मुकालिमी-ग़ज़ल शायरी

संवाद में शैली का प्रकटीकरण

मुकालिमी-ग़ज़ल शायरी की रमणीय दुनिया में डूबें, जहां घज़ल की शान से बातचीत की तेजस्वी सौंदर्य साझा होता है। इस संग्रह में प्रत्येक पंक्ति एक वार्तात्मक रूप में भावनाओं और विचारों का जाल बुनती है, आपको कवि भाषण की सुंदरता का अनुभव कराने के लिए आमंत्रित करती है।

कहा ये मैं ने कि अपनी आँखों में ख़्वाब रखना
कहा ये उस ने कि आँख रखना 'अज़ाब रखना
ये मैं ने पूछा था लोग क्यूँ मर रहे हैं इतने
जवाब आया तुम उन के ख़ूँ का हिसाब रखना


कहा ये मैं ने ज़मीन पर अम्न हो सकेगा
कहा कि हाथों में अलम रखना किताब रखना
कहा ये मैं ने कि ज़िंदगी किस तरह कटेगी
कहा ये उस ने कि चाहतीं बे-हिसाब रखना


कहा ये मैं ने हवाएँ हैं तुंद-ओ-तेज़ कितनी
वो हँस के बोली कि कश्तियाँ ज़ेर-ए-आब रखना
कहा ये उस ने कि दाएरे से निकल के देखें
कहा कि पहले कोई सफ़र इंतिख़ाब रखना


कहा ये उस ने कि भीड़ में हम बिछड़ न जाएँ
कहा कि जूड़े में एक ताज़ा गुलाब रखना
कहा ये उस ने कि हम अगर सच का साथ दें तो
कहा ये मैं ने कि सहने की ताब रखना


- munir-anwar