हिंदी ग़ज़ल शायरी: कवितात्मक दुनिया
हिंदी ग़ज़ल शायरी का अनुभव करें
हिंदी ग़ज़ल शायरी में एक दूसरे के साथ और दूसरे की प्रशंसा, सराहना और धन्यवाद का आदर करने की यह कला है। इस शायरी के सुंदर शब्दों में हर सारथी की भावनाएं और जज्बात छुपी होती हैं।
पहले तो थी बेहोशी
फिर होश जरा सा आया थोड़ा समझा जीवन को
फिर सोचा मैं क्यों आया। यह प्रश्न बहुत दिन गुंजा ना नींद ही ढंग से आई किस मांगू मैं उत्तर यह बात समझ न आई मेरे बारे में उत्तर फिर कौन भला दे पाता मैं कौन कहां से आया यह कौन मुझे समझाता बहुतों से उत्तर पाकर ना कुछ संतुष्टि पाई खुद ही खुद को मैं जानू यह बात समझ में आई बनकर मैं एक बंजारा ढूंढा मैंने जग सारा मंदिर तीर्थ देवालय में खोज के उसको हारा
पर उसका पता ना पाया मैं सोच सोच घबराया क्या खाली हाथ ही जाऊं यह जन्म भी व्यर्थ गवाया। पूजा अर्चन सब मैंने बहु भांति किए थे जमकर पर उसको कब पाऊंगा यह प्रश्न खड़ा था तनकर पंडित और साधु संगत पोथी में खोजा उसको वह भी सब खोज रहे थे मैं खोज रहा था जिसको है जिसका प्याला खाली वह कैसे पिलवा देगा जो नहीं मिला प्रीतम से वह कैसे मिलवा देगा मैं गया था पाने उसको वह कथा सुनाते मुझको बोलो केवल बातों से भगवान मिला है किसको फिर निराकार वालों ने जपने को मंत्र दिए थे जितना बोला था उनने माला दिन रात जपे थे पानी पानी कहने से क्या प्यास बुझा करती है रोटी रोटी जपने से क्या भूख मिटा करती है दिल में थी घोर निराशा सोचा मैं कैसे खोजूं कुछ प्रश्न रहा ना बाकी आखिर मैं अब क्या बोलूं सोचा जो होगा होगा वह खुद ही खुद खोजेगा बस मौन प्रार्थना कर ले तू क्यों इतना सोचेगा न जाने कौन जन्म के पुण्य का लाभ मिला था मेरे जीवन के मरूथल में भी एक फूल खिला था था बहुत सुवासित क्षण वह मिलने को प्रियतम आए मेरा संताप मिटने जीवन में सद्गुरु आए पतझड़ बीती वह क्षण में आया बसंत जीवन में देखा जो मैंने उनको ना प्रश्न रहे कुछ मन में यूं लगा दहकती गर्मी में मिली हो कोई छाया प्यासे राही ने जैसे गंगा का सागर पाया मन के विचार थे मेरे सागर में उठती लहरें समझा जाना फिर इनको अंतस में जाकर गहरे लहरें तो बस लहरें हैं अंदर सागर ठहरा है लहरों से वही डरा है जो भीतर ना उतरा है लगता था जैसे मुझको ईश्वर का गांव भी होगा चलता खाता भी होगा उसका कोई ठांव भी होगा लेकिन अनंत ईश्वर का सतगुरु ने रूप दिखाया बातें थी सारी झूठी औरों ने जो समझाया अनहद का बाजा सुनकर मस्ती जीवन में आई मन हुआ है मंदिर जैसा कृपा इतनी बरसाई देखा जो नूर प्रभु का कट गए हैं जम के फांसे
बेफिक्री है ना चाहूं मैं आशा और दिलासे ----- कवि गोपाल पाठक राष्ट्रीय कवि
फिर होश जरा सा आया थोड़ा समझा जीवन को
फिर सोचा मैं क्यों आया। यह प्रश्न बहुत दिन गुंजा ना नींद ही ढंग से आई किस मांगू मैं उत्तर यह बात समझ न आई मेरे बारे में उत्तर फिर कौन भला दे पाता मैं कौन कहां से आया यह कौन मुझे समझाता बहुतों से उत्तर पाकर ना कुछ संतुष्टि पाई खुद ही खुद को मैं जानू यह बात समझ में आई बनकर मैं एक बंजारा ढूंढा मैंने जग सारा मंदिर तीर्थ देवालय में खोज के उसको हारा
पर उसका पता ना पाया मैं सोच सोच घबराया क्या खाली हाथ ही जाऊं यह जन्म भी व्यर्थ गवाया। पूजा अर्चन सब मैंने बहु भांति किए थे जमकर पर उसको कब पाऊंगा यह प्रश्न खड़ा था तनकर पंडित और साधु संगत पोथी में खोजा उसको वह भी सब खोज रहे थे मैं खोज रहा था जिसको है जिसका प्याला खाली वह कैसे पिलवा देगा जो नहीं मिला प्रीतम से वह कैसे मिलवा देगा मैं गया था पाने उसको वह कथा सुनाते मुझको बोलो केवल बातों से भगवान मिला है किसको फिर निराकार वालों ने जपने को मंत्र दिए थे जितना बोला था उनने माला दिन रात जपे थे पानी पानी कहने से क्या प्यास बुझा करती है रोटी रोटी जपने से क्या भूख मिटा करती है दिल में थी घोर निराशा सोचा मैं कैसे खोजूं कुछ प्रश्न रहा ना बाकी आखिर मैं अब क्या बोलूं सोचा जो होगा होगा वह खुद ही खुद खोजेगा बस मौन प्रार्थना कर ले तू क्यों इतना सोचेगा न जाने कौन जन्म के पुण्य का लाभ मिला था मेरे जीवन के मरूथल में भी एक फूल खिला था था बहुत सुवासित क्षण वह मिलने को प्रियतम आए मेरा संताप मिटने जीवन में सद्गुरु आए पतझड़ बीती वह क्षण में आया बसंत जीवन में देखा जो मैंने उनको ना प्रश्न रहे कुछ मन में यूं लगा दहकती गर्मी में मिली हो कोई छाया प्यासे राही ने जैसे गंगा का सागर पाया मन के विचार थे मेरे सागर में उठती लहरें समझा जाना फिर इनको अंतस में जाकर गहरे लहरें तो बस लहरें हैं अंदर सागर ठहरा है लहरों से वही डरा है जो भीतर ना उतरा है लगता था जैसे मुझको ईश्वर का गांव भी होगा चलता खाता भी होगा उसका कोई ठांव भी होगा लेकिन अनंत ईश्वर का सतगुरु ने रूप दिखाया बातें थी सारी झूठी औरों ने जो समझाया अनहद का बाजा सुनकर मस्ती जीवन में आई मन हुआ है मंदिर जैसा कृपा इतनी बरसाई देखा जो नूर प्रभु का कट गए हैं जम के फांसे
बेफिक्री है ना चाहूं मैं आशा और दिलासे ----- कवि गोपाल पाठक राष्ट्रीय कवि
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किसी के ख़त का बहुत इंतिज़ार करते हैं
हमारी छत पे कबूतर नहीं उतरते हैं
ख़ुशी के प्यार के गुल के बहार के लम्हे
हमें मिले भी तो पल भर नहीं ठहरते हैं
किसी तरफ़ से भी आओगे हम को पाओगे
हमारे घर से सभी रास्ते गुज़रते हैं
ये जानता है समुंदर में कूदने वाला
जो डूबते हैं वही लोग फिर उभरते हैं
कहीं फ़साद कहीं हादसे कहीं दहशत
घरों से लोग निकलते हुए भी डरते हैं
हमारी छत पे कबूतर नहीं उतरते हैं
ख़ुशी के प्यार के गुल के बहार के लम्हे
हमें मिले भी तो पल भर नहीं ठहरते हैं
किसी तरफ़ से भी आओगे हम को पाओगे
हमारे घर से सभी रास्ते गुज़रते हैं
ये जानता है समुंदर में कूदने वाला
जो डूबते हैं वही लोग फिर उभरते हैं
कहीं फ़साद कहीं हादसे कहीं दहशत
घरों से लोग निकलते हुए भी डरते हैं
- ansar-kambari
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज ये दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज ये दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
- dushyant-kumar
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ए'तिराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जब से
और ज़ियादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ए'तिराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जब से
और ज़ियादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
- dushyant-kumar