मज़ाहिया शायरी

कविता के माधुर शब्दों से हंसी फैलाना

मज़ेदार मज़ाहिया शायरी की मजेदार दुनिया में प्रवेश करें, जहां हर पंक्ति में हंसी और उत्साह है। यह शायरी संग्रह मनोरंजन करने और मज़ा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो आपको दिनचर्या से छुटकारा देता है। मज़ाहिया शायरी की कपटी और बुद्धिमान पंक्तियों से अपने दिन को उजाला दें और अपने चेहरे पर एक मुस्कान लाएँ।

शश-जिहत नुह फ़लक आएँगे नज़र दो-बटा-तीन
छे-बटा-नौ के बराबर है अगर दो-बटा-तीन
दो खिलौने जो कभी हम ने तिपाई पे धरे
आ गए साफ़ मुहंदिस को नज़र दो-बटा-तीन


तालिब-ए-ख़ैर न होंगे कभी इंसान से हम
नाम उस का है बशर उस में है शर दो-बटा-तीन
मुनहसिर क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है दौलत-मंदी
देख लो ज़ोर में मौजूद है ज़र दो-बटा-तीन


मलक-उल-मौत से दुनिया में हिरासाँ नहीं कौन
जिस को कहते हैं निडर उस में है डर दो-बटा-तीन
बीसवीं रात महीने की जब आ जाती है
ग़म में रह जाता है घुल घुल के क़मर दो-बटा-तीन


ज़ालिमो ख़ौफ़ करो आह को समझो न हक़ीर
लफ़्ज़-ए-अल्लाह में है इस का असर दो-बटा-तीन
खोटी मंज़िल किए देती है तिरी याद नदीम
राह-रौ का अभी बाक़ी है सफ़र दो-बटा-तीन


दो-बटा-तीन की रक्खी है जो ऐ 'जोश' रदीफ़
शे'र भी निकले हैं मक़्बूल-ए-नज़र दो-बटा-तीन

- josh-malsiani


ये महफ़िल-ए-सुख़न थी मई के महीने में
शायर सभी नहाए हुए थे पसीने में
ज़िंदा रहेंगे हश्र तक उन शाइरों के नाम
जो इस मुशाइरा में सुनाए गए कलाम


सद्र-ए-मुशाइरा कि जनाब-ए-'ख़ुमार' थे
बेकस थे बे-वतन थे ग़रीब-उद-दयार थे
'माहिर' थे बे-क़रार तो 'अहक़र' थे बद-हवास
'कौसर' पुकारते थे कि पानी का इक गिलास


'शौक़' ओ 'नुशूर' ओ 'साहिर' ओ 'शायर' 'फ़िगार' ओ 'राज़'
इक मक़बरे में दफ़्न थे जुमला शहीद-ए-नाज़
ऐसा भी एक वक़्त नज़र से गुज़र गया
जब 'साबरी' के सब्र का पैमाना भर गया


ये मेहमाँ थे और कोई मेज़बाँ न था
इन ''आल-इंडियों'' का कोई क़द्र-दाँ न था
गर्मी से दिल-गिरफ़्ता न था सिर्फ़ इक 'अमीर'
कितने ही शाइरों का वहाँ उठ गया ख़मीर


रो रो के कह रहा था इक उस्ताद-ए-धामपुर
''मारा दयार-ए-ग़ैर में मुझ को वतन से दूर''
अल-क़िस्सा शाइरों की वो मिट्टी हुई पलीद
शायर समझ रहे थे कि हम अब हुए शहीद


वो शाइरों का जम्म-ए-ग़फ़ीर एक हॉल में
दम तोड़ते हों जैसे मरीज़ अस्पताल में
वो तिश्नगी वो हब्स वो गर्मी कि अल-अमाँ
मुँह से निकल पड़ी थी इक उस्ताद की ज़बाँ


शायर थे बंद एक सिनेमा के हाल में
पंछी फँसे हुए थे शिकारी के जाल में
वो प्यास थी कि जाम-ए-क़ज़ा माँगते थे लोग
''वो हब्स था कि लू की दुआ माँगते थे लोग''


मौसम कुछ ऐसा गर्म कुछ इतना ख़राब था
शायर जो बज़्म-ए-शेर में आया कबाब था
बज़्म-ए-सुख़न की रात क़यामत की रात थी
हम शायरों के हक़ में शहादत की रात थी


कुछ अहल-ए-ज़ौक़ लाए थे साथ अपने तौलिया
नंगे बदन ही बैठे थे कुछ पीर ओ औलिया
पाजामा ओ क़मीस न आया बदन को रास
बैठे थे लोग पहने हुए क़ुदरती लिबास


कैसे कहूँ वो अहल-ए-अदब बेवक़ूफ़ थे
इतना ज़रूर है कि वो मौसम-प्रूफ़ थे
गर्मी से मुज़्तरिब थे ये शायर ये सामईन
कहते थे हम पे रहम कर ऐ रब्ब-ए-आलमीन


ये आख़िरी गुनाह तो हो जाए दर-गुज़र
अब हम मुशाइरा में न जाएँगे भूल कर
ये होश किस को था कि वहाँ किस ने क्या किया
सब को ये फ़िक्र थी कि मिले जल्द ख़ूँ-बहा


हालाँकि जान बचने की सूरत न थी कोई
हुक्म-ए-ख़ुदा कि अपनी क़ज़ा मुल्तवी हुई

- dilawar-figar


रहीमुल्लाह हुआ अच्छा तो उस ने
ये देखा हो चुकी है ''पार्टीशन''
गए कुछ भाग और कुछ मर चुके हैं
न नेता-सिंह बाक़ी है न भीषन


सुने इस दास्ताँ के जब फ़साने
तो ग़ुस्से ने बनाया उस को मजनूँ
तड़प उट्ठा कि ले कैसे वो बदला
पिए इन काफ़िरों का किस तरह ख़ूँ


न क्यूँ कहला सका वो मर्द-ए-ग़ाज़ी
न जब ये मिल सका वो ख़ूब रोया
यका-यक उस के सब पलटे ख़यालात
तो उस ने दामन-ए-इस्लाम छोड़ा


किनारा-कश हुआ सब भाइयों से
नए मज़हब से रिश्ता अपना जोड़ा
कई दिन बाद जब निकला वो घर से
तो उस के मुँह पे दाढ़ी सर पे थे बाल


निहाला-सिंह अब था नाम उस का
लिए किरपान वो ग़ुस्से से था लाल
हज़ारों ख़ूँ-फ़िशाँ अरमान ले के
खड़ा था आज वो मस्जिद के आगे


पकड़ने के लिए उस को नमाज़ी
नमाज़ें छोड़ कर मस्जिद से भागे
लगा कर एक नारा वहश-आलूद
वही किरपान झट उस ने निकाली


लगा कर क़हक़हा फिर इक फ़लक-रस
मअन सीने में अपने घोंप डाली
तमन्ना थी कि इक सिख मैं भी मारूँ
ये पूरी तू ने की अल्लाह-तआला


बहुत ख़ुश हूँ रहीमुल्लाह-ख़ाँ ने
निहाला-सिंह-जी को मार डाला

- raja-mehdi-ali-khan


मुशाइरा में सुनूँ कैसे सुब्ह तक ग़ज़लें
कि घर को छोड़ के फ़ुर्सत से मैं नहीं आया

- dilawar-figar


'लँहगा-संघा' कलमा पढ़
ला-इलाहा आगे पढ़
आगे आप बता दीजे
मेरी जान बचा लीजे


आगे मुझे अगर आता
तुम से मैं क्यूँ पढ़वाता
सोच न अब बे-कार 'रहीम'
मार इस को तलवार रहीम


दूर हों उस के सब दुखड़े
कर दे इस के दो टुकड़े

- raja-mehdi-ali-khan


महशर में गए शैख़ तो आ'माल नदारद
जिस माल के ताजिर थे वही माल नदारद

- machis-lakhnavi


अदब को जिंस-ए-बाज़ारी न करना
ग़ज़ल के साथ बदकारी न करना

- dilawar-figar


स्टेज पर पड़ा था जो पर्दा वो उठ चुका
जो अक़्ल पर पड़ा है वो पर्दा उठाइए

- dilawar-figar


ज़िंदगी से भी कब हुए मग़्लूब
अपने उस्लूब पर ही जीते थे
हर हवाले से मुनफ़रिद 'ग़ालिब'
दाढ़ी रखते शराब पीते थे


- syed-zameer-jafri


उस के रुख़्सार पे है और तिरे होंट पे तिल
तिलमिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी

- inayat-ali-khan


लॉन में तीन गधे और ये नोटिस देखा
घास खाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी

- inayat-ali-khan


सुब्ह तक़रीर यहाँ शाम को तक़रीर वहाँ
चीख़ते चीख़ते लीडर का गला बैठ गया
हर गली-कूचे में दिन रात लगाता है सदा
जो दे उस का भी भला जो न दे उस का भी भला


- inayat-ali-khan


जैसे इस्लाम में है रस्म मुसलमानी की
वैसे ही इश्क़ में है चाक-गरेबानी की
गत यही ख़ून की होती है जो है पानी की
रुत बदल जाती है जब फ़ितरत-ए-इंसानी की


हश्र में हो गई सेह्हत मरज़-ए-इस्याँ से
एक ख़ूराक दवा पी के पशेमानी की
सूख कर हो चुका है ज़र्द मरीज़-ए-ग़म-ए-हिज्र
फ़स्ल अब कटने ही वाली है परेशानी की


दोनों दरख़्वास्तें उस शोख़ ने ख़ारिज कर दीं
पहले तो वस्ल की और फिर नज़र-ए-सानी की
ज़िंदगी काट दी जल जल के जहाँ में 'माचिस'
वाक़ई तू ने बड़ी इश्क़ में क़ुर्बानी की


- machis-lakhnavi


नज़्म-ए-जहाँ को ज़ेर-ओ-ज़बर देखता हूँ मैं
मादा के इख़्तियार में नर देखता हूँ मैं
आँखों पे बन रही है अगर देखता हूँ में
ये जानता हूँ उन को मगर देखता हूँ मैं


मैं देखता नहीं हूँ अगर देखते हैं वो
वो देखते नहीं हैं अगर देखता हूँ मैं
वाइज़ ने मुझ में देखी है ईमान की कमी
वाइज़ में सिर्फ़ दुम की कसर देखता हूँ मैं


अब ये हुई है जल्वा-नुमाई की इंतिहा
वो सामने डटे हैं जिधर देखता हूँ मैं
अल्लाह-रे रोब-ओ-दाब-ए-जुनूँ भागता है वो
जिस की तरफ़ उठा के नज़र देखता हूँ मैं


कहती है हर गिरह कि रिहाई मुहाल है
जब चोंच से टटोल के पर देखता हूँ में
जिस वक़्त मिल के पढ़ते हैं दोनों किताब-ए-इश्क़
वो ज़ेर देखते हैं ज़बर देखता हूँ मैं


- machis-lakhnavi


अभी तो तुझे एक फेंटी लगी है
अभी तो तिरे इम्तिहाँ और भी हैं

- abeer-abuzari


मुझ से फिर मेरी कार तू माँगे
एक या दो हज़ार तू माँगे
इस से पहले उधार तू माँगे
मैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगा


गीत फिल्मों के गुनगुनाने में
रोड पर लड़कियाँ पटाने में
इस से पहले पिटूँ मैं थाने में
मैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगा


बन न जाए ख़बर बड़ी कोई
इस से पहले कि फुलझड़ी कोई
फूँक दे दिल की झोंपड़ी कोई
मैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगा


मेरी ख़ातिर ख़रीद ले डंडे
इस से पहले किराए के गुंडे
तोड़ दें दाँत मेरे मुस्टंडे
मैं तिरा शहर छोड़ जाऊँगा


- ahmad-alvi


आँखें निकल आई हैं मिरी साँस रुकी है
जल्द आ कि तिरी याद गला घूँट रही है
दावत की तिरी बज़्म में क्यूँ धूम मची है
क्या बात है क्या कोई नई जेब कटी है


वाइ'ज़ को जो देखो तो घटा-टोप अँधेरा
साक़ी को जो देखो तो किरन फूट रही है
क्या है जो नहीं ये असर-ए-रब्त-ए-मोहब्बत
रोए तो हैं वो और मिरी आवाज़ पड़ी है


साए की तमन्ना में जहाँ बैठ गया हूँ
चंदिया पे वहीं ताक के दीवार गिरी है
छूटे नहीं छुटती है तिरे वस्ल की हसरत
ये जोंक मिरे दिल का लहू चूस रही है


वो उन का ज़माना था जहाँ अक़्ल बड़ी थी
ये मेरा ज़माना है यहाँ भैंस बड़ी है
फिर क्या है जो 'माचिस' नहीं ये सोज़-ए-मोहब्बत
इक बर्क़ सी रग रग में मिरे कौंद रही है


- machis-lakhnavi


टूटा था घर में क्या क्या ये अर्ज़ फिर करूँगा
फिर घर में क्या हुआ था ये अर्ज़ फिर करूँगा
इतना बड़ा लिफ़ाफ़ा और काम था ज़रा सा
क्या काम था ज़रा सा ये अर्ज़ फिर करूँगा


मुल्ला न क्या किया था मुल्ला न क्या क्या है
मुल्ला करेगा क्या क्या ये अर्ज़ फिर करूँगा
देखा जो शैख़-जी ने बोले कि मुख़्तसर है
वो क्या है मुख़्तसर सा ये अर्ज़ फिर करूँगा


शानों पे जो पड़ा था कहने को था दुपट्टा
क्या कुछ ढका छुपा था ये अर्ज़ फिर करूँगा
लड़की क्लासिकी की थी लड़का क्लासिकल था
कैसा था वो दो-शाख़ा ये अर्ज़ फिर करूँगा


अर्क़ुन्निसा का नुस्ख़ा मेहरुन्निसा ने लिक्खा
नुस्ख़े में क्या लिखा था ये अर्ज़ फिर करूँगा
बे-वज़्न सब थे शाइ'र रुक़ए मगर थे वज़नी
रोक़ओं का वज़्न क्या था ये अर्ज़ फिर करूँगा


लड़की ने भी क़ुबूला लड़के ने भी क़ुबूला
दोनों ने क्या क़ुबूला ये अर्ज़ फिर करूँगा
कुछ अर्ज़ कर दिया है कुछ अर्ज़ फिर करूँगा
क्या अर्ज़ फिर करूँगा ये अर्ज़ फिर करूँगा


- ameerul-islam-hashmi


कहीं गोली लिखा है और कहीं मार
ये गोलीमार लिक्खा जा रहा है

- dilawar-figar


बहुत मज़लूम है इस शहर में शाइ'र की घर वाली
मोहब्बत की ग़िज़ा से अब तक उस का पेट है ख़ाली
ये गोरी रात की तन्हाइयों में हो गई काली
कराची में जो रहती है ये ऐसी है मियाँ-वाली


'नदीम' ओ 'फ़ैज़' के नक़्श-ए-क़दम पर ताज है इस का
अदब की ख़ाक पर बैठा हुआ सरताज है इस का
ये उस शाइ'र की बीवी है जो शाइ'र ख़ानदानी है
ग़ज़ल जिस की ज़मीन-ए-तंग में भी आसमानी है


इस इंटरनैशनल शाइ'र में दरिया की रवानी है
दुबई जद्दा
अबु-ज़हबी तक इस ने ख़ाक छानी है
ग़ज़ल पढ़ने से बिल्कुल ऐक्टर मा'लूम होता है


बढ़ी हैं इस क़दर ज़ुल्फ़ें 'जिगर' मा'लूम होता है
गुज़रती है हमेशा घर से बाहर ज़िंदगी इस की
बहुत महदूद हो कर रह गई है फैमली उस की
सदा कटती है बज़्म-ए-शाइ'र में रात भी उस की


सहर के छे बजे होती है अक्सर वापसी उस की
मगर शाइ'र की बीवी फिर भी उस की नाम-लेवा है
जो दिन में तो सुहागन है मगर रातों को बेवा है
गुज़रती है बड़ी मुश्किल से बेचारी की रात आख़िर


कलाम-ए-'जोश' पढ़ के ग़म से पाती है नजात आख़िर
रहेगी घर में तन्हा कब तलक औरत की ज़ात आख़िर
न हो शौहर तो पढ़ लेती है ''यादों-की-बरात'' आख़िर
कलाम-ए-'जोश' तन्हाई में ये रोज़ाना पढ़ती है


कि जो रिज़वान पढ़ता है वही रिज़वाना पढ़ती है
अभी गुड्डू हुआ है और अभी उम्मीद-ए-सीमा है
जो क़ब्ल-अज़-वक़्त आ पहुँचे ये इक ऐसा ज़मीमा है
बना दे घर को तारीख़ी यही शाइ'र का ईमा है


अगर शाइ'र का घर देखो तो आसार-ए-क़दीमा है
नुमाइश इस तरह शाइ'र ने बच्चों की लगाई है
कि जैसे उस के मजमूए की रस्म-ए-रू-नुमाई है
कहा शाइ'र ने बीवी से कि तुम मेरी क़याफ़ा हो


मिरे बच्चे मिरा मज़मूँ हैं तुम ख़ाली लिफ़ाफ़ा हो
हुदूद-ए-ज़िंदगी में ग़ैर-मा'मूली इज़ाफ़ा हो
मिरे दिल की हुकूमत का तुम्हीं दार-उल-ख़िलाफ़ा हो
न जिस से प्यास बुझ पाए वो ''के-एम-सी'' का नल तुम हो


हक़ीक़त ये है मेरी ग़ैर-मतबूआ ग़ज़ल तुम हो

- khalid-irfan


हमारे साथ की सब लड़कियाँ अब नानियाँ होंगी
कभी बिस्कुट थीं लेकिन अब वो बाक़र-ख़ानियाँ होंगी
हमारे रहनुमाओं ने कुछ ऐसे बीज बोए हैं
जहाँ तरबूज़ उगते थे वहाँ ख़ूबानियाँ होंगी


तुम्हीं सोचो कि फिर बारातियों का हाल क्या होगा
अगर शादी में जैक्सन-हाइट्स की बिरयानियाँ होंगी
इलेक्शन फिर वो ज़िल-हिज्ज के महीने में कराएँगे
तो क्या दो दाँत के वोटर की फिर क़ुर्बानियाँ होंगी


अजब अंदाज़ से जन्नत में वो हूरों पे झपटेंगे
मगर मुल्लाओं को पकड़े हुए मुल्लानियाँ होंगी
मिरे दामन में ख़ुश-दामन ने इक हीरा जो डाला है
ये दौलत है तो फिर क्या बे-सर-ओ-सामानी होंगी


जो एस-एम-एस पे हर लड़के को दर्स-ए-इश्क़ देती हैं
वो सारी लड़कियाँ कॉलेज में कल उस्तानियाँ होंगी
यहाँ तुम सज्दा-ए-ता'ज़ीम-ए-इंसाँ को बजा लाओ
वहाँ ज़ंजीर में जकड़ी हुई पेशानियाँ होंगी


- khalid-irfan


ये खटमल ये मक्खी ये मच्छर की दुनिया
ये लंगूर भालू ये बंदर की दुनिया
ये कुत्तों गधों और ख़च्चर की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


ये औरत ये मर्दों ये छक्कों की दुनिया
निहत्तों की हथियार-बंदों की दुनिया
ये डाकू पुलिस और ग़ुंडों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


ये चोरों ये लुच्चों लफ़ंगों की दुनिया
ये कमज़ोरों की और दबंगों की दुनिया
तप-ए-दिक़ के बीमार चंगों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


ये बुश-जूनीयर और ओबामों की दुनिया
ये अमरीकियों के ग़ुलामों की दुनिया
ये मुल्ला-उमर और उसामों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


जनाबों की इज़्ज़त-मआबों की दुनिया
ये अच्छों की दुनिया ख़राबों की दुनिया
ये चमचों को मिलते खिताबों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


ये बंदूक़ कटों तमंचों की दुनिया
ये फूटबाल की और कंचों की दुनिया
ख़ुशामद में मशग़ूल चमचों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


हवाई जहाज़ों की रेलों की दुनिया
हवालात की और जेलों की दुनिया
ये ट्रकों की दुनिया ये ठेलों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


रईसों की दुनिया में कड़कों की दुनिया
ये बे-कार आवारा लड़कों की दुनिया
ट्रैफ़िक से बद-हाल सड़कों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


- ahmad-alvi


वस्ल की रात जो महबूब कहे गुड नाईट
क़ाएदा ये है कि इंग्लिश में दुआ दी जाए

- dilawar-figar


महव-ए-हैरत हूँ कि वो सेटर था कितना बा-कमाल
इश्क़ के बारे में पूछा जिस ने पर्चे में सवाल
ऐसे ही सेटर अगर दो चार पैदा हो गए
देखना इस मुल्क में फ़नकार पैदा हो गए


आम होगी आशिक़ी कॉलेज के अर्ज़-ओ-तूल में
लैला ओ मजनूँ नज़र आएँगे अब स्कूल में
इश्क़ के आदाब लड़कों को सिखाए जाएँगे
ग़ैर-आशिक़ जो हैं वो आशिक़ बनाए जाएँगे


आशिक़ों को इल्म में परफ़ेक्ट समझा जाएगा
इश्क़ इक कंपल्सरी सब्जेक्ट समझा जाएगा
इम्तिहाँ होगा तो पूछे जाएँगे ऐसे सवाल
अपनी महबूबा के बारे में कुछ इज़हार-ए-ख़याल


इश्क़ इक साइंस है या आर्ट समझा कर लिखो
या ये दोनों इश्क़ का हैं पार्ट समझा कर लिखो
आज अपने मुल्क में आशिक़ हैं कितने फ़ीसदी
मुंतही इन में हैं कितने और कितने मुब्तदी


क्या तअ'ल्लुक़ तिब्ब-ए-यूनानी को है रूमान से
कम्पयर फ़रहाद ओ मजनूँ को करो लुक़्मान से
इश्क़ कितने क़िस्म का होता है लिखो बा-वसूक़
फ़ी ज़माना क्या हैं आशिक़ के फ़राएज़ और हुक़ूक़


एक तहक़ीक़ी मक़ाला लिख के समझाओ ये बात
शाख़-ए-आहू पर ही क्यूँ रहती है आशिक़ की बरात
कुछ मिसालें दे के समझाओ ये क़ौल-ए-मुस्तनद
इश्क़ अव्वल दर-दिल-ए-माशूक़ पैदा मी शुअद


सर को क्या निस्बत है संग-ए-आस्तान-ए-यार से
तुम ने सर फोड़ा कभी मा'शूक़ की दीवार से
क्या सकूँ मिलता है दिल को आह-ए-शो'ला-बार से
गर्म नाले अर्श पर जाते हैं किस रफ़्तार से


अपने अंदाज़े से तूल-ए-शाम-ए-तन्हाई बताओ
सिर्फ़ तख़मीनन शब-ए-हिज्राँ की लम्बाई बताओ
इंडिया का एक नक़्शा अपनी कॉपी पर बनाओ
और फिर उस में हुदूद-ए-कूचा-ए-जानाँ दिखाओ


वस्ल की दरख़्वास्त पर किस की सिफ़ारिश चाहिए
इश्क़ के पौदे को कितने इंच बारिश चाहिए
अपनी महबूबा को इक दरख़्वास्त इंग्लिश में लिखो
उस से ये पूछो जवाब-ए-आरज़ू यस है कि नो


कौन से आले से देखें हुस्न-ए-जानाना लिखो
हुस्न की मिक़दार जो नापे वो पैमाना लिखो
मदर-ए-लैला ने तो लैला न ब्याही क़ैस को
तुम अगर लैला की माँ होते तो क्या करते लिखो


एक आशिक़ तीन दिन में चलता है उन्नीस मील
तीन आशिक़ कितने दिन में जाएँगे अड़तीस मील
आप कर सकते हैं इन में से कोई बारह सवाल
बद-ख़ती के पाँच नंबर हैं रहे ये भी ख़याल


- dilawar-figar


पोस्ट-मैन उस बुत का ख़त लाता नहीं
और जो लाता है पढ़ा जाता नहीं
आशिक़ी से क्यूँ हम इस्तीफ़ा न दें
होटलों का बिल दिया जाता नहीं


शैख़-जी मोटर पे हज को जाइए
अहद-ए-नौ में ऊँट काम आता नहीं
बोसा लें उस सर्व-क़द का किस तरह
तार पर हम से चढ़ा जाता नहीं


आशिक़ों पर ज़ुल्म करना छोड़ दें
क्यूँ-बे क़ासिद जा के समझाता नहीं
रात दिन फ़रमाइशें ज़ेवर की हैं
हम से अब आशिक़ रहा जाता नहीं


जल गई सिगरेट से दाढ़ी शैख़ की
ये मगर फैशन से बाज़ आता नहीं
फ़रबही का तंज़ क्यूँ मुश्ताक़ पर
तेरी चक्की से तो पिसवाता नहीं


फ़ीस पहले जब तलक रखवा न ले
डॉक्टर अपने भी घर जाता नहीं
बैकरी में नौकरी करनी पड़ी
वो सिवाए केक कुछ खाता नहीं


तेरी फ़ुर्क़त में बहुत फ़ाक़े कटे
आ कि अब भूका रहा जाता नहीं
कब से है मेहमान तू ऐ हिज्र-ए-यार
भाई मेरे घर से क्यूँ जाता नहीं


ओ सितम-गर रोकना मोटर ज़रा
मेरे ख़च्चर से चला जाता नहीं
लॉन्ड्री खोली थी उस के इश्क़ में
पर वो कपड़े हम से धुलवाता नहीं


हज़रत-ए-इब्न-ए-बतूता की ग़ज़ल
ज़िद के मारे वो सनम गाता नहीं

- akhtar-shirani