरता। अगर तेरी तरह मुझे भी गर्म घर रहने को और पेट भर खाने को मिले तो मेरे लिए इससे बेहतर क्या बात है।”
कुत्ते ने कहा


“ये जो कुछ मैं कह रहा हूँ
सच है। अब तो फ़िक्र मत कर। बस मेरे साथ चल।”
ये सुनकर भेड़िया कुत्ते के साथ-साथ चल दिया। अभी वो कुछ दूर ही गए थे कि भेड़िए की नज़र कुत्ते के गले पर पड़े हुए इस निशान पर पड़ी जो गले के पट्टे से पड़ गया था। भेड़िए ने पूछा
“ऐ दोस्त तेरे गले के चारों तरफ़ ये क्या निशान है।”


कुत्ते ने कहा
“कुछ नहीं।”
भेड़िए ने फिर कहा
“ए दोस्त बता तो सही ये क्या निशान है?”


कुत्ते ने दुबारा पूछने पर जवाब दिया
“अगर तू इसरार करता है तो सुन
मैं चूँकि दरिन्दा सिफ़त हूँ। दिन को मेरे गले में पट्टा डाल कर वो बाँध देते हैं ताकि मैं सो रहूँ और किसी को न काटूँ और रात को पट्टा खोल कर छोड़ देते हैं ताकि मैं चौकीदारी करूँ और जिधर मेरा दिल चाहे जाऊँ। रात को खाने के बाद मेरा मालिक मेरे लिए हड्डियों और गोश्त से तैयार किया हुआ रातिब मेरे सामने डालता है और बच्चों से जो खाना बच जाता है
वो सब भी मेरे सामने डाल देता है। घर का हर आदमी मुझसे प्यार करता है। जमा ख़ातिर रख


यही सुलूक
जो मेरे साथ किया जाता है
वही तेरे साथ होगा।”
ये सुनकर भेड़िया रुक गया। कुत्ते ने कहा


“चलो-चलो क्या सोचते हो।”
भेड़िए ने कहा
“ए दोस्त मुझे तो बस माफ़ करो। ये ख़ुशी और आराम तुझे ही मुबारक हों। मेरे लिए तो आज़ादी ही सबसे बड़ी नेअमत है। जैसा तू ने बताया उस तरह अगर कोई मुझे बादशाह भी बना दे तो मुझे क़ुबूल नहीं।”
ये कह कर भेड़िया पलटा और तेज़ी से दौड़ता हुआ जंगल की तरफ़ चल दिया।


- jameel-jalibi


रशीदा का शौहर शहाब कारोबारी दौरे पर हांगकांग गया हुआ था। उसका एक पुर-रौनक़ इलाक़े की मार्केट में गारमेंटस का एक बड़ा सा स्टोर था जिसमें बच्चों के मलबूसात फ़रोख़्त किए जाते थे। स्टोर में तीन सेल्ज़-मेन काम करते थे एक लड़का भी था जो सफ़ाई-सुथराई और दूसरे छोटे-मोटे काम किया करता था। ये स्टोर इस लिहाज़ से मशहूर था कि इसकी हर वराइटी बाहर की होती थी।
अच्छी बात तो ये है कि हम पाकिस्तान में रहते हैं
हमें यहाँ ही की बनी हुई चीज़ें इस्तेमाल करने में फ़ख़्र महसूस होना चाहिए
मगर अक्सर लोगों को ये ग़लत-फ़हमी होती है कि बाहर की चीज़ें अच्छी होती हैं। ऐसे ही ग़लत-फ़हमी के शिकार लोगों की वजह से शहाब की दुकान पर ग्राहकों का ताँता बंधा रहता था और उसकी ख़ूब बिक्री होती थी। वो दुबई


चाइना
मलेशिया और हांगकांग जा कर ख़ुद माल लेकर आता था। हर महीने उसका एक चक्कर इन ममालिक में ज़रूर लगता था।
रशीदा और शहाब के दो बच्चे थे। अहमद दस साल का बेटा था और हरीम आठ साल की बेटी। अहमद बहुत अच्छा बच्चा था मगर ये माज़ी की बात थी। चंद दिनों से रशीदा महसूस करने लगी थी कि अहमद में तब्दीलियाँ आती जा रही थीं। ये तब्दीलियाँ अच्छी नहीं बल्कि बुरी थीं और इसी वजह से रशीदा उसकी तरफ़ से फ़िक्र-मंद रहने लगी थी।
वो पहले ज़िद नहीं करता था


अब बात-बात पर ज़िद करने लगा था
पहले वो उसकी हर बात मानता था
अब उसकी कोई बात नहीं मानता था बल्कि उससे बहस करने भी बैठ जाता था। पहले वो जो कुछ भी पकाती थी
ख़ामोशी से खा लेता था


मगर अब वो खाना खाने में भी नख़रे करने लगा था
ये क्यों पकाया वो क्यों नहीं पकाया...
रशीदा एक पढ़ी-लिखी समझदार औरत थी। उसने अपने बच्चों के साथ हमेशा प्यार-मुहब्बत और दोस्ती वाला सुलूक रवा रखा था। वो उनको हल्की-फुल्की डाँट तो पिला देती थी मगर उन पर हाथ कभी नहीं उठाती थी। अहमद के बदले हुए रवैय्ये ने उसे फ़िक्र-मंद कर दिया था। वो उसके रवैय्ये की तब्दीली के अस्बाब पर ग़ौर करने लगी तो उस पर ये इन्किशाफ़ हुआ कि जब से अहमद ने अस्र और मग़रिब के दरमयान बच्चों के साथ खेलने के लिए बाहर गली में जाना शुरू किया है
वो तब से ही बिगड़ गया है


इससे पहले वो ठीक था। और तो और अब तो उसने मोबाइल के लिए भी ज़िद शुरू कर दी थी।
रशीदा ने सबसे पहला काम ये किया कि उसका घर से निकलना बंद कर दिया। इस पर उसने एहतिजाज किया और माँ से थोड़ी सी बदतमीज़ी भी की। रशीदा को उसकी बदतमीज़ी पर अफ़सोस भी हुआ और ग़ुस्सा भी आया। उस रात शहाब दुकान से घर आया तो रशीदा ने अहमद की हरकतों की शिकायत की। नतीजे में उसे बाप की जानिब से डाँट सुननी पड़ गई
वो बाप से डरता था
उसने घर से निकलना तो बंद कर दिया मगर उसकी ज़िदों में मज़ीद इज़ाफ़ा हो गया। ये ज़िद ज़्यादा-तर खानों के सिलसिले में होती थी।


शहाब को हांगकांग गए हुए पहला रोज़ था। अहमद और हरीम स्कूल से आ गए थे। उनके स्कूल एक हफ़्ते के लिए बंद हो गए थे। स्कूलों की छुट्टियों की वजह से हरीम बहुत ख़ुश थी
घर में आते ही उसने ये ख़बर रशीदा को सुनाई थी। अहमद ख़ामोशी से अपने कमरे में चला गया था। अपने कमरे में जब वो स्कूल के कपड़े बदल रहा था तो उसने खिड़की में से देखा उसके दोस्त गली में खेल रहे हैं। उसके दिल को एक धक्का सा लगा।
“एक ये बच्चे हैं कि दिन भर गलियों में खेलते फिरते हैं
एक मैं हूँ कि हर वक़्त घर में बंद रहता हूँ। मेरे लिए कितनी पाबंदियाँ हैं


या तो टीवी देखूँ
या खिलौनों से खेलूँ और या फिर बोर-बोर कहानियों की किताबें पढ़ता रहूँ। इन लोगों की अम्मियाँ कितनी अच्छी हैं
इन्हें कुछ नहीं कहतीं और एक मेरी अम्मी हैं
हर वक़्त पीछे पड़ी रहती हैं


ये करो ये मत करो।” उसने बड़ी हसरत से सोचा और किचन की जानिब बढ़ गया।
“भूक लगी है। आपने क्या पकाया है?” उसने बड़ी बे-रुख़ी से पूछा।
“आज मैं बहुत थक गई थी। कुछ पकाने को दिल नहीं चाह रहा था। मैंने दाल-चावल पका लिए हैं
शाम को कोई अच्छी चीज़ पका लूँगी।” उसकी अम्मी ने दाल में बघार देते हुए कहा।


“दाल-चावल?” अहमद ने तेज़ आवाज़ में कहा। “मैं तो दाल-चावल नहीं खाऊँगा। मेरे लिए बिरयानी पकाएँ।”
रशीदा को ग़ुस्सा नहीं आता था मगर अहमद के गुस्ताख लहजे से वो सख़्त तैश में आ गई। “तुम्हारे बाप ने मुझे नौकरानी नहीं रखा है कि मैं तुम्हारी मर्ज़ी पर चलूँ। खाना है तो खाओ
वर्ना दफ़ा हो जाओ।”
अहमद को महल्ले का एक दोस्त साजिद याद आ गया। साजिद ख़ुद भी बदतमीज़ था और बदतमीज़ दोस्तों को पसंद करता था। उसके वो दोस्त जो बदतमीज़ नहीं होते थे


वो उन्हें भी बदतमीज़ियाँ सिखा देता था। एक रोज़ उसने अहमद को बताया था कि जब उसकी अम्मी उसकी कोई बात नहीं मानतीं तो वो धमकी देता है कि वो घर छोड़ कर चला जाएगा। चूँकि वो इकलौता है
इसलिए उसकी अम्मी डर जाती हैं और उसकी बात मान लेती हैं। अहमद को साजिद की ये बात याद आई तो उसने भी इस तरकीब को आज़माने का फ़ैसला किया।
“अगर आपने बिरयानी नहीं पकाई तो मैं घर छोड़ कर चला जाऊँगा।” उसने चीख़ कर कहा...
उसकी बात सुनकर रशीदा सन्नाटे में आ गई। उसने हैरत से उसे देखा


उसका हाथ पकड़ कर ड्रॉइंग-रूम में लाई और सोफ़े पर बैठ कर बोली
“ये बात तुमने की तो क्यों की? घर छोड़ कर तुम कहाँ जाओगे?”
“मैं नानी के घर चला जाऊँगा। उनके घर का रास्ता मुझे मालूम है। मैं वहाँ से उस वक़्त तक नहीं आउंगा
जब तक आप बिरयानी नहीं पकाएँगी।”


“तुम्हारी नानी के घर तो मैं ख़ुद तुम्हें अभी छोड़ कर आती हूँ। लेकिन तुम्हें मुझसे एक वा’दा करना पड़ेगा कि जब तक मैं बिरयानी न पकाऊँ तुम घर में क़दम भी नहीं रखोगे।”
रशीदा जो ग़ुस्से से तिलमिला रही थी दाँत पीस कर बोली
“लेकिन अहमद ये वा’दा करने से पहले ख़ूब सोच समझ लेना
मैं तुम्हें अभी बता रही हूँ कि मैं बिरयानी नहीं पकाऊँगी।”


“तो फिर मैं भी वापिस नहीं आउँगा।” अहमद ने सीना तान कर बड़ी ढिटाई से जवाब दिया। रशीदा चंद लम्हे तक उसे घूरती रही
फिर उठी
जल्दी-जल्दी उसके कपड़े एक बैग में भर कर उसको बैग पकड़ाया और उसे गाड़ी में बिठा कर नानी के घर ले गई जो ज़्यादा दूर नहीं था। हरीम भी उसके साथ थी। गाड़ी में रशीदा ने हरीम को भी अहमद की गुस्ताख़ी के बारे में बता दिया था। हरीम बहुत अच्छी लड़की थी
उसने आज तक अपनी माँ से कोई बदतमीज़ी नहीं की थी। अहमद की हरकत के मुताल्लिक़ सुनकर उसे अफ़सोस हुआ था। वो अहमद से भी बहुत मुहब्बत करती थी।


उसने भाई को समझाने की कोशिश की मगर अहमद न माना और हरीम से बोला
“अगर मेरा इतना ही ख़्याल है तो अम्मी से कह कर बिरयानी पकवा लो। मैं घर छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगा।”
हरीम ख़ामोश हो गई। थोड़ी देर बाद वो लोग नानी के घर पहुँच गए। नानी के घर के ऊपर वाले पोर्शन में उनका बड़ा बेटा
उसकी बीवी और तीन बच्चे रहते थे। नानी माँ नीचे रहती थीं और अपना खाना-पकाना ख़ुद करती थीं। नानी ने जो रशीदा


अहमद और हरीम को देखा तो ख़ुश हो गईं। रशीदा और हरीम कुछ ख़ामोश-ख़ामोश सी थीं। ये बात नानी ने महसूस तो कर ली थी
मगर उन्होंने कुछ पूछा नहीं।
रशीदा ने अपनी माँ से कहा
“स्कूल एक हफ़्ते के लिए बंद हो गए हैं। अहमद को मैं आपके पास छोड़ने आई हूँ।”


इस ख़बर से नानी माँ मज़ीद ख़ुश हो गईं। कुछ देर बाद बोलीं
“हरीम को भी यहीं छोड़ देतीं। इसका भी तो स्कूल बंद हो गया होगा।”
“हरीम को यहाँ छोड़ा तो फिर मैं घर में अकेली रह जाऊँगी। इनके पापा बाहर गए हुए हैं।”
इतनी देर में मामूँ के तीनों बच्चे भी आ गए। हरीम और अहमद को देख कर उन्होंने मुसर्रत का इज़हार किया। इन बच्चों में सिर्फ अस्मा ही थी जो हरीम की हम-उम्र थी। वो हरीम को अपने कमरे में ले गई और उसे अपनी गुड़िया दिखाने लगी जो वो कल ही अपने बाप के साथ जा कर लाई थी। बातों ही बातों में हरीम ने अस्मा को अहमद की कारस्तानी से आगाह कर दिया। उसने उसे ये भी बता दिया कि अहमद जब तक वापिस घर नहीं जाएगा जब तक अम्मी बिरयानी न पका लें। वो ज़िद में आ गया है।


“अहमद भाई पहले तो ऐसे नहीं थे। अब उन्हें क्या हो गया है?” अस्मा ने हैरत से पूछा।
“अम्मी का ख़्याल है कि उनके दोस्त उन्हें बुरी-बुरी बातें सिखाते हैं। वाक़ई वो पहले ऐसे नहीं थे। जबसे महल्ले के चंद नए लड़कों से उनकी दोस्ती हुई है वो ऐसे ही हो गए हैं।”
“हमारे पापा हमें बताते हैं कि भाई-बहन आपस में बेहतरीन दोस्त होते हैं। पहले जैसा ज़माना नहीं रहा। उस वक़्त दोस्त भी अच्छे होते थे। अब तो अच्छे दोस्त बहुत कम मिलते हैं।”
रशीदा ने अहमद की बदतमीज़ी का तज़किरा अपनी माँ से भी नहीं किया था क्योंकि इससे अहमद की बे-इज़्ज़ती होती


मगर हरीम ने ये बात अस्मा को बता दी थी और जब रशीदा हरीम को लेकर वापिस चली गई तो अस्मा ने ये बात अपने घर वालों को बता दी। अहमद के मामूँ के बच्चों को जब ये पता चला कि अहमद इस क़दर बदतमीज़ हो गया है
ज़िद करता है
अपनी अम्मी से ज़बान चलाता है और बुरे लड़कों से दोस्ती रखता है तो वो एक दम से अहमद से खिंचने लगे।
अहमद ने ये बात महसूस कर ली थी। उसने अस्मा के भाई फ़हीम से इसका सबब पूछा तो उसने साफ़-साफ़ बता दिया कि वो किस वजह से उससे बात नहीं कर रहे। अहमद को बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई। रशीदा अपनी माँ को बता गई थी कि अहमद ने खाना नहीं खाया है। नानी माँ ने अपने लिए खिचड़ी पकाई थी


वो उन्होंने अहमद को दी तो उसने चुप-चाप खा ली। फिर वो बिस्तर पर लेट गया। उसका दिल उदास था। उसे कुछ-कुछ एहसास होने लगा था कि वो ग़लती पर था
इससे पहले कि ये एहसास बढ़ता
उसे नींद आ गई।
शाम को आँख खुली


वो कमरे से बाहर आया। मामूँ के बच्चे उसे देख कर इधर-उधर हो गए। उसका दिल कट कर रह गया।
“ये लोग मुझे बुरा लड़का समझते हैं
इसीलिए बात करना पसंद नहीं कर रहे।” उसने उदासी से सोचा। उसे अपनी अम्मी और हरीम याद आने लगी थीं। उसका दिल चाह रहा था कि उड़ कर घर पहुँच जाये। उसके दिल में एक उम्मीद सी थी कि शायद अम्मी ने रात के खाने में बिरयानी पका ली हो।
वो नानी माँ के पास आया। “नानी माँ। मेरी बात हरीम से करवा दीजिए।” उसने बड़े अदब से कहा।


नानी माँ ने रशीदा का नंबर मिलाया और मोबाइल अहमद को थमा दिया। दूसरी तरफ़ रशीदा थी। “मुझे हरीम से बात करनी है।” उसने बड़े कमज़ोर से लहजे में कहा।
थोड़ी देर बाद उसके कानों में हरीम की आवाज़ आई
“अहमद भाई। बड़े मज़े आ रहे हैं। अकेले ही अकेले चले गए
झूटे मुँह भी हमसे नहीं पूछा कि हरीम तुम भी नानी माँ के यहाँ रह लो।” हरीम ने शोख़ आवाज़ में कहा।


अहमद ने सुनी अन-सुनी कर के कहा
“हरीम
क्या रात के खाने में बिरयानी पकी है?”
चूँकि उसने हरीम की बात का जवाब नहीं दिया था


इस बात से वो चिड़ गई और झुंजला कर बोली
“बिरयानी नहीं पकी है भाई। अपनी ज़िद छोड़ क्यों नहीं देते?”
अहमद ने उसकी अगली बात नहीं सुनी और मायूसी से फ़ोन बंद कर के नानी माँ को दे दिया। रात को मामूँ आए। उन्होंने अहमद को देखकर ख़ुशी का इज़हार किया फिर बोले
“मियाँ


रात का खाना तुम हमारे साथ खाओगे।” अपने मामूँ-ज़ाद भाई बहनों का तल्ख़ रवैय्या अहमद को याद आ गया था। उसने कहा
“शुक्रिया मामूँ जान। नानी माँ ने मेरे लिए दाल-चावल बना लिए हैं
मैं उनके साथ ही खाना खाऊँगा”
रात जब वो सोने लगा तो उसका दिल भर आया। उसे अपनी अम्मी की याद आने लगी थी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे रह रह कर अपने रवैय्ये पर अफ़सोस हो रहा था। उसे एहसास हो गया था कि ग़लती उसी की थी। उसकी अम्मी उससे कितना प्यार करती थीं


उसकी छोटी-छोटी ज़रूरियात का भी हद से ज़्यादा ख़्याल रखती थीं। उसकी हर सालगिरह बड़ी धूम-धाम से मनाने के इंतिज़ामात करती थीं। बाज़ार जातीं तो उसके लिए तरह-तरह के खिलौने ख़रीद कर लाती थीं। उनकी इस मुहब्बत और तवज्जो का उसने ये सिला दिया कि उनसे तेज़ आवाज़ में बात करने लगा
उनकी बातें मानना छोड़ दीं।
“किस क़दर बुरा किया था मैंने।” उसके मुँह से बे-इख़्तियार निकला और इस शदीद शर्मिंदगी के एहसास से मग़्लूब हो कर उसने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। नानी माँ परेशान हो कर उसके पास आ गईं। रोने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मामूँ
मुमानी और उनके तीनों बच्चे भी नीचे आ गए।”


“क्या हुआ अहमद? तुम रो क्यों रहे हो?”। मामूँ ने घबरा कर पूछा।
“मुझे अम्मी याद आ रही हैं। मैंने अपनी बुरी हरकतों से उन्हें नाराज़ कर दिया है। मैं शर्मिंदा हूँ। मुझे उनके पास ले चलिए। मैं उनसे माफ़ी माँगूँगा। मैं उनसे ये वा’दा भी करूँगा कि आइन्दा एक अच्छा बच्चा बन कर दिखाऊँगा और किसी क़िस्म की कोई ज़िद नहीं करूँगा।”
मामूँ जान ने उसी वक़्त गाड़ी निकाली। गाड़ी में नानी माँ
मामूँ जान


मुमानी
उनके तीनों बच्चे और अहमद ठुस-ठुसा कर बैठ गए और थोड़ी ही देर में रशीदा के घर पहुँच गए। रशीदा को देखते ही अहमद दौड़ कर उससे लिपट गया।
“अम्मी मुझे माफ़ कर दीजिए। अब मैं आपको एक अच्छा बच्चा बन कर दिखाऊँगा। मैं वा’दा करता हूँ।”
रशीदा ने उसको प्यार से ख़ुद से लिपटा लिया। “जानते हो अहमद जब से तुम गए हो मैंने न दोपहर का खाना खाया है और न ही रात का। मुझे ख़ुशी है कि तुम्हें अपनी ग़लती का एहसास हो गया है। याद रखो


माँ बाप अपने बच्चों से जो कहते हैं
उसमें बच्चों की ही भलाई होती है।”
अहमद के सीधे रास्ते पर आ जाने से सब लोगों को बहुत ख़ुशी हुई। रशीदा उन लोगों के लिए चाय बनाने किचन में चली गई। सारे बच्चे एक दूसरे से बातों में मसरूफ़ हो गए। अहमद अपने दिल में सोच रहा था कि जब मैं एक बुरा लड़का था तो मामूँ जान के बच्चे मुझसे खिंचे-खिंचे थे
अब मैं अच्छा बन गया हूँ तो ये मेरे दोस्त बन गए हैं और मुझसे घुल-मिल कर बातें कर रहे हैं। सच है बुरी आदतों के बच्चों से कोई प्यार नहीं करता


अच्छे बच्चों को सब पसंद करते हैं। वो ख़ुशी महसूस कर रहा था कि अब वो भी अच्छा बच्चा बन गया है।

- mukhtar-ahmad


हसन और रोहन की दोस्ती गाँव भर में मशहूर थी।
बचपन के दोस्त थे
जवानी में भी दोस्ती क़ायम थी। दोनों के मिज़ाज में इतनी हम-आहंगी थी कि एक चीज़ एक को पसंद आती तो दूसरा भी उसे पसंद करने लगता। किसी बात से एक नाराज़ होता तो दूसरा भी उस तरफ़ से रुख़ फेर लेता।
दोनों के ख़ानदान वाले भी उनकी दोस्ती पर नाज़ करते।


रोहन बचपन से बीमार रहता था। बारिश में भीगा कि बुख़ार जकड़ लेता
लू लगती तो बिस्तर पर पड़ जाता
सर्दी में नज़ला
खाँसी उसे घेरे रहते। इस वजह से दिमाग़ी तौर पर कमज़ोर हो गया था। सातवीं क्लास के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी।


हसन को भी पढ़ाई लिखाई से कोई ख़ास दिलचस्पी न थी मगर उसके वालिद की बड़ी ख़्वाहिश थी कि वो तालीम हासिल करे। दसवीं जमात के बाद उसने भी स्कूल जाना छोड़ दिया और अपने वालिद के साथ पर परचून की दुकान पर बैठने लगा। उसकी शादी भी जल्दी हो गई। दस साल का एक बेटा मुहसिन था उसका।
रोहन अपने पिता के साथ खेतों में काम करता था। एक रोज़ वो हसन के पास पहुँचा तो कुछ ग़मगीं था। हसन से बोला
“चलो कहीं बाहर चल कर बातें करते हैं।”
तन्हाई मिलते ही बोला


“हसन
मेरी शादी तय हो गई है।”
“ये तो ख़ुशी की बात है।” हसन ने उसे मुबारकबाद दी...
“कब है शादी?”


“तारीख़ तय करने परसों जाना है। तुझे भी साथ चलना है। मगर एक मसला सामने आ गया है।”
“तुम लोगों की तरफ़ से या लड़की वालों की तरफ़ से? हसन ने पूछा...
“न हमारी न उनकी तरफ़ से बल्कि लड़की ने मुझसे एक पहेली बूझने को कहा है।”
हसन को हंसी आ गई। रोहन रोती सूरत बना कर बोला


“तुम्हें हंसी आ रही है।”
“तौबा-तौबा अब नहीं हंसूँगा। पूरी बात बता।”
हसन ने माफ़ी माँग ली। सब कुछ तय हो गया
हम लोग वापिस लौटने लगे तो एक छोटी लड़की मुझे इशारा से एक तरफ़ बुला ले गई। वहाँ मेरी होने वाली पत्नी खड़ी थी। उसने कहा “मैंने सुना है तुम कम पढ़े लिखे हो… मेरी एक पहेली का जवाब दो। जवाब न दे सके तो मैं शादी से इन्कार कर दूँगी।”


“क्या है वो पहेली?”
“दो बाप
दो बेटे
एक साथ मछली पकड़ने गए। हर एक ने एक एक मछली पकड़ी


आपस में तक़सीम कर ली। ख़ुशी-ख़ुशी तीन मछलियाँ लेकर घर लौटे। कैसे? लोग तो चार थे। मुझे जवाब नहीं देते बना। मुझे जवाब नहीं मालूम था।”
“फिर क्या हुआ?” हसन ने पूछा...
“मेरा उतरा हुआ मुँह देख कर बोली
कल तक जवाब लेकर आओ।


हसन! तुझे पहेली का जवाब मालूम है? मैं किसी और से नहीं पूछ सकता। पूरे गाँव में बात फैल जाएगी। फिर कोई लड़की मुझसे शादी नहीं करेगी।”
हसन ने सोचते हुए कहा
“नहीं
जवाब मुझे भी नहीं मालूम मगर मैं सोचता हूँ कि तुम भी सोचो यक़ीनन जवाब मिल जाएगा।”


हसन की बीवी नईमा बड़ी अक़लमंद थी। हसन ने उसे सारी बात बताई। किसी से न बताने का वाअदा लिया। नईमा को भी जवाब नहीं मालूम था।
नईमा ने रात का खाना बनाया। वो मुसलसल पहेली के बारे में सोच रही थी। उसने दस्तर-ख़्वान बिछाया। खाना लगाया। सुसर साहिब को बुलाया
हसन को बुलाया और मुहसिन को भी आवाज़ दी। तीनों बैठ गए तो नईमा ने ज्वार की तीन मोटी-मोटी रोटियाँ एक प्लेट में ला कर रख दीं। बोली...
दो बाप


दो बेटे
रोटियाँ पकाईं तीन। हर एक के हिस्से की एक-एक रोटी चलो बिसमिल्लाह करो।”
“वाह अम्मी!” मुहसिन खुल कर हंस पड़ा...
“आपका हिसाब ग़लत हो गया। दो बाप दो बेटे मिल कर तो चार होते हैं।”


“बिलकुल ग़लत नहीं हुआ बेटे…” नईमा ने हंसकर कहा “दादा बाप और बेटा
कहने को तो तीन हैं मगर दो बाप यानी एक तुम्हारे अब्बू और एक तुम्हारे अब्बू के अब्बू और दो बेटे यानी दादा-जान के बेटे तुम्हारे अब्बू और तुम्हारे अब्बू के बेटे तुम गिनती में चार हैं।”
हसन के दिमाग़ की खिड़की खुल गई। फ़ौरन उठ खड़ा हुआ। बोला...
“अब्बू जान


बिसमिल्लाह कीजिए
मैं अभी आया।”
हसन तक़रीबन दौड़ता हुआ रोहन के घर पहुँचा। उसे बाहर बुलाया। उसके कान में बोला
दो बाप। दो बेटे यानी दादा


बाप और पोता। तीन मछलियाँ
इन तीनों में तक़सीम हुईं। अब कल सुबह ही ससुराल पहुँच जा। होने वाली दुल्हन को पहेली का जवाब दे-दे। मैं जा रहा हूँ अब्बू जान खाने पर मेरा इंतिज़ार कर रहे हैं।”
रोहन ने ख़ुश हो कर हसन को गले लगा लिया। हसन घर लौट गया।

- bano-sartaj


नन्हे भाई हमें कितनी बार ही बेवक़ूफ़ बनाते
मगर हमको आख़िर में कुछ ऐसा क़ाइल कर दिया करते थे कि उन पर से एतबार न उठता। मगर एक वाक़ए ने तो हमारी बिलकुल ही कमर तोड़ दी। न जाने क्यों बैठे बिठाए जो आफ़त आई तो पूछ बैठे
“नन्हे भाई ये रेशम कैसे बनता है?”
“अरे बुद्धू ये भी नहीं मालूम


रेशम कैसे बनता है
इसमें मुश्किल ही क्या है। सादा सूती धागा लो। उसे दो पलंगों के पाए पर ऐसे तान दो जैसे पतंग का माँझा तानते हैं। बस जनाब-ए-आली अब एक या दो हस्ब-ए-ज़रूरत अंडे ले लो। उनकी ज़र्दी अलग कर लो
उन्हें ख़ूब कांटे से फेंटो
अच्छा नमक मिर्च डाल कर


ऑमलेट बना कर हमें खिलाओ
समझीं?”
“हाँ आँ। मगर रेशम?”
“चह! बेवक़ूफ़ अब सुनो तो आगे। बाक़ी बची सफ़ेदी


उसे लेकर इतना फेंटो
इतना फेंटो कि वो फूल कर कुप्पा हो जाएगी। बस जनाब अब ये सफ़ेदी बड़ी एहतियात से पलंग के पायों पर तने हुए तागे पर लगा दो। जब सूख जाए
सँभाल के उतार कर उसका गोला बना लो
आप चाहे उसके रेशम से साड़ियाँ बुनो


चाहे क़मीसें बनाओ।”
“अरे बाप रे!” हमने सोचा
रेशम बनाना इतना आसान है और हम अब तक बुद्धू ही थे
जो अम्माँ से रेशमी कपड़ों के लिए फ़र्माइश करते रहे। अरे हम ख़ुद इतना ढेरों रेशम बना सकते हैं तो हमें क्या ग़रज़ पड़ी है


जो किसी की जूतियाँ चाटते फिरें।
बस साहब
उसी वक़्त एक अण्डा मुहय्या किया गया। ताज़ा-ताज़ा काली मुर्ग़ी डरबे में दे कर उठी और हमने झपट लिया। फ़ौरन नुस्ख़े पर अमल किया गया
यानी ज़र्दी का ऑमलेट बना कर ख़ुद खा लिया


क्योंकि नन्हे भाई नहीं थे उस वक़्त। अब सवाल ये पैदा हुआ कि तागा कहाँ से आए? ज़ाहिर है कि तागा सिर्फ़ आपा की सीने-पिरोने वाली संदूक़ची में ही मिल सकता था। सख़्त मर्ख़नी थीं आपा। मगर हमने सोचा
नर्म-नर्म रेशम की लच्छियों से वो ज़रूर नर्म हो जाएँगी। क्या है
हम भी आज उन्हें ख़ुश ही क्यों न कर दें। बहुत नालाँ रहती हैं हमसे। बदक़िस्मती से वो हमें अपना दुश्मन समझ बैठी हैं। आज हम उन्हें शर्मिंदा कर के ही छोड़ेंगे। वो भी क्या याद करेंगी कि किस क़दर फर्स्ट-क्लास बहन अल्लाह पाक ने उन्हें बख़्शी है
जिसने सूत का रेशम बना दिया।


आपा जान सो रही थीं और हम दिल ही दिल में सोच रहे थे कि रेशम की मलाई लच्छियाँ देख कर आपा भी रेशम का लच्छा हो जाएँगी
और फिर हमें कितना प्यार करेंगी।
सख़्त चिपचिपा और बदबूदार था रेशम बनाने का ये मसाला। ना-तजुर्बा-कारी की वजह से आधा तागा तो उलझ कर बेकार हो गया। मगर हमने भी आज तहय्या कर लिया था कि अपनी क़ाबिलीयत का सिक्का जमा कर ही चैन लेंगे।
लिहाज़ा आपा की संदूक़ची में से हमने सारी की सारी रंग-बिरंगी सूती और रेशमी रीलें ले कर दो पलंगों के दरमियान तान दीं कि रेशम तो और चमक-दार हो जाएगा। सूत रेशम हो जाएगी। अब हमने अंडे की फेंटी हुई सफ़ेदी से ताने हुए तागे पर ख़ूब गस्से देने शुरू किए।


इतने में आपा जान आँखें मलती और जमाइयाँ लेती हुई हमारे सर पर आन धमकीं। थोड़ी देर तो वो भौंचक्की सी खड़ी ये सारा तमाशा देखती रहीं। फिर बोलीं
“ये... ये क्या... कर रही है। मर्दी?” उन्होंने ब-वक़्त आवाज़ हल्क़ से निकाली।
“रेशम बना रहे हैं!” हमने निहायत ग़ुरूर से कहा और फिर नुस्ख़े की तफ़सील बताई।
और फिर घर में वही क़यामत-ए-सुग़रा आ गई जो उमूमन हमारी छोटी-मोटी हरकतों पर आ जाने की आदी हो चुकी थी। ना-शुक्री आपा ने हमारी सख़्त पिटाई की।


घर में सब ही बुज़ुर्गों ने दस्त-ए-शफ़क़त फेरा
“रेशम बनाने चली थीं!”
“अपने कफ़न के लिए रेशम बना रही थी चुड़ैल।”
लोगों ने ज़िंदगी दूभर कर दी


क्योंकि वाक़ई रेशम बनने के बजाय तागा
बर्तन माँझने का जूना बन गया।
हमने जब नन्हे भाई से शिकायत की तो बोले
“कुछ कसर रह गई होगी... अण्डा बासी होगा।”


“नहीं
ताज़ा था
उसी वक़्त काली मुर्ग़ी देकर गई थी।”
“काली मुर्ग़ी का अण्डा! पगली कहीं की! काली मुर्ग़ी के अंडे से कहीं रेशम बनता है।”


“तो फिर?” हमने अहमक़ों की तरह पूछा...
“सफ़ेद झक मुर्ग़ी का अण्डा होना चाहिए।”
“अच्छा?”
“और क्या


और ऑमलेट तुम ख़ुद निगल गईं। हमें खिलाना चाहिए था।”
“तब रेशम बन जाता?”
“और क्या!” भय्या ने कहा और हम सोचने लगे। सफ़ेद मुर्ग़ी कमबख़्त कड़क है
अंडों पर बैठी है। न जाने कब अंडे देने शुरू करेगी। ख़ैर देखा जाएगा। एक दिन आपा को हमें मारने पर पछताना पड़ेगा। जब हम सारा घर रेशम की नर्म-नर्म लच्छियों से भर देंगे तो शर्म से आपा का सर झुक जाएगा


और वो कहेंगी
“प्यारी बहन मुझे माफ़ कर दे तो तू सच-मुच हीरा है।”
तो बच्चो
अगर तुम भी रेशम बनाना चाहते हो तो नुस्ख़ा याद रखो। अण्डा सफ़ेद मुर्ग़ी का हो। अगर फ़िलहाल वो कड़क है तो इंतिज़ार करो और ज़रदी का ऑमलेट नन्हे भाई को खिलाना। ख़ुद हरगिज़-हरगिज़ न खाना


वर्ना मंत्र उलट पड़ जाएगा और हालात निहायत भौंडी सूरत इख़्तियार कर लेंगे। फिर हमें दोष न देना।

- ismat-chughtai


ये उस ज़माने का ज़िक्र है जब बंदूक़ ईजाद नहीं हुई थी और लोग तीर कमान से शिकार खेलते थे।
एक दिन कुछ शिकारी शिकार की तलाश में जंगल में फिर रहे थे कि अचानक उनकी नज़र एक हिरन पर पड़ी। वो सब उसके पीछे हो लिए। शिकारी हिरन को चारों तरफ़ से घेर रहे थे और हिरन अपनी जान बचाने के लिए तेज़ी से भाग था। जब वो भागते-भागते थक गया तो एक घनी अंगूर की बेल के अंदर जा छिपा। शिकारियों ने उसे बहुत तलाश किया
लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला। आख़िर मायूस हो कर वो वहाँ से लौटने लगे।
जब कुछ वक़्त गुज़र गया तो हिरन ने सोचा कि अब ख़तरा टल गया है और वो बे-फ़िक्र हो कर मज़े से उसी अंगूर की बेल के पत्ते खाने लगा


जिसमें वो छुपा हुआ था।
एक शिकारी जो सबसे पीछे था
जब वहाँ से गुज़रा तो अंगूर की बेल और उसके गुच्छों को हिलते देख कर समझा कि यहाँ ज़रूर कोई जानवर छिपा है। उसने ताक के कई तीर मारे। इत्तेफ़ाक़ से एक तीर हिरन को जा लगा और वो वहीं ढेर हो गया।
मरते हुए हिरन ने अपने दिल में कहा


“ऐ बद-बख़्त तेरी ना-शुक्री की यही सज़ा है। मुसीबत के वक़्त जिसने तुझे पनाह दी
तूने उसी पर ज़ुल्म ढाया।
इतने में शिकारी भी वहाँ पहुँच गए। क्या देखते हैं वही हिरन मरा पड़ा है।

- jameel-jalibi