खुदराही-शायरी: अंतर्निहित ताकत का जश्न मनाएं

खुदराही-शायरी के माध्यम से आत्म-विश्वास को अभिव्यक्त करें

खुदराही-शायरी की दुनिया में विफलता और संकोच को धरती बोलने का हौसला दें जिसमें स्वातंत्रता का जीवन और विश्वसनीय आत्म-विश्वास की अहमियत स्पष्ट हो। एस्टेटिक और सहानुभूति के साथ अच्छे धारावाहिक तकनीकों की खोज कीजिए, जो शक्ति और उन्मोचन से भरे व्यापक कविता के माध्यम से अपने आप को स्रोतित करें।

आँखों से कू-ए-यार का मंज़र नहीं गया
हालाँकि दस बरस से मैं उस घर नहीं गया
उस ने मज़ाक़ में कहा मैं रूठ जाऊँगी
लेकिन मरे वजूद से ये डर नहीं गया


साँसें उधार ले के गुज़ारी है ज़िंदगी
हैरान वो भी थी कि मैं क्यों मर नहीं गया
शाम-ए-विदाअ लाख तसल्ली के बावजूद
आँखों से उस की दुख का समुंदर नहीं गया


उस घर की सीढ़ियों ने सदाएँ तो दीं मगर
मैं ख़्वाब में रहा कभी ऊपर नहीं गया
बच्चों के साथ आज उसे देखा तो दुख हुआ
उन में से कोई एक भी माँ पर नहीं गया


पैरों में नक़्श एक ही दहलीज़ थी 'हसन'
उस के सिवा मैं और किसी दर नहीं गया

- hasan-abbas-raza