दर्द शायरी

दर्द से भरी शायरी

एक दर्द भरी शायरी संग्रह की खोज करें। इन बंदों से दर्द, दुःख और मानसिक उलझनों की गहराई को व्यक्त किया गया है, जो कवितात्मक शब्दों में प्रकट होती है।

जरूरत है मुझे कुछ नये नफरत करने वालों की.... पुराने वाले तो अब चाहने लगे है मुझे"....!!!

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छोड़ दो किस्मत की लकीरों पे यकीन करना
जब लोग बदल सकते हैं तो किस्मत क्या चीज़ है

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साथ जब भी छोड़ना
तो मुस्कुरा कर छोड़ना... ताकि दुनिया ये ना समझे
हम में दूरी हो गई...!!

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"किस हद तक जाना है ये कौन जानता है
किस मंजिल को पाना है ये कौन जानता है
दोस्ती के दो पल जी भर के जी लो
किस रोज़ बिछड जाना है ये कौन जानता है"

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न रुकी वक़्त की गर्दिश और न ज़माना बदला... पेड़ सूखा तो परिन्दो ने ठिकाना बदला...!!! मुझे देखने वाले लाखो है. लेकिन मै जिसे देखता हुॅ
वो लाखो में एक है.

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रहने दे अभी गुंजाइशें जरा अपनी बेरुखी में
इतना ना तोड़ मुझे कि मैं किसी और से जुड़ जाऊँ...!

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अभी सूरज नहीं डूबा जरा सी शाम होने दो
मैं खुद लौट जाऊंगा मुझे नाकाम तो होने दो
मुझे बदनाम करने का बहाना ढूंढ़ता है जमाना
मैं खुद हो जाऊंगा बदनाम पहले मेरा नाम तो होने दो।....

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माँ ने रख दी आखिरी रोटी भी मेरी थाली में.. मै पागल फिर भी खुदा की तलाश करता हूँ..

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रास्ते जैसे भी थे
संगीन थे दोस्त जितने भी मिले रंगीन थे कुछ न कुछ तो था मगर जाने न तुम कनखियों की राह पहचाने न तुम रास्ते में जो मिले ग़मगीन थे जो भी मिले संगी सभी नमकीन थे पड़ोसी जितने मिले तमाशबीन थे क्या करे पूंछे दिल का हाल किससे दिल ही दिल में सब दिलों से हीन थे

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मुद्दत से तमन्ना हुई अफसाना न मिला …… हम खोजते रहे मगर ठिकाना न मिला ………….. लो आज फिर चली गई जिंदगी नजरो के सामने से …… और उसे कोई रुकने का बहाना न मिला

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हम तो अच्छे थे
अब बुरे हुऐ कैसे ?? खुद तो बदले हो
बयान तो मत बदलो ।

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दोस्तों की दोस्ती से जलते हैं लोग तरह तरह की बातें करते हैं लोग जब चाँद का सूरज से होता है खुल कर मिलन तो उसे भी ग्रहण कहतें है लोग।

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अजीब दास्तान है इस छोटे से दिल की . मरम्मत हम करे
सुधारे भी हम . ओर तोड़ कोई ओर दे.

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फासला अब भी
दो क़दमों का ही है ..... कदम कौन बढ़ाए
तय ये नहीं है …..!!

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जनाज़ा मेरा रोककर वो इस अंदाज़ से बोली
हमने गली का कहा था तुम तो दुनिया छोड़ गए...

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"मत पूछो कि मै अल्फाज कहाँ से लाता हूँ
ये तो इसी दुनिया से दिया गया खजाना है
बस लुटाऐ जा रहा हूँ...."

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दरवाज़े बड़े करवाना है मुझे अपने आशियाने के
क्योंकि कुछ दोस्तों का कद बड़ा हो गया है चार पैसे कमाकर...||

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आज का सच~ एक नींद है.... जो रातभर नहीं आती और एक जमीर है..... जो हर वक़्त सोया रहता है।।

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चलते रहेंगे काफ़िले
मेरे बगैर भी यहाँ...!!! एक तारा टूटने से
कभी अंबर सूना नहीं होता...!!!

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देखकर भी तुमने जब नजरें चुराई थी | मजबूर होकर दूर हटा क्या बेवफाई थी ||

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ऐ मोहब्बत तू शर्म से ङुब मर


तू एक शख्स को मेरा न कर पायी



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पानी फेर दो इन पन्नो पर..... ताकि धुल जाए स्याही जिंदगी फिर से लिखने का मन करता है ..कभी - कभी....!!!

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लिखो तो पैगाम कुछ ऐसा लिखो की
कलम भी रोने पे मजबूर हो जाए.....! लफ़्ज़ों में वो दर्द भर दो की
पढ़ने वाला मिलने पे मजबूर हो जाए.............!

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नींद ना भी आऐ तो सो लिया करो जागते रहने से भी महबूब नही मिला करते..

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"इलाईची के दानों सा
मुक़द्दर है अपना...! महक उतनी ही बिखरी ... जितने पीसे गए"..!!

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