LATIIFE SHAYARI: हास्यपूर्ण पंक्तियों को गले लगाएँ

LATIIFE SHAYARI की चर्म सुनें

हास्यपूर्णता और बुद्धिमत्ता से भरी हँसी की पंक्तियों के मिजाज में खोजें latiife shayari की दुनिया में। हास्यपूर्ण कविता की खूबसूरती को अन्दरूनी ख्यालों में समाहित करें जो आपके चेहरे पर मुस्कान और दिल में आनंद लाती है।

ज़मीर जाफ़री जिन दिनों स्टेलाइट टाउन में रहते थे। एक जैसे मकानों के नक़्शे की वजह से एक शाम भूल कर किसी और के दरवाज़े पर दस्तक दे बैठे। दरवाज़ा खुलने पर दूसरी औरत को देखकर जाफ़री साहब को अपनी ग़लती का एहसास हो गया। फ़ौरन वापस पलटे। इस फे़’ल का ज़िक्र जब जाफ़री साहब ने एक दोस्त से किया तो उसने सवाल किया

“जाफ़री साहब
आपको ग़लत घर का दरवाज़ा खटखटाने पर शर्मिंदगी नहीं हुई?”


“मुझे इस फे़’ल पर तो कोई शर्मिंदगी नहीं हुई
लेकिन ये देखकर ज़रूर तकलीफ़ हुई कि दरवाज़ा खोलने वाली औरत मेरी बीवी से भी बदसूरत थी।” जाफ़री साहब ने जवाब दिया।

- syed-zameer-jafri


शौकत थानवी बाग़-ओ-बहार तबीयत के मालिक थे। एक बार बीवी के साथ कराची जा रहे थे। जिस डिब्बे में उनकी सीट थी वो निचली थी। ऊपर की सीट पर एक मोटे ताज़े आदमी बिराजमान थे। शौकत साहब ने उठकर उन्हें ग़ौर से देखा फिर छत की तरफ़ देखकर कहा
“सुब्हान-अल्लाह क़ुदरत।”
वो आदमी बोला
“क्या मुझसे कुछ कहना है?”


शौकत ने कहा
“जी हाँ
आपकी नज़र में कोई लड़की है?”
“क्यों?”


“मैं उससे शादी करूँगा।” शौकत ने कहा।
“वाह
आपकी तो बीवी है।”
“सोचता हूँ जब आप नीचे उतरेंगे तो गिरेंगे ज़रूर और मेरी बीवी शहीद हो जाएगी। इसलिए मैं अभी से इंतिज़ाम कर रहा हूँ।”


शौकत के इस जवाब पर सारा डिब्बा हंस दिया। और सारे सफ़र में वो मोटे आदमी सीट से नीचे नहीं उतरे।

- shaukat-thanvi


अबुल असर हफ़ीज़ जालंधरी ने पीराना-साली में जब अंग्रेज़ ख़ातून से शादी के बारे में सोचा तो तज़बज़ुब के आलम में उन्होंने जब शौकत थानवी से मश्वरा किया तो शौकत ने कहा

“हफ़ीज़ साहब
इससे क़ब्ल कि वो बेवा-ए-हफ़ीज़ बन जाए


आप शादी कर लें।”

- shaukat-thanvi


एक दफ़ा शौकत थानवी सख़्त बीमार पड़े। यहाँ तक कि उनके सर के सारे बाल झड़ गए। दोस्त अहबाब उनकी इयादत को पहुंचे और बातचीत के दौरान उनके गंजे सर को भी देखते रहे। सबको हैरान देखकर शौकत थानवी बोले

“मलिक-उल-मौत आए थे। सूरत देखकर तरस आगया। बस सिर्फ़ सर पर एक चपत रसीदकर के चले गए।”

- shaukat-thanvi


शौकत थानवी यूरोप के लिए रवाना होने लगे तो उनके एक दोस्त ने पूछा

“रवानगी कब होगी?”
शौकत ने कहा



“क्या बताऊं
तुम्हारी भाबी ने परेशान कर रखा है। कहती है विलायत जाओगे तो तुम मेम ज़रूर लाओगे। हालाँकि मैंने क़सम खाकर कहा है कि अगर अपने लिए मेम लाया तो तुम्हारे लिए भी एक साहब ज़रूर लाऊँगा। लेकिन वो सुनती ही नहीं।”

- shaukat-thanvi


एक नाशिर ने किताबों के नए गाहक से शौकत थानवी का तआ’रुफ़ कराते हुए कहा
“आप जिस शख़्स का नॉवेल ख़रीद रहे हैं वो यही ज़ात शरीफ़ हैं लेकिन ये चेहरे से जितने बेवक़ूफ़ मालूम होते हैं उतने हैं नहीं।” शौकत थानवी ने फ़ौरन कहा

“जनाब मुझमें और मेरे नाशिर में यही बड़ा फ़र्क़ है। ये जितने बेवक़ूफ़ हैं चेहरे से मालूम नहीं होते।”


- shaukat-thanvi


नौ-उम्री के ज़माने में शौकत थानवी ने एक ग़ज़ल कही और बड़ी दौड़ धूप के बाद माहनामा “तिरछी नज़र” में छपवाने में कामयाब हो गए। ग़ज़ल का एक शे’र था

हमेशा ग़ैर की इज़्ज़त तिरी महफ़िल में होती है
तिरे कूचे में जाकर हम ज़लील-ओ-ख़्वार होते हैं


शौकत थानवी के वालिद की नज़र से अपने साहबज़ादे का यह कारनामा गुज़रा तो इस शे’र को पढ़ कर बहुत सीख़ पा हुए और शौकत की वालिदा को ये शे’र सुनाकर चीख़ते हुए बोले
“मैं पूछता हूँ ये आवारागर्द आख़िर उस कूचे में जाता ही क्यों है?”

- shaukat-thanvi


पंजाब यूनीवर्सिटी के रजिस्ट्रार एस.पी. सिंघा के ग्यारह बच्चों के नाम का आख़िरी जुज़ सिंघा था। जब उनके बारहवाँ लड़का पैदा हुआ तो शौकत थानवी से मश्वरा किया कि इसका क्या नाम रखूँ। इस पर शौकत साहब ने बेसाख़्ता कहा

“आप उसका नाम बारह सिंघा रख दीजिए।”

- shaukat-thanvi


मजरूह सुलतानपुरी ने साहिर लुधियानवी की किसी बात पर बरह्म होते हुए कहा
“याद रखो साहिर! जब तुम मर जाओगे तो उर्दू का कोई तरक़्क़ी-पसंद अदीब तुम्हारे जनाज़े के साथ नहीं जाएगा।”
साहिर ने फ़िल-फ़ौर जवाब दिया
“मुझे इसका कोई ग़म नहीं। लेकिन मैं फिर भी हर तरक़्क़ी-पसंद अदीब के जनाज़े में शरीक हूँगा।”


- sahir-ludhianvi


साहिर लुधियानवी के किसी दोस्त ने उससे कहा
“यार साहिर! अब तो तुम्हारी ज़िंदगी हर ए’तबार से आसूदा है। अब तो तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए।”
साहिर ने ग़ैर मा’मूली तौर पर संजीदा हो कर जवाब दिया
“चाहता तो मैं भी हूँ


लेकिन किसी ऐसी ख़ातून के साथ करना चाहता हूँ जो कुँवारी होने के साथ-साथ इंटेलेक्चुअल भी हो लेकिन ट्रेजडी ये है कि दोनों सिफ़ात एक ही वक़्त में किसी एक लड़की में नहीं मिलतीं
या तो वो कुँवारी होती है या इंटेलेक्चुअल।”

- sahir-ludhianvi


फ़िल्म स्टार अनिल कपूर के हाँ एक दावत में क़तील शिफ़ाई
अज़हर जावेद और जावेद अख़्तर शरीक थे। दौरान गुफ़्तगू जावेद अख़्तर क़तील से कहने लगे कि पंजाब के लोगों ने उर्दू ज़बान का बेड़ा ग़र्क़ कर दिया है। मसलन हम लोग कहते हैं कि “खाना खाइए”
इसी को पंजाब के लोग कहेंगे
“खाना खाएं।” इस पर क़तील साहब ने बरजस्ता जवाब दिया


“खाना खाएं”
कहने से खाने के ज़ाइक़े में कोई फ़र्क़ पड़ जाता है क्या? इस पर सब लोग खिलखिला कर हँसने लगे।

- qateel-shifai


क़तील शिफ़ाई ने एम.असलम से अपनी अव्वलीन मुलाक़ात का अहवाल बयान करते हुए कहा

“कितनी अजीब बात है कि मैं असलम साहब की कोठी में उनसे मिलने गया लेकिन इसके बावजूद उनका ताज़ा अफ़साना सुनने से बाल-बाल बच गया।”
“ये नामुमकिन है।”


अहबाब में से एक ने बात काटते हुए फ़ौरन तर्दीद कर दी।
“सुनिए तो”
क़तील ने मुस्कुराते हुए कहना शुरू किया
“हुआ यूं कि इंतिहाई ख़ातिर-ओ-मुदारात के बाद जब असलम साहब अपना अफ़साना सुनाने के मूड में आने लगे तो उन्होंने कहा... क़तील साहिब! आपकी कुछ नज़्में इधर मेरी नज़र से गुज़री हैं। आप तो ख़ासे मक़बूल शायर हैं


मगर न जाने आ’म लोग हर तरक़्क़ी पसंद शायर के बारे में क्यों बदगुमानी का शिकार हैं। और असलम साहब की इस बात के जवाब में निहायत इन्किसरी से काम लेते हुए मैंने कहा

“जी हाँ
वाक़ई आ’म लोग बहुत ग़लत फ़हमियाँ पैदा कर देते हैं। देखिए ना


अब आपके बारे में भी यूं तो यही मशहूर है कि आप हर नौवारिद मेहमान की तवाज़ो करने के बाद अपना कोई नया अफ़साना ज़रूर सुनाते हैं। हालाँकि ये बिल्कुल ग़लत है।”

- qateel-shifai


इब्राहीम जलीस कराची में क़ियाम पज़ीर थे। क़तील शिफ़ाई
अहमद नदीम क़ासमी के अलावा कुछ और दोस्त जब कराची तशरीफ़ ले जाते तो जलीस मिलते ही पूछते
“कब तक क़ियाम है?” और जब मुलाक़ाती कहता कि फ़ुलां तारीख़ तक है तो फ़ौरन जवाब देते कि उस दिन तो मैं आपकी दावत करना चाहता था। दो-चार दफ़ा जब ऐसा ही हुआ तो क़तील मुआ’मले को भाँप गए। इस दफ़ा जब क़तील शिफ़ाई और क़ासमी कराची पहुंचे तो हस्ब-ए-मा’मूल जलीस ने पूछा कि क़ियाम कब तक है? क़तील ने जवाब दिया
“इस बार हम फ़ैसला करके आए हैं कि आपकी दावत के बाद ही लाहौर वापस जाएंगे।”


- qateel-shifai


सूर्या से एक शायर असीर तशरीफ़ लाए। क़तील साहिब ने जो उन दिनों पाकिस्तान राईटर्ज़ गिल्ड के सेक्रेटरी थे
उनका इस्तिक़बाल करते हुए कहा
“पहली दफ़ा मैंने देखा है कि ‘असीर’ बे-ज़ंजीर भी होते हैं।” इस पर असीर ने बरजस्ता जवाब दिया



“मैंने भी पहला क़तील देखा है जो क़त्ल होने के बाद भी ज़िंदा है।”

- qateel-shifai


जगन्नाथ आज़ाद मुश्फ़िक़ ख़्वाजा से मिलने गए तो बातचीत में बार-बार अपनी किताबों की ग़र्क़ाबी का तज़्किरा बड़े दर्दनाक अंदाज़ में करते रहे और ये भी कहते रहे
‘‘उसमें न सिर्फ़ मत्बुआ’ किताबें ज़ाए’ हुईं बल्कि कुछ ग़ैर मत्बुआ’ तसानीफ़ के मुसव्वदे भी बर्बाद हो गए।”
ख़्वाजा साहब जब आठ-दस दफ़ा सैलाब की दिलख़राश दास्तान सुन चुके तो अर्ज़ किया



“अगर इजाज़त दें तो एक दर्द अंगेज़ वाक़िआ बिला तश्बीह मैं भी अ’र्ज़ करूँ।”
आज़ाद साहब ने कहा सुनाइए
तो ख़्वाजा साहब बोले



“चंद बरस क़ब्ल एक मशहूर अदीब के हाँ इत्तिफ़ाक़ से आग लग गई। उसमें उनके कुतुबख़ाने की बहुत सी नादिर किताबें और ग़ैर मत्बुआ तसानीफ़ के मुसव्वदे भी जल कर राख हो गए। ख़ाना सोख़्ता अदीब के कुछ दोस्त इज़हार-ए-हमदर्दी के लिए आए और आतिशज़दगी के वाक़िआ पर अफ़सोस का इज़हार किया। अलबत्ता एक दोस्त ने अपने जज़्बात का इज़हार इस अंदाज़ से किया
इसमें कोई शुबहा नहीं कि आपके कुतुबख़ाने का जल जाना एक दर्दनाक सानिहा है
जहाँ मत्बुआ किताबों का जल जाना अफ़सोसनाक है वहाँ ग़ैर मत्बुआ तसानीफ़ का ग़ैर मत्बुआ रह जाना इत्मिनान का बाइस है। यक़ीनन ये आपका नुक़्सान है लेकिन ये भी तो देखिए आपके क़ारईन बेशुमार मुतवक़्क़े नुक़्सानात से बच गए।”
इस पर जगन्नाथ आज़ाद हँसने पर मजबूर हो गए और बाक़ी जितने दिन वहाँ रहे उन्होंने किताबों की ग़र्क़ाबी का ज़िक्र नहीं किया।


- mushfiq-khwaja


ज़िया-उल-हक़ क़ासमी मुदीर ‘ज़राफ़त’ ने जनरल ज़िया-उल-हक़ की क़सीदागोई के सिलसिले में एक मजमूआ शाए किया। अख़्तर अंसारी अकबराबादी को दफ़नाने के बाद क़ब्रिस्तान से बाहर निकलते हुए क़ासमी साहब ने मुश्फ़िक़ ख़्वाजा को किताब पेश की। ख़्वाजा साहब ने किताब का वरक़ पल्टा और वापस करते हुए कहा
“ज़िया साहब! एक दिन में दो-दो जनाज़े उठाने की मुझमें हिम्मत नहीं।”

- mushfiq-khwaja


एक रोज़ मीरज़ा साहिब के शागिर्द मीर मेह्दी मजरूह उनके मकान पर आये। देखा कि मीरज़ा साहिब पलंग पर पड़े कराह रहे हैं। ये उनके पांव दाबने लगे। मीरज़ा साहिब ने कहा
“भई तू सय्यद ज़ादा है मुझे क्यों गुनहगार करता है?” मीर मेह्दी मजरूह न माने और कहा कि “आपको ऐसा ही ख़्याल है तो पैर दाबने की उजरत दे दीजिएगा।” मीरज़ा साहिब ने कहा
“हाँ इसमें मुज़ाइक़ा (हर्ज) नहीं।” जब वो पैर दाब चुके तो उन्होंने अज़-राह-ए-मज़ाह मीरज़ा साहिब से उजरत मांगी
मीरज़ा साहिब ने कहा


“भय्या कैसी उजरत? तुमने मेरे पांव दाबे
मैंने तुम्हारे पैसे दाबे
हिसाब बराबर हो गया।”

- mirza-ghalib


उमराव सिंह जौहर
गोपाल तफ्ता के अ’ज़ीज़ दोस्त थे। उनकी दूसरी बीवी के इंतिक़ाल का हाल तफ्ता ने मिर्ज़ा साहिब को भी लिखा
तो उन्होंने जवाबन लिखा



“उमराव सिंह के हाल पर उसके वास्ते मुझको रहम और अपने वास्ते रश्क आता है। अल्लाह अल्लाह! एक वो हैं कि दोबार उनकी बेड़ियाँ कट चुकी हैं और एक हम हैं कि पच्चास बरस से ऊपर फाँसी का फंदा गले में पड़ा है
न फंदा ही टूटता है न दम ही निकलता है।”

- mirza-ghalib


हंगामा-ए-ग़दर के बाद जब मिर्ज़ा ग़ालिब की पेंशन बंद थी। एक दिन मोती लाल
मीर-ए-मुंशी लेफ्टिनेंट गवर्नर बहादुर पंजाब
मीरज़ा साहिब के मकान पर आये। दौरान गुफ़्तगु में पेंशन का भी ज़िक्र आया। मीरज़ा साहिब ने कहा



“तमाम उम्र अगर एक दिन शराब न पी हो तो काफ़िर और अगर एक दफ़ा नमाज़ पढ़ी हो तो गुनहगार
फिर मैं नहीं जानता कि सरकार ने किस तरह मुझे बाग़ी मुसलमानों में शुमार किया।”

- mirza-ghalib


मीरज़ा साहिब के ख़ुस्र मिर्ज़ा इलाही बख़्श ख़ान पीरी मुरीदी भी करते थे और अपने सिलसिले के शज्रे की एक-एक कापी अपने मुरीदों को दिया करते थे। एक दफ़ा उन्होंने मीरज़ा साहिब से शज्रा नक़ल करने के लिए कहा। मीरज़ा साहिब ने नक़ल तो कर दी मगर इस तरह कि एक नाम लिख दिया दूसरा छोड़ दिया तीसरा फिर लिख दिया
चौथा हज़फ़ कर दिया। उनके ख़ुस्र साहिब ये नक़ल देखकर बहुत नाराज़ हुए कि ये क्या ग़ज़ब किया। मीरज़ा साहिब बोले

“हज़रत! आप इसका कुछ ख़्याल न फ़रमाईए। शज्रा दरअसल ख़ुदा तक पहुंचने का एक ज़ीना है। सो ज़ीने की एक-एक सीढ़ी बीच से निकाल दी जाये तो चंदाँ हर्ज वाक़ा’ नहीं होता। आदमी ज़रा उचक-उचक के ऊपर चढ़ सकता है।”


- mirza-ghalib


एक दफ़ा मीरज़ा साहिब की हमशीरा साहिबा बीमार हुईं। मीरज़ा साहिब उनकी इ’यादत को गये और उनसे पूछा
“क्या हाल है?” उन्होंने कहा
“मरती हूँ। क़र्ज़ की फ़िक्र है
गर्दन पर लिये जाती हूँ।” मिर्ज़ा साहिब फ़रमाने लगे


“इसमें भला फ़िक्र की क्या बात है! ख़ुदा के हाँ कौन से मुफ़्ती सदर उद्दीन ख़ाँ बैठे हैं जो डिग्री करके पकड़वा बुलाएँगे?”

- mirza-ghalib


एक-बार दिल्ली में रात गये किसी मुशायरे या दा’वत से मिर्ज़ा साहिब मौलाना फ़ैज़ उल-हसन फ़ैज़ सहारनपुरी के हमराह वापस आरहे थे। रास्ते में एक तंग-ओ-तारीक गली से गुज़र रहे थे कि आगे वहीं एक गधा खड़ा था। मौलाना ने ये देखकर कहा
“मीरज़ा साहिब
दिल्ली में गधे बहुत हैं।”
“नहीं हज़रत


बाहर से आजाते हैं।”
मौलाना फ़ैज़ उल-हसन झेंप कर चुप हो रहे।

- mirza-ghalib


एक दफ़ा मीरज़ा साहब ने एक दोस्त को दिसंबर 1858 की आख़िरी तारीख़ों में ख़त इरसाल किया। दोस्त ने जनवरी 1859 की पहली या दूसरी तारीख़ को जवाब लिखा
मीरज़ा साहिब उनको लिखते हैं

“देखो साहिब! ये बातें हमको पसंद नहीं। 1858 के ख़त का जवाब 1859 में भेजते हो और मज़ा ये कि जब तुमसे कहा जाएगा तो कहोगे कि मैंने दूसरे ही दिन जवाब लिखा था।”


- mirza-ghalib


मारहरे की ख़ानक़ाह के बुज़ुर्ग सय्यद साहिब आ’लम ने ग़ालिब को एक ख़त लिखा। उनकी लिखावट बहुत टूटी फूटी थी। उसे पढ़ना जू-ए-शीर लाने के मुतरादिफ़ (पर्याय) था। ग़ालिब ने उन्हें जवाब दिया

“पीर-ओ-मुर्शिद
ख़त मिला चूमा-चाटा


आँखों से लगाया
आँखें फूटें जो एक हर्फ़ भी पढ़ा हो। ता’वीज़ बनाकर तकिये में रख लिया।”
नजात का तालिब
ग़ालिब


- mirza-ghalib


ग़दर के हंगामे के बाद जब पकड़-धकड़ शुरू हुई तो मीरज़ा ग़ालिब को भी बुलाया गया। ये कर्नल ब्राउन के रूबरू पेश हुए तो वही कुलाह पयाख़ जो ये पहना करते थे
हस्ब-ए-मा’मूल उनके सर पर थी। जिसकी वजह से कुछ अ’जीब-ओ-ग़रीब वज़ा क़ता (हुलिया) मालूम होती थी। उन्हें देखकर कर्नल ब्राउन ने कहा
“वेल मिर्ज़ा साहिब तुम मुसलमान है?”
“आधा मुसलमान हूँ।”


कर्नल ब्राउन ने ता’ज्जुब से कहा
“आधा मुसलमान क्या? इसका मतलब?”
“शराब पीता हूँ
सुअर नहीं खाता।” मीरज़ा साहिब फ़ौरन बोले।


ये सुनकर कर्नल ब्राउन बहुत महज़ूज़ हुआ और मीरज़ा साहिब को ए’ज़ाज़ (सम्मान) के साथ रुख़्सत कर दिया।

- mirza-ghalib