मुकम्मस शायरी
कविता में कलाकृति की खोलना
मुकम्मस शायरी की कलात्मकता में डूबें, जहाँ प्रत्येक पंक्ति भावनाओं और सौंदर्य की एक चित्रसूची प्रस्थापित करती है। मुकम्मस कविता की यह जगह खोजें जो संरचित शानदारता और गाने युक्ति को मिलाती है, जो आपको मुकम्मस की महंमती की महत्वाकांक्षा का अनुभव कराती है।
कुंजश्क-ओ-दरना ताज़ा-दम लाला कँवल और नस्तरन
वो बुलबुल-ओ-ताऊस-ओ-गुल वो कौकब और वो यासमन
गुल-हा-ए-सद-रंगीं-क़बा मुर्ग़ान-ए-सद-शीरीं-दहन
''गुलशन कहो तुम या चमन है अहल-ए-दिल की अंजुमन
सद बुलबुल-ए-शोरीदा-सर सद लाला-ए-ख़ूनीं-कफ़न''
वो बाग़-ए-यक-मीनू-सिफ़त गंजीना-ए-सर्व-ओ-समन
मसहूर-कुन वो चहचहे वो लहन-ए-सद-नाज़-ए-सुख़न
है अम्बरीं जिस की फ़ज़ा मुश्क-ए-ख़ुतन जिस की पवन
''इस बाग़ में आती है इक महबूबा-ए-गुल-पैरहन
शीरीं-नवा शीरीं-अदा शीरीं-सुख़न शीरीं-दहन''
वो है इलाज-ए-दर्द-ए-दिल दिल की मगर हलचल भी है
वो आश्ना-ए-ग़म भी है लेकिन बहुत चंचल भी है
वो जल्वा-ए-माह-ए-मुबीं वो नाज़नीं सांवल भी है
''वो गुल भी है सूरज भी है बिजली भी है बादल भी है
देखा न था पहले कभी ऐसा हसीं बाँका सजन''
ऐसे वो आया माह-रू औसान सब के आ लिए
नोक और पलक अब शे'र की क्या देखिए क्या भालिए
अश अश के इस तूफ़ान को आख़िर कहाँ तक टालिए
''पैकर को उस के शे'र के पैकर में क्यूँकर ढालिए
ख़ामोश हैं हैरान हैं सब शह्रयारान-ए-सुख़न''
बुलबुल सी वो नग़्मा-कुनाँ मुस्कान ग़ुंचे की चटक
तेवर वो बिजली की लपक लालीँ वो आरिज़ की धनक
ज़ुल्फ़ों में अम्बर की महक आँखों में तारों की दमक
''पेशानी-ए-सीमीं है या सुब्ह-ए-तख़य्युल की चमक
शाइस्तगी-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न उस के तबस्सुम की किरन''
वो हुस्न सा पाइंदा है वो माह सा रख़्शंदा है
बेहद ही वो बख़्शिंदा है और सब से ही ज़ेबिंदा है
जो देख ले फ़र्ख़न्दा है चाहे जो उस को ज़िंदा है
''हूर-ओ-परी शर्मिंदा है वो इस क़दर ताबिंदा है
देखे से निखरे रंग-ए-रुख़ छूने से मैला हो बदन''
चाहो बहुत सुनते रहो उस ज़िंदगी के साज़ को
दिल में ही बस रक्खो मगर तुम उन्स के उस राज़ को
जो कुछ भी हो तुम छूना मत उस पैकर-ए-अंदाज़ को
''बस दूर से देखा करो उस शम्अ'-ए-बज़्म-ए-नाज़ को
वो रौनक़-ए-काशाना-ए-दिल हैरत-ए-सद-अंजुमन''
बातों में उस की है अयाँ वाज़ेह ये मुबहम कौन है
सोचों में उस की दम-ब-दम मौजूद पैहम कौन है
तन्हाई के इस दश्त में ये उस का हमदम कौन है
''आओ चलें देखें ज़रा वो जान-ए-आलम कौन है
'सरदार' के शे'रों में है ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर की शिकन''
वो बुलबुल-ओ-ताऊस-ओ-गुल वो कौकब और वो यासमन
गुल-हा-ए-सद-रंगीं-क़बा मुर्ग़ान-ए-सद-शीरीं-दहन
''गुलशन कहो तुम या चमन है अहल-ए-दिल की अंजुमन
सद बुलबुल-ए-शोरीदा-सर सद लाला-ए-ख़ूनीं-कफ़न''
वो बाग़-ए-यक-मीनू-सिफ़त गंजीना-ए-सर्व-ओ-समन
मसहूर-कुन वो चहचहे वो लहन-ए-सद-नाज़-ए-सुख़न
है अम्बरीं जिस की फ़ज़ा मुश्क-ए-ख़ुतन जिस की पवन
''इस बाग़ में आती है इक महबूबा-ए-गुल-पैरहन
शीरीं-नवा शीरीं-अदा शीरीं-सुख़न शीरीं-दहन''
वो है इलाज-ए-दर्द-ए-दिल दिल की मगर हलचल भी है
वो आश्ना-ए-ग़म भी है लेकिन बहुत चंचल भी है
वो जल्वा-ए-माह-ए-मुबीं वो नाज़नीं सांवल भी है
''वो गुल भी है सूरज भी है बिजली भी है बादल भी है
देखा न था पहले कभी ऐसा हसीं बाँका सजन''
ऐसे वो आया माह-रू औसान सब के आ लिए
नोक और पलक अब शे'र की क्या देखिए क्या भालिए
अश अश के इस तूफ़ान को आख़िर कहाँ तक टालिए
''पैकर को उस के शे'र के पैकर में क्यूँकर ढालिए
ख़ामोश हैं हैरान हैं सब शह्रयारान-ए-सुख़न''
बुलबुल सी वो नग़्मा-कुनाँ मुस्कान ग़ुंचे की चटक
तेवर वो बिजली की लपक लालीँ वो आरिज़ की धनक
ज़ुल्फ़ों में अम्बर की महक आँखों में तारों की दमक
''पेशानी-ए-सीमीं है या सुब्ह-ए-तख़य्युल की चमक
शाइस्तगी-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न उस के तबस्सुम की किरन''
वो हुस्न सा पाइंदा है वो माह सा रख़्शंदा है
बेहद ही वो बख़्शिंदा है और सब से ही ज़ेबिंदा है
जो देख ले फ़र्ख़न्दा है चाहे जो उस को ज़िंदा है
''हूर-ओ-परी शर्मिंदा है वो इस क़दर ताबिंदा है
देखे से निखरे रंग-ए-रुख़ छूने से मैला हो बदन''
चाहो बहुत सुनते रहो उस ज़िंदगी के साज़ को
दिल में ही बस रक्खो मगर तुम उन्स के उस राज़ को
जो कुछ भी हो तुम छूना मत उस पैकर-ए-अंदाज़ को
''बस दूर से देखा करो उस शम्अ'-ए-बज़्म-ए-नाज़ को
वो रौनक़-ए-काशाना-ए-दिल हैरत-ए-सद-अंजुमन''
बातों में उस की है अयाँ वाज़ेह ये मुबहम कौन है
सोचों में उस की दम-ब-दम मौजूद पैहम कौन है
तन्हाई के इस दश्त में ये उस का हमदम कौन है
''आओ चलें देखें ज़रा वो जान-ए-आलम कौन है
'सरदार' के शे'रों में है ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर की शिकन''
- ain-seen
गुज़रे वो झुलाते हुए झुमका मिरे आगे
लॉकेट कभी कंगन कभी छल्ला मिरे आगे
रहता है हमेशा ही ये ख़तरा मिरे आगे
लड़की मिरे आगे है कि लड़का मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
बदली हैं यहाँ आज मोहब्बत की वो रस्में
शीरीं न रही अब किसी फ़रहाद के बस में
सोहनी के लगे तीर महींवाल की नस में
खाती है यहाँ हीर किसी और की क़स्में
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे
सुनते हो अजी कहती थी हव्वा की ये दुख़्तर
वो तर्ज़-ए-तख़ातुब था ये चाहत का समुंदर
अब दौर-ए-मुसावात है दोनों हैं बराबर
शौहर को पुकारे है वो अब नाम ही ले कर
आता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे
रखना था मोहब्बत को छुपा दिल की कली में
वा'दा था निभाने का बुरी और भली में
खुजली हुई शायद तिरे पैरों की तली में
पकड़ी जो गई आज रक़ीबों की गली में
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे
अब्बा जो तिरे इश्क़ की रूदाद समझते
मजनूँ का यक़ीनन हमें हम-ज़ाद समझते
और ग़ैब से भेजी हुई इमदाद समझते
सीने से लगाते हमें दामाद समझते
क्यूँकर कहूँ लो नाम न उन का मिरे आगे
लॉकेट कभी कंगन कभी छल्ला मिरे आगे
रहता है हमेशा ही ये ख़तरा मिरे आगे
लड़की मिरे आगे है कि लड़का मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
बदली हैं यहाँ आज मोहब्बत की वो रस्में
शीरीं न रही अब किसी फ़रहाद के बस में
सोहनी के लगे तीर महींवाल की नस में
खाती है यहाँ हीर किसी और की क़स्में
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे
सुनते हो अजी कहती थी हव्वा की ये दुख़्तर
वो तर्ज़-ए-तख़ातुब था ये चाहत का समुंदर
अब दौर-ए-मुसावात है दोनों हैं बराबर
शौहर को पुकारे है वो अब नाम ही ले कर
आता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे
रखना था मोहब्बत को छुपा दिल की कली में
वा'दा था निभाने का बुरी और भली में
खुजली हुई शायद तिरे पैरों की तली में
पकड़ी जो गई आज रक़ीबों की गली में
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे
अब्बा जो तिरे इश्क़ की रूदाद समझते
मजनूँ का यक़ीनन हमें हम-ज़ाद समझते
और ग़ैब से भेजी हुई इमदाद समझते
सीने से लगाते हमें दामाद समझते
क्यूँकर कहूँ लो नाम न उन का मिरे आगे
- shaukat-jamal
कुंजश्क-ओ-दरना ताज़ा-दम लाला कँवल और नस्तरन
वो बुलबुल-ओ-ताऊस-ओ-गुल वो कौकब और वो यासमन
गुल-हा-ए-सद-रंगीं-क़बा मुर्ग़ान-ए-सद-शीरीं-दहन
''गुलशन कहो तुम या चमन है अहल-ए-दिल की अंजुमन
सद बुलबुल-ए-शोरीदा-सर सद लाला-ए-ख़ूनीं-कफ़न''
वो बाग़-ए-यक-मीनू-सिफ़त गंजीना-ए-सर्व-ओ-समन
मसहूर-कुन वो चहचहे सद फ़ख़्र-ए-दाऊदी लहन
है अम्बरीं जिस की फ़ज़ा मुश्क-ए-ख़ुतन जिस की पवन
''इस बाग़ में आती है इक महबूबा-ए-गुल-पैरहन
शीरीं-नवा शीरीं-अदा शीरीं-सुख़न शीरीं-दहन''
वो है इलाज-ए-दर्द-ए-दिल दिल की मगर हलचल भी है
वो आश्ना-ए-ग़म भी है लेकिन बहुत चंचल भी है
वो जल्वा-ए-माह-ए-मुबीं वो नाज़नीं सांवल भी है
''वो गुल भी है सूरज भी है बिजली भी है बादल भी है
देखा न था पहले कभी ऐसा हसीं बाँका सजन''
ऐसे वो आया माह-रू औसान सब के आ लिए
नोक और पलक अब शे'र की क्या देखिए क्या भालिए
अश अश के इस तूफ़ान को आख़िर कहाँ तक टालिए
''पैकर को उस के शे'र के पैकर में क्यूँकर ढालिए
ख़ामोश हैं हैरान हैं सब शह्रयारान-ए-सुख़न''
बुलबुल सी वो नग़्मा-कुनाँ मुस्कान ग़ुंचे की चटक
तेवर वो बिजली की लपक लालीँ वो आरिज़ की धनक
ज़ुल्फ़ों में अम्बर की महक आँखों में तारों की दमक
''पेशानी-ए-सीमीं है या सुब्ह-ए-तख़य्युल की चमक
शाइस्तगी-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न उस के तबस्सुम की किरन''
वो हुस्न सा पाइंदा है वो माह सा रख़्शंदा है
बेहद ही वो बख़्शिंदा है और सब से ही ज़ेबिंदा है
जो देख ले फ़र्ख़न्दा है चाहे जो उस को ज़िंदा है
''हूर-ओ-परी शर्मिंदा है वो इस क़दर ताबिंदा है
देखे से निखरे रंग-ए-रुख़ छूने से मैला हो बदन''
चाहो बहुत सुनते रहो उस ज़िंदगी के साज़ को
दिल में ही बस रक्खो मगर तुम उन्स के उस राज़ को
जो कुछ भी हो तुम छूना मत उस पैकर-ए-अंदाज़ को
''बस दूर से देखा करो उस शम्अ'-ए-बज़्म-ए-नाज़ को
वो रौनक़-ए-काशाना-ए-दिल हैरत-ए-सद-अंजुमन''
बातों में उस की है अयाँ वाज़ेह ये मुबहम कौन है
सोचों में उस की दम-ब-दम मौजूद पैहम कौन है
तन्हाई के इस दश्त में ये उस का हमदम कौन है
''आओ चलें देखें ज़रा वो जान-ए-आलम कौन है
'सरदार' के शे'रों में है ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर की शिकन''
वो बुलबुल-ओ-ताऊस-ओ-गुल वो कौकब और वो यासमन
गुल-हा-ए-सद-रंगीं-क़बा मुर्ग़ान-ए-सद-शीरीं-दहन
''गुलशन कहो तुम या चमन है अहल-ए-दिल की अंजुमन
सद बुलबुल-ए-शोरीदा-सर सद लाला-ए-ख़ूनीं-कफ़न''
वो बाग़-ए-यक-मीनू-सिफ़त गंजीना-ए-सर्व-ओ-समन
मसहूर-कुन वो चहचहे सद फ़ख़्र-ए-दाऊदी लहन
है अम्बरीं जिस की फ़ज़ा मुश्क-ए-ख़ुतन जिस की पवन
''इस बाग़ में आती है इक महबूबा-ए-गुल-पैरहन
शीरीं-नवा शीरीं-अदा शीरीं-सुख़न शीरीं-दहन''
वो है इलाज-ए-दर्द-ए-दिल दिल की मगर हलचल भी है
वो आश्ना-ए-ग़म भी है लेकिन बहुत चंचल भी है
वो जल्वा-ए-माह-ए-मुबीं वो नाज़नीं सांवल भी है
''वो गुल भी है सूरज भी है बिजली भी है बादल भी है
देखा न था पहले कभी ऐसा हसीं बाँका सजन''
ऐसे वो आया माह-रू औसान सब के आ लिए
नोक और पलक अब शे'र की क्या देखिए क्या भालिए
अश अश के इस तूफ़ान को आख़िर कहाँ तक टालिए
''पैकर को उस के शे'र के पैकर में क्यूँकर ढालिए
ख़ामोश हैं हैरान हैं सब शह्रयारान-ए-सुख़न''
बुलबुल सी वो नग़्मा-कुनाँ मुस्कान ग़ुंचे की चटक
तेवर वो बिजली की लपक लालीँ वो आरिज़ की धनक
ज़ुल्फ़ों में अम्बर की महक आँखों में तारों की दमक
''पेशानी-ए-सीमीं है या सुब्ह-ए-तख़य्युल की चमक
शाइस्तगी-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न उस के तबस्सुम की किरन''
वो हुस्न सा पाइंदा है वो माह सा रख़्शंदा है
बेहद ही वो बख़्शिंदा है और सब से ही ज़ेबिंदा है
जो देख ले फ़र्ख़न्दा है चाहे जो उस को ज़िंदा है
''हूर-ओ-परी शर्मिंदा है वो इस क़दर ताबिंदा है
देखे से निखरे रंग-ए-रुख़ छूने से मैला हो बदन''
चाहो बहुत सुनते रहो उस ज़िंदगी के साज़ को
दिल में ही बस रक्खो मगर तुम उन्स के उस राज़ को
जो कुछ भी हो तुम छूना मत उस पैकर-ए-अंदाज़ को
''बस दूर से देखा करो उस शम्अ'-ए-बज़्म-ए-नाज़ को
वो रौनक़-ए-काशाना-ए-दिल हैरत-ए-सद-अंजुमन''
बातों में उस की है अयाँ वाज़ेह ये मुबहम कौन है
सोचों में उस की दम-ब-दम मौजूद पैहम कौन है
तन्हाई के इस दश्त में ये उस का हमदम कौन है
''आओ चलें देखें ज़रा वो जान-ए-आलम कौन है
'सरदार' के शे'रों में है ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर की शिकन''
- ain-seen
इलाज-ए-हिज्र ज़रा और करके देखते हैं
नज़ारे हम किसी रश्क-ए-क़मर के देखते हैं
ख़ुमार-ए-दीद से हम भी सँवर के देखते हैं
''सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं''
हमें कसक सी जो लाहक़ है चंद सालों से
नजात पाने को जाते हैं इन मलालों से
हलाक होते हैं उस की निगह के भालों से
''सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बर्बाद करके देखते हैं
सुबू मिज़ाज है सद-चश्म-ए-नग़्मा-साज़ उस की
वो बे-नियाज़ निगह है सुख़न-तराज़ उस की
दिल-ए-शक़ी से तो अच्छी है साज़-बाज़ उस की
''सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं''
ग़ज़ल सुनाने का उस को हमें मिला है शरफ़
सुख़न में हम ने बनाया जो उस को अपना हदफ़
तो उठ भी सकती है उस की नज़र हमारी तरफ़
''सुना है उस को भी है शेर-ओ-शायरी से शग़फ़
सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं''
वो मुस्कुराए तो रुख़ पर गढ़े से पड़ते हैं
लबों को छूते हैं अल्फ़ाज़ तो सँवरते हैं
जो लम्स पाते हैं होंटों का तो निखरते हैं
''सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं''
वही तो है जिसे हर एक चाँद कहता है
वो जिस के नूर में सूरज किरन सा बहता है
वो जिस के हिज्र को सूरज भी छुप के सहता है
''सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं''
कि उस की ज़ुल्फ़ पे तो बदलियाँ खुल आती हैं
उसी की दीद पे ये क़ुमरियाँ भी गाती हैं
उसी के नूर में तो बिजलियाँ नहाती हैं
''सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं''
बहुत हसीन हैं उस की ख़याल सी आँखें
वफ़ूर-ए-बादा से रंगीं गुलाल सी आँखें
जो उन में झाँक के देखो तो ढाल सी आँखें
''सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं''
कि रसमसा के सना-गर हैं कोंपलें उस की
सुना है कैफ़ का महवर हैं महफ़िलें उस की
सुना है शौक़ से बरतर हैं मंज़िलें उस की
''सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं''
सुना है ग़ुंचा-दहन सिर्र-ए-सद-मलाहत है
सुना है जान-ए-ग़ज़ल सर-बसर सबाहत है
सुना है उस की अजब रुस्तख़ेज़ क़ामत है
''सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं''
जो मुस्कुराए तो याक़ूत-ए-लब बहलते हैं
सुना है उस के तबस्सुम से दिल पिघलते हैं
अक़ीक़-होंटों पे जब क़हक़हे मचलते हैं
''सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं''
है बात और ही और हर अदा हसीं उस की
सबा के दोष पे वो ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं उस की
कि दिल पे क़हर हैं बातें वो दिल-नशीं उस की
''सुना है आइना-तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं''
कि देखते जो हैं ख़ुद को वो उस के दर्पन में
हुए हैं इतने वो मसहूर उस की बन-ठन में
वो ख़ुद को भूल के खोए हैं इक नए-पन में
''सुना है जब से हमाइल हैं इस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गुहर के देखते हैं''
सुना है लम्स को पाने के उस के अरमाँ में
वफ़ूर-ए-कैफ़ के अफ़्सूँ में शौक़-ए-जानाँ में
इसी ख़याल में खो कर कभी शबिस्ताँ में
''सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं''
ग़ुरूर-ए-हुस्न के फूलों की ऐसी-तैसी है
गो ख़ुशबू उन की भी बिल्कुल उसी के जैसी है
पर उन की आन यहाँ पाश पाश कैसी है
''सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं''
नज़ीर कोई भी उस का सर-ए-बिलाद नहीं
कोई भी हुस्न में उस हुस्न से ज़ियाद नहीं
नहीं जो देख के उस को कोई जो शाद नहीं
''वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि इस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं''
अजीब चीज़ है जल्वा जमाल-ए-कामिल का
हटे कभी कि जो पर्दा है उस के महमिल का
ख़याल फिर नहीं रहता है कोई मंज़िल का
''बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं''
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुन्फ़इल है बहिश्त
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुज़्महिल है बहिश्त
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुंदमिल है बहिश्त
''सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं''
चले तो गर्दिशें सब ए'तिराफ़ करती हैं
चले तो रास्ता उस का वो साफ़ करती हैं
चले तो उस के सलीक़े का लाफ़ करती हैं
''रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं''
ख़याल-ओ-ख़्वाब की इक अंजुमन उसे देखे
और इस तरह कि ब-दीवाना-पन उसे देखे
कभी दरीचे से गुज़री पवन उसे देखे
''किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं''
अजब जुनूँ के ये अपने मुआलिजे ही सही
दिल-ए-ग़रीब के अपने मुग़ालते ही सही
ये बालक-हट के सबब के मुतालबे ही सही
''कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ता'बीर करके देखते हैं''
उसी के कूचे में रह लें कि दर-ब-दर जाएँ
उसी के दर पे ही बैठें या अपने घर जाएँ
अब उस के शहर को छोड़ें या इस में मर जाएँ
''अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं''
नज़ारे हम किसी रश्क-ए-क़मर के देखते हैं
ख़ुमार-ए-दीद से हम भी सँवर के देखते हैं
''सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं''
हमें कसक सी जो लाहक़ है चंद सालों से
नजात पाने को जाते हैं इन मलालों से
हलाक होते हैं उस की निगह के भालों से
''सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बर्बाद करके देखते हैं
सुबू मिज़ाज है सद-चश्म-ए-नग़्मा-साज़ उस की
वो बे-नियाज़ निगह है सुख़न-तराज़ उस की
दिल-ए-शक़ी से तो अच्छी है साज़-बाज़ उस की
''सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं''
ग़ज़ल सुनाने का उस को हमें मिला है शरफ़
सुख़न में हम ने बनाया जो उस को अपना हदफ़
तो उठ भी सकती है उस की नज़र हमारी तरफ़
''सुना है उस को भी है शेर-ओ-शायरी से शग़फ़
सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं''
वो मुस्कुराए तो रुख़ पर गढ़े से पड़ते हैं
लबों को छूते हैं अल्फ़ाज़ तो सँवरते हैं
जो लम्स पाते हैं होंटों का तो निखरते हैं
''सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं''
वही तो है जिसे हर एक चाँद कहता है
वो जिस के नूर में सूरज किरन सा बहता है
वो जिस के हिज्र को सूरज भी छुप के सहता है
''सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं''
कि उस की ज़ुल्फ़ पे तो बदलियाँ खुल आती हैं
उसी की दीद पे ये क़ुमरियाँ भी गाती हैं
उसी के नूर में तो बिजलियाँ नहाती हैं
''सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं''
बहुत हसीन हैं उस की ख़याल सी आँखें
वफ़ूर-ए-बादा से रंगीं गुलाल सी आँखें
जो उन में झाँक के देखो तो ढाल सी आँखें
''सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं''
कि रसमसा के सना-गर हैं कोंपलें उस की
सुना है कैफ़ का महवर हैं महफ़िलें उस की
सुना है शौक़ से बरतर हैं मंज़िलें उस की
''सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं''
सुना है ग़ुंचा-दहन सिर्र-ए-सद-मलाहत है
सुना है जान-ए-ग़ज़ल सर-बसर सबाहत है
सुना है उस की अजब रुस्तख़ेज़ क़ामत है
''सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं''
जो मुस्कुराए तो याक़ूत-ए-लब बहलते हैं
सुना है उस के तबस्सुम से दिल पिघलते हैं
अक़ीक़-होंटों पे जब क़हक़हे मचलते हैं
''सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं''
है बात और ही और हर अदा हसीं उस की
सबा के दोष पे वो ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं उस की
कि दिल पे क़हर हैं बातें वो दिल-नशीं उस की
''सुना है आइना-तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं''
कि देखते जो हैं ख़ुद को वो उस के दर्पन में
हुए हैं इतने वो मसहूर उस की बन-ठन में
वो ख़ुद को भूल के खोए हैं इक नए-पन में
''सुना है जब से हमाइल हैं इस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गुहर के देखते हैं''
सुना है लम्स को पाने के उस के अरमाँ में
वफ़ूर-ए-कैफ़ के अफ़्सूँ में शौक़-ए-जानाँ में
इसी ख़याल में खो कर कभी शबिस्ताँ में
''सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं''
ग़ुरूर-ए-हुस्न के फूलों की ऐसी-तैसी है
गो ख़ुशबू उन की भी बिल्कुल उसी के जैसी है
पर उन की आन यहाँ पाश पाश कैसी है
''सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं''
नज़ीर कोई भी उस का सर-ए-बिलाद नहीं
कोई भी हुस्न में उस हुस्न से ज़ियाद नहीं
नहीं जो देख के उस को कोई जो शाद नहीं
''वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि इस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं''
अजीब चीज़ है जल्वा जमाल-ए-कामिल का
हटे कभी कि जो पर्दा है उस के महमिल का
ख़याल फिर नहीं रहता है कोई मंज़िल का
''बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं''
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुन्फ़इल है बहिश्त
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुज़्महिल है बहिश्त
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुंदमिल है बहिश्त
''सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं''
चले तो गर्दिशें सब ए'तिराफ़ करती हैं
चले तो रास्ता उस का वो साफ़ करती हैं
चले तो उस के सलीक़े का लाफ़ करती हैं
''रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं''
ख़याल-ओ-ख़्वाब की इक अंजुमन उसे देखे
और इस तरह कि ब-दीवाना-पन उसे देखे
कभी दरीचे से गुज़री पवन उसे देखे
''किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं''
अजब जुनूँ के ये अपने मुआलिजे ही सही
दिल-ए-ग़रीब के अपने मुग़ालते ही सही
ये बालक-हट के सबब के मुतालबे ही सही
''कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ता'बीर करके देखते हैं''
उसी के कूचे में रह लें कि दर-ब-दर जाएँ
उसी के दर पे ही बैठें या अपने घर जाएँ
अब उस के शहर को छोड़ें या इस में मर जाएँ
''अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं''
- ain-seen
न क़ैद-ए-शरअ' बाक़ी है न आज़ादी की है कुछ हद
नहीं कुछ गुफ़्तुगू इस बाब में ये नेक है या बद
बुज़ुर्गों का भी फ़तवा है कि पढ़ क़ानून-ए-सर-सय्यद
ब-मी सज्जादा-रंगीं कुन गिरत पीर-ए-मुग़ाँ गोयद
कि सालिक बे-ख़बर न-बुवद ज़ राह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल-हा
नहीं कुछ गुफ़्तुगू इस बाब में ये नेक है या बद
बुज़ुर्गों का भी फ़तवा है कि पढ़ क़ानून-ए-सर-सय्यद
ब-मी सज्जादा-रंगीं कुन गिरत पीर-ए-मुग़ाँ गोयद
कि सालिक बे-ख़बर न-बुवद ज़ राह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल-हा
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