कविता शायरी

अभिव्यक्ति कला का सम्मान

कविता शायरी के विश्व में डूबें, जहाँ प्रत्येक पंक्ति एक शानदार क्रियारेखा है जो विभिन्न भावनाओं और कथाओं को समेटती है। शब्दों की जादुई खिचाव, गहरी विचारधारा, और अभिव्यक्ति की कला का आनंद लें जो प्रस्तुति में कविता की सुंदरता का जश्न मनाता है।

मेरे चेहरे पर आज
एक और चेहरा मैं देखता हूँ
हर तरफ चेहरे पर एक और चेहरा जब कभी लेकर चला
मैं अपना चेहरा दुनिया को नही भाया मेरा


असली चेहरा मैने भी औड लिया चेहरा
बिल्कुल वैसा तुम्हे पसंद है
ये है अब वही चेहरा असल में तो अब मेरे पास हैं
कई चेहरे वक़्त के हिसाब से में बदल लेता हूँ


चेहरा अब कहीं भी नहीं ले जाता हूँ
असली चेहरा जब तक था
मेरे पास एक ही चेहरा तुम्हे भी पसंद नहीं था
मेरा असली चेहरा हक़ीकत तो ये है


खो गया है मेरा असली चेहरा

-


ये चारों तरफ बेन्तेहाँ भीड़ फिर भी इस बड़े से शहर में कोई ही होता है अपना
वरना तो यहाँ सपना भी कभी नहीं होता है
अपना यहाँ आसमाँ से बरसता है
धन अगर तू लपक सके तो लपक यही है तेरे रिश्तों नातो का इस शहर का मजबूत जोड़ भागते हुए लोग पहुँचते कहीं नहीं फिर भी निरंतर भागते और भागते बस यहाँ भाग-दौड़ का निरंतर ओलंपिक ये शहर है


हाँ ये मुंबई है














-


सुबह उजाले थे खड़े इस इंतजार में तू कदम बड़ा सूरज भी लाया प्रकाश तेरे साथ न हो कारवां बिना फिकर
तू कदम उठा आगे बढ़
क्यों देर तेरे हौंसले हैं बुलंद तो मंजिल कहाँ दूर बहने दे हवाओं को बन कर आंधी ये तूफान
कुछ कर न पायेंगे भले ही विशाल हो कितना भी सागर तेरी छोटी हो नाव डाल दे सागर में तेरे इरादों की पतवार सागरों को बौना कर देंगी तू खोज मुसीबतें निपट और आगे बढ़ मुहँ छिपाना तेरा काम नहीं देख


इससे पहले सूरज तपे
दुनिया चले तू चल
और सिर्फ चल तेरे चलने से मंजिल करीब है

-


आसमान से जितनी शबनम रोज बरसती है उससे ज्यादा इस धरती पर धुप बिखरती है अहसासों को कहाँ जरुरत होती भाषा की खुशबू कितनी ख़ामोशी से बातें करती है कुछ सपने तो सारे जीवन शौक मनाते हैं जब भी दिल में घुटकर कोई ख्वाहिश मरती है

-


कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो इस डूबते हुआ तिनके को सहरा दे दो कोई मेरी डूबती को कश्ती किनारा दे दो मुझे भी कोई पतवार और माझी भी दे दो कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो मै नन्हे पैरो से कितनी दूर चल पाउगा गिरते
उठते कब तक संभल पाउगा कोई थामने वाले हाथ मुझे भी दे दो कोई अपना साया और साथ भी दे दो कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो …… आस्मां को देखकर कब तक सो जाउगा तारो मै कब तक अपनों को देखता जाउगा कुछ परियो के कहानिया मुझे भी दे दो टूटा तारो वाली किस्मत मुझे भी दे दो कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो

-


तू छू रहा
गर किसी उंचाई को अपने गुरुर से बाहर आ के खुदा भी कभी-कभी आ जाता है
जमीं पर वो देख यहाँ जितने भी दरख़्त हैं जो लदे हैं फलों से सब झुके हुए हैं जो अकड़ के खड़े हैं उनका हश्र तूफानों के बाद जमीन बता देती है

-


खुद को भी भूल जायेंगे
अगर तू चाहे तो हम हद से गुजर जायेंगे तू जहाँ भी है रहता छिपा हुआ है
शान से रहते हैं
अब तेरे बन्दे धरती पर कैसे


तुझे अब हम बताएँगे कैसा है तू निराला तेरी पैदा की दुनिया को भूल जाता है
देता है किसी को भूख रोटी छीन लेता है किसी को देता है
भंडार भरे और भूख छीन लेता है उतर के आ अब धरती पर बस इतना ही बता के जा तू है
और कुछ कर सकता है वर्ना यहाँ हम भी अब खुद भगवान बन जायेंगे

-


मत समझना कि मुस्कुराते है जो उन्हे कोई गम नही है... ज़िंदगी उनकी भी है एक सफ़र मुश्किले उनकी भी कम नही है... चलते है खामोश हवा से वो.. तूफान उनके मन मे कम नही है .... आवारा बादलो की तरह वो बरसते नही मत समझना की उनका कोई मर्म नही है

एक मुस्कान मे सिमटी ज़िंदगी सारी उनकी नसीब मे बेशक उनके दम नही है... फ़र्क है इतना बस अंजान .. उनकी आँखो मैं हार का गम नही है

-


जिंदगी आखिर जिंदगी है जिंदगी एक गिफ्ट है.. कबूल कीजिये जिंदगी एक एहसास है.. महसूस कीजिये जिंदगी एक दर्द है.. ..बाँट लीजिये जिंदगी एक प्यास है.. प्यार दीजिये जिंदगी एक मिलन है.. मुस्कुरा लीजिये जिंदगी एक जुदाई है.. सबर कीजिये जिंदगी एक आंसू है.. पी लीजिये जिंदगी आखिर जिंदगी है जी लीजिये

-


प्यार जीवन की उपवन है मुझमे मै नहीं हूँ तुझमे तू नहीं है तुझमे मै हूँ मुझमे तू है ... फिर क्यों लगती हमको एक तनहा सी दूरी है दिल की ये मजबूरी है मिलना तो जरुरी है प्यार तो हर राह अनंत है अधूरी है ! मिलन है चुभन है यादों में डूबा मन है खोया मेरा तन है प्यार की भोली चितवन है प्यार जीवन की उपवन है तुम फूल मै शूल हूँ मै फूल तुम शूल हो पर भूल से भी प्यारी फूल ! ना कोई भूल हो ! न तुम तुम रहो ना मै मै रहूँ हम दोनों मिल हर जनम हमतुम रहें फिर तुम तुम और मै मै रहूँ क्योकि प्यार जीवन का उपवन है !

-


अजनबी सी राहों में
दूर तक निगाहों में
तीश्नगी का मौसम है
बेरुखी का मौसम है


आज फिर निगाहों को बीते कल की प्यास है
ऐसा लगता है जैसे
चाँद फिर उदास है
रंग फीके फीके हैं


तारे रूठे रूठे हैं
बादलों का शोर है
खिज़ां खिज़ां ये दौर है
इस कदर अकेले में प्यार की तलाश है


ऐसा लगता है जैसे
चाँद फिर उदास है
अजब है दिल की वेह्शातें
और आस पास आहटें


जिसको ढूँढना चाहो
उसको ढून्ढ कब पाओ
फिर रहा हूँ दरबदर
मुझे उसकी आस है


ऐसा लगता है जैसे
चाँद फिर उदास है
बात तो करे कोई
साथ तो चले कोई


ख़ामोशी के पहरे हा
ज़ख़्म दिल के गहरे है
आज वो मिले मुझको दर्द जिसको रास है
ऐसा लगता है जैसे


चाँद फिर उदास है

-


आरक्षण ने क्या दिया ? हमे बताओ ना
ये इतना जरुरी क्यों है ? समझाओ ना
तुमने लगाया था इसे विकास के लिए
स्वाभिमान से जी सको


इस अधिकार के लिए
लेकिन तुमने पाया क्या ? दिखाओ ना
अन्याय हुआ है तेरे साथ
मैं मानता हूँ तुम्हे भी आगे जाने की ललक हैं


मैं जनता हूँ आरक्षण तेरी मांग पूरा कर पाया क्या ? बतलाओ ना आज तुम और गरीब हो गए हो
आज तेरे बंधुओं ने ही खाई खोदी हैं
वो लपक लेते है सब कुछ ऊपर से ही
और तुम खाई से देख भी नहीं पाते


तेरी भूख मिट पाई क्या ? देश को बताओ ना
मै बताता हूँ
नहीं . तेरी भूख नहीं मिटी
उलटे तुझे रोटी देने वाले भी दलिद्र हो गए


आरक्षणरूपी राक्षस ने सब कुछ लूट लिया
तुम्हारा भी
हमारा भी आज सबकुछ भेट चढ़ गया हैं
धन-देवता के


तुम्हारा भी
हमारा भी . लेकिन अब हम क्या करे ? वो आज भी तेरे तावे पर ही रोटी सकते है
और तेरे कुएं का पानी पीते हैं
क्या तुम विरोध कर पाओगे ? मेरा हौसला बढाओ ना


हम साथ लड़ेगे
इन दानवों से इन आरक्षण के रखवालो से
हम जीत जाएगे
तुम साथ तो आओ ना .

-


फिर कोई उम्मीद में देखता है
दूर तक मगर धूल ही धूल है नजर कोई आता नहीं धोखा तो नहीं है ये कोई उठा हुआ तूफ़ान है चला तो
मैं भी हूँ चीरता हुआ अंधेरों को मुझे पता है अँधेरे के गर्भ में उजाले का प्रसव रोज होता है

-


मुहँ छिपाने से आँख बंद कर लेने से मुसीबतें टला नहीं करती आँख खोल अक्सर तो ये कई बार आँख मिलाते डर जाती हैं तेरी चुप्पी तुझे कटघरे में ला देती है तू भी तो हुंकार भर देख और आजमा कैसे लोग ऊँची आवाज में झूठ को सच साबित करते है सच ही बोल अरे बोल तो सही लोग मौन को अब कहाँ समझते हैं जोर से कह देख ये तमाम भौम्पू अपने झूठ को सच साबित करते हैं अब मौन से काम न चलेगा सच को सामने लाना ही होगा अब अन्धो को चाँद दिखता नहीं उन्हें ऊँची आवाज में बताना होगा

-


साथ मिलता नही यहाँ किसी का.. अकेले ही यहाँ चलना पड़ता है.. धूप की फ़िक्र कर रहा तू.. यहाँ अंगरो पर जलना पड़ता है.. ... ... खवाब बुनता चाँदनी रातो के.. यहाँ घने अंधेरे मैं रहना पड़ता है.. नाम है ज़िंदगी इस चीज़ का अंजान. दुख हो हज़ार पर हँसना पड़ता है मत करना तू गम किसी के बिछड़ने का. हमराज़ अजनबी से यहाँ बनना पड़ता है.. मिलता नही सहारा गिरने पर .. खुद ही अक्सर यहाँ संभलना पड़ता है.. जी अपनी ज़िंदगी एक काफ़िर की तरह अक्सर अपना ठिकाना बदलना पड़ता है.. क्यों बेचैन तू अपनी तकलीफो से इनका सामना तो हर मुसाफिर को करना पड़ता है आते है काँटे हज़ार रास्ते मैं.. चलना है तो दर्द सहना ही पड़ता है..

-


अगर यकीं नहीं आता तो आजमाए मुझे वो आईना है तो फिर आईना दिखाए मुझे अज़ब चिराग़ हूँ दिन-रात जलता रहता हूँ मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे ... मैं जिसकी आँख का आँसू था उसने क़द्र न की बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे बहुत दिनों से मैं इन पत्थरों में पत्थर हूँ कोई तो आये ज़रा देर को रुलाए मुझे मैं चाहता हूँ के तुम ही मुझे इजाज़त दो तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे

-


मन में पतझड़
दिल में सहरा
आँख में बादल व्यथा हर जगह नए रंग में है प्यार की पागल व्यथा कह रही हैं रूह में उतरी हुयीं ये खुशबुयें प्यार भीगा दिल जला तो हो गयी संदल व्यथा झील के पानी में जैसे कोई कंकड़ फेंक दे जिन्दगी को दे गयी फिर इस तरह हलचल व्यथा और तो हर रास्ते पर शूल की तरह चुभी किन्तु हरदम प्यार के पथ पर रही मखमल व्यथा और सारे लोग तो इक दिन पराये हो गए हर सफ़र में साथ थी तो बस मेरी चंचल व्यथा

-


हम बदलते वक़्त की आवाज़ हैं आप तो साहब यूँ ही नराज़ हैं आप क्यों कर मुत्मुइन होंगे भला हम नई तहज़ीब का अंदाज़ हैं ... हम वही नन्हें परिन्दे परिन्दे हैं हुज़ूर जो नई परवाज़ का आग़ाज़ हैं भोर के सूरज की हम पहली किरन आप माज़ी का शिकस्ता साज़ हैं आप जिस पर्बत से डरते है जनाब हम उसे रौंदेंगे हम जाँबाज़ हैं फैसला चलिए करें इस बात पर तीर हैं हम आप तीरंदाज़ हैं टूटती है सदी की ख़ामोशी फिर कोई इंक़लाब आएगा मालियो! तुम लहू से सींचो तो बाग़ पर फिर शबाब आएगा ... सारा दुख लिख दिया भविष्यत को मेरे ख़त का जवाब आएगा आज गर तीरगी है किस्मत में कल कोई आफ़ताब आएगा

-


Ritten by rsrajiv25. posted in hindi kavita फिर तू किस चक्कर में है भाई यहाँ सब चलता है यहाँ जुगाड़ बहुत सही लफ्ज है हर कोई जुगाड़ से चल रहा है रेल में सीट नहीं है
जुगाड़ है सीट मिल जायेगी नंबर कम आये जुगाड़ है डिविजन बन ही जायेगी शादी की तारीख नहीं है पंडित जी जुगाड़ कर देंगे तारीख निकल आएगी सत्ता पर काबिज होना है जुगाड़ लड़ाओ बिना बहुमत के सरकार बन जायेगी

-


दुःख आया है तो पीछे सुख भी लायेगा जरूर
गर दर्द है तो मरहम लगाने से जायेगा जरूर !! बैठ के किनारे पर कुछ भी हासिल नहीं होता
जो उतरा समंदर में वही मोती पायेगा जरूर !! एक भूखे को रोटी का टूकडा मिल जाए काफी है
सुखी रोटी में पकवान का ज़ायका आयेगा जरूर !! कैद में रहके परिंदा भूल जायेगा ना परवाज अपनी


गर हौसला हो बुलंद
तोड़ कफ़स उड़ जायेगा जरूर !! आँख मूंदे कहीं पे भी चलना समझदारी तो नहीं
युही चलता रहा
एक दिन ठोकर खायेगा जरूर !! नीशीत जोशी

-


उलझनों और कश्मकश में.. उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ.. ए जिंदगी! तेरी हर चाल के लिए.. मैं दो चाल लिए बैठा हूँ | लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख - मिचोली का ... मिलेगी कामयाबी
हौसला कमाल का लिए बैठा हूँ l चल मान लिया.. दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक.. गिरेबान में अपने
ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ l ये गहराइयां
ये लहरें


ये तूफां
तुम्हे मुबारक ... मुझे क्या फ़िक्र..
मैं कश्तीया और दोस्त... बेमिसाल लिए बैठा हूँ...

-


हर मेरे शे'र पर आ कर उसने तफ़्सीर रखी थी
जिस शे'र में उनकी और मेरी तक़दीर लिखी थी
वस्ल की ख़ुशी और हिज्र का ग़म भी लिखा था
हर वो जगह लिखी थी जहाँ जहाँ वोह दिखी थी


महफ़िल की रौनक भी
आँखों की मयकशी भी
जिक्र मीना का भी किया था मैय जिसमे चखी थी
तब्बसुम ओठो की


नजाकत भी बयाँ की थी उसमें
यह भी कहा था दास्ताँ-ए-इश्क़ में कैसी सखी थी
अब वोह किसी और की है तो क्या? मुहब्बत तो है
पल पल को याद करके शे'रो में कहानी लिखी थी !!!! नीशीत जोशी

-


मौका था बातें बताने का
टूटा आईना दिखाने का
फुर्सत ना पायी कभी रोने की
मेंरा पेशा था हसाने का


दास्ताँ ख़ूबां की कहें ना कोई
इल्जाम पाया दिल जलाने का
ना थी तवक़्क़ो ये हश्र की
हस हस के रोना जताने का


फुर्सत ना पायी जिगर रोंदने की
पेशा था वादा निभाने का
तेरी अज़मत ले मुझे आयी है
होगा इंतजाम दिल बसाने का !! नीशीत जोशी

-


खुशियां कम और अरमान बहुत हैं
जिसे भी देखिए यहां हैरान बहुत हैं

करीब से देखा तो है रेत का घर


दूर से मगर उनकी शान बहुत हैं

कहते हैं सच का कोई सानी नहीं
आज तो झूठ की आन-बान बहुत हैं



मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी
यूं तो कहने को इन्सान बहुत हैं



तुम शौक से चलो राहें-वफा लेकिन
जरा संभल के चलना तूफान बहुत हैं

वक्त पे न पहचाने कोई ये अलग बात


वैसे तो शहर में अपनी पहचान बहुत हैं।।।

-


पडा ना फर्क अनो जुबान लिखने से
जमीन जमीन ही रही आसमान लिखने से... रहा जिनसे हर घडी ताल्लुख मेरा
बन ना सका मेरा उसे साथी लिखने से... पनाह तक नही मिल सकी मुझे चंद पलो की
उजडे हुये बाग को मेरे गुलशन लिखने से... कडी तपिश मे झुलजता रहा बदन मेरा दोस्तो.


के धुप धुप ही रही मेरे सायबान लिखने से...!

-