डीसेंट शायरी

शिष्टाचार पर शुद्ध शायरी

डिसेंट के बारे में शायरी का संग्रह करें। इन बंदों से शान्ति और समृद्धि को व्यक्त करें, महान संक्रांति के माध्यम से।

ऐक झूठी हसीं. हजारो आंसू को छूपा देने का हूनर रखती हैं|

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फना कर दो अपनी सारी ज़िंदगी
अपने "माँ " के कदमों मे
.. दुनियाँ मे
.. यही एक हस्ती है


जिसमे "बेवफाई " नही....!!

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जिंदगी की आधी शिकायतें ऐसे ही ठीक हो जाएँ
अगर लोग....... "एक दूसरे के बारे में बोलने की जगह एक दूसरे से बोलना सिख जाए|

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जीवन में किसी का भला करोगे
तो लाभ होगा. क्योंकि भला का उल्टा लाभ होता है । और जीवन में किसी पर दया करोगे
तो वो याद करेगा. क्योंकि दया का उल्टा याद होता है।:d:d

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ज्यादा कुछ नहीं बदला ज़िन्दगी में.. बस बटुए थोड़े भारी और रिश्ते थोड़े हलके हो गए.. आज की सच्चाई तो यह है कि.. फैसबुक या व्हाट्सअप्प पर 500 फ्रेंड्स है
और असल जिन्दगी में .. पड़ोसी से भी बोल चाल बंद हैं।

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शुकर मान के मेने तुझसे कभी "मुलाकात" नहीं कि.... !! वरना !! "तेरे दिल को तेरे खिलाफ कर देता".

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पूछा था हाल उसने बड़ी मुद्दतों के बाद कुछ पड़ गया हे आँख में यह कहकर रो पड़े ।। एक सुकून कि तालाश मे... ना जाने कितनी बेचैनियाँ पाल लीं. और लोग कहते हैं... हम बड़े हो गये और ज़िन्दगी संभाल ली.

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मेरे हालात पर हँसने वालो. बस इतना याद रखना. लोगो के बक्त आते है पर मेरा पूरा "दौर" आयेगा.

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मोहबत को जो निभाते हैं उनको मेरा सलाम है
और जो बीच रास्ते में छोड़ जाते हैं उनको
हुमारा ये पेघाम हैं
“वादा-ए-वफ़ा करो तो फिर खुद को फ़ना करो


वरना खुदा के लिए किसी की ज़िंदगी ना तबाह करो”

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कोई रो कर दिल बहलाता है
और कोई हँस कर दर्द छुपाता है। क्या करामात है कुदरत की जिन्दा इंसान पानी में ड़ुब जाता है और मूर्दा तैर के दिखाता है।

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मुसाफिर हूँ दोस्तो
अपनी राह चला जाऊँगा| अकेला था सफर में मैं
अकेला चला जाऊँगा| छोड़ जाऊँगा शब्दों की धरोहर अपनों के लिये
खाली हाथ आया था


खाली हाथ चला जाऊँगा| कितने रिश्ते बना लिये इस ठहराव में मैंने
मैं उनको बसा कर दिल में
बस चला जाऊँगा दोस्तो मुसाफिर का काम है बस चलते जाना
आज मैं यहाँ हूँ


कल कहीं और चला जाऊँगा|

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हराकर कोई जान भी ले ले
मुझे मंजुर है
.. पर……. धोखा देने वालों को मै दुबारा मौका नही देता

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राधा ने श्रीकृष्ण से पूछा: प्यार का असली मतलब क्या होता हैं..? श्रीकृष्ण ने हँस कर कहा : जहाँ मतलब होता हैं.. वहाँ प्यार ही कहाँ होता हैं..!

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सर्दियो के एक सर्द मौसम मे उसने मेरे हाथ थाम के कहा इतने गर्म हाथ वफा की निशानी होते है मुझे अब ख्याल आया उनके हाथ इतने ठंडे क्न्यो थे|

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मुझे इतनी फुर्सत कहाँ कि मैं तक़दीर का लिखा देखूं
बस... लोगों का दिल जलता देख कर समझ जाता हूँ
कि मेरी तक़दीर बुलंद है|

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अजब तेरी दुनिया गज़ब तेरा खेल
मोमबत्ती जलाकर मुर्दों को याद करना
और मोमबत्ती बुझाकर जन्मदिन मनाना.!!

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ख्वाहिशों को जेब में रखकर निकला कीजिये
साहब
खर्चा बहुत होता है
मंजिलों को पाने में|

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ज़िंदगी ने पुछा
"सपना क्या होता है???" तो हक़ीक़त बोली-"बंद आँखों में जो अपना होता है
खुली आँखों में वही सपना होता है"|

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मेरी आँखों के जादू से तुम अभी वाकिफ़ नही हो. . . . . हम उसे भी जीना सिखा देते है जिसे मरने का शौक हो|

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बादशाह की गली मेँ आकर बादशाह का पता नही पूंछते. यारा. . . गुलामों के जुके हुए सीर खुदबखुद रास्ता बता देते हैं!

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कभी अपनी उम्र और पैसो पर घंमड मत करना . . क्योकि . . जो चीजे गिनी जा सके वह यकीनन खत्म हो जाती है|

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कर्म भूमि पे फल के लिए श्रम सबको करना पडता है . . . . रब सिर्फ लकीरेँ देता है रंग हमको भरना पडता है|

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ज़रूर पढ़ें और सयानी होती बेटियों को भी पढ़ायें। क्यों करता है भारतीय समाज बेटियों की इतनी परवाह... एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई। चेहरे पर झलकता आक्रोश संत ने पूछा बोलो बेटी क्या बात है बालिका ने कहा- महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है। वह कुछ भी करे
कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती। इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है। यह मत करो
यहाँ मत जाओ
घर जल्दी आ जाओ आदि। संत मुस्कुराए और कहा... बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं? ये गार्डर सर्दी


गर्मी
बरसात
रात दिन इसी प्रकार पड़े रहते हैं। इसके बावजूद इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में। अब तुम चलो एक ज्वेलरी शॉप में। एक बड़ी तिजोरी
उसमें एक छोटी तिजोरी। उसमें रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा। क्योंकि जौहरी जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी। समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है। पूरे घर को रोशन करती झिलमिलाते हीरे की तरह। जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के पास कुछ नहीं बचता। बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में। पूरी सभा में चुप्पी छा गई। उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।

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मेरी कीमत तो बस मेरे अपनों ने न समझी.! . . फरिश्ता तो बस मैं गैरों की नजर में था.!!

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तलाश ऐ वफा से क्यूँ खुद को तकलीफ देते हो
. . . . . अब मान भी लो के दुनिया में कोई अपना नहीं होता|

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