दिल को छू जाने वाली कहानियाँ शायरी

भावनाओं का जादू महसूस करें

कहानियों से प्रेरित, शायरी की दुनिया में खोज करें, जहां पंक्तियाँ इतनी दख़ल भरी हैं केक वह संवेदना को प्रस्तुत करें और कहानी के महक के साथ समर्पित हों। इस भावनात्मक शब्दों को अपनी आत्मा को छूने और विभिन्न भावनाओं को जागृत करने में मदद का किया जाए।

मुझसे सवाल किया गया कि बीबी कैसी होना चाहिए
मैं कहता हूँ कि कोई बुरी बीबी मुझको दिखादे तो मैं इस सवाल का जवाब दूँ। मेरे ख़्याल में बीबी ख़ुदा की नेअमत है और ख़ुदा की नेअमत कभी बुरी नहीं होती। बीवी की वजह से घर में रोशनी सी फैली रहती है। चराग़ के नीचे ज़रा सा अंधेरा भी होता है
जैसा कि मैं एक मर्तबा पहले भी कह चुका हूँ
अगर कोई नादान मर्द ज़री सी तारीकी से घबराकर चराग़ की शिकायत करे तो अंधेरा ही तो है। मैं इसका भी दावेदार हूँ कि मैंने आज तक कोई बदसूरत औरत भी नहीं देखी। आँखें रखता हूँ और दुनिया देखती है


अगर कहीं होती तो आख़िर मैं न देखता।
इसका सबूत ये भी है कि बदसूरत से बदसूरत जो कही जा सकती है उसका भी चाहने वाला कोई न कोई निकल आता है। फिर अगर वो बदसूरत थी तो ये परस्तिश करने वाला कहाँ से पैदा हो गया। इस लैला का मजनूं कहाँ से आगया
नहीं साहब औरत बदसूरत नहीं होती
ये मेरा ईमान है और यही ईमान हर शख़्स का होना चाहिए। असल वजह ये है कि औरत में उम्दा तर्शे हुए हीरे की तरह हज़ारों पहल होते हैं और हर पहल में आफ़ताब एक नए रंग से मेहमान होता है। ये मुम्किन है कि कोई पहल किसी (ख़ास शख़्स) की आँख में ज़रूरत से ज़्यादा चकाचौंध पैदा कर दे


और वो पसंद न करे तो इससे बीबी की बुराई कहाँ से साबित हुई।
एक पुराने यूनानी ड्रामा नवीस ने लिखा है कि पहले मर्द और औरतें इस तरह होते थे कि दोनों की पीठ एक दूसरे से जुड़ी होती थी और ये लोग रास्ता इस तरह चलते थे कि पहले चारों हाथ ज़मीन पर लगे और दोनों सर नीचे आगए। और चारों पाँव सर की जगह हवा में रहे। इस तरह के बाद पल्टा खाया और चारों पाँव के बल खड़े होगए और इस तरह आगे बढ़ते गए। ज़ाहिर बात है कि ऐसी हालत में ये लोग रास्ता बहुत तेज़ चलते थे और चूँकि दो दो आदमी मिले हुए थे इसलिए उनकी क़ुव्वतें भी दोगुनी थीं। देवताओं ने उनकी शोरा पुश्ती की वजह से मश्वरा किया कि क्या करना चाहिए
आख़िरकार ये सलाह ठहरी कि ये बीच से अलैहदा कर दिए जाएं ताकि उनकी क़ुव्वतें आधी रह जाएं और उनके चढ़ावे दोगुने होजाएं। चुनांचे ऐसा ही किया गया
तब से हर औरत और हर मर्द अपना अपना जोड़ा ढूँढते फिरते हैं


जिनको मिल जाता है वो ख़ुश रहते हैं
जिनको बदक़िस्मती से न मिला वो ग़रीब औरत को दुख देते हैं।
किसी को बेज़बान निम्मो ही बीवी पसंद है
किसी को ऐसी औरत अच्छी लगती है जिसकी ज़बान हर वक़्त कतरनी की तरह चलती रहे


अगर ख़ुशक़िस्मती से वही क़दीम जोड़ा मिल गया तो दोनों ख़ुश हैं
नहीं तो बीबी ग़रीब को बुरा कहते हैं
आख़िर उस ग़रीब का जोड़ा भी तो बिछुड़ गया है मगर उसकी कोई बात भी नहीं पूछता। ये ख़्याल ग़लत है कि सिर्फ़ अच्छों ही अच्छे का साथ मज़ेदार होता है। अगर तालमेल हुआ और प्रगत मिल गई तो जिन लोगों को हम अपने ज़ोम नाक़िस में बुरा समझते हैं उनकी भी ज़िंदगी लुत्फ़ की गुज़रती है। आपने सुना नहीं



ख़ुदा के फ़ज़ल से उतरा था क्या ही अर्श से जोड़ा
न मुझसा कोई गुर्गा हो न तुम सी कोई शफ़तल हो
हमारे पड़ोस में एक मियां बीबी रहते हैं जिनका जोड़ा पूरी तौर से मिल गया है। ये दोनों आदमी इंतहा दर्जे के काहिल
परले सिरे के झूटे और हद के नकारे हैं


मगर जब देखिए दोनों क़ुमरियों की तरह एक दूसरे के साथ हैं और गलबहियां डाले बैठे हैं। उनके दो बच्चे हैं
किसी ने उन बच्चों का धोया हुआ मुँह कभी नहीं देखा। कपड़े उन लोगों के तन पर से कट के गिर जाते हैं मगर धोबी को देने की तौफ़ीक़ नहीं होती। बच्चों के कपड़ों में ज़रा सी फूंक बढ़के नीचे से ऊपर तक पहुँच जाती और फट कर अलैहदा होजाती है मगर सूई तागे की शर्मिंदा नहीं होती। मैंने एक दिन उस औरत से पूछा कि तुम्हारे मियां तुमको चाहते हैं
कहने लगी कि इतना चाहते हैं कि खाना लिए बैठे रहते हैं
मगर बग़ैर मेरे नहीं खाते। दूसरी मिसाल मुहब्बत की दी कि कल सुबह बटेर के शिकार को जा रहे थे


मैंने कहा रोज़ जाते हो मगर कभी एक पर भी घर में न आया। बस ग़ुस्से में एक डंडा मेरी पीठ पर रसीद किया
मैं भी दोपहर तक मुँह फुलाए रही और नहीं बोली। तब दौड़े गए
तेल की जलेबियां ले आए
तब मैं बोली


कभी बराबर के जोड़ में लुत्फ़ आता है
कभी एक नर्म और एक गर्म
ज़िंदगी को आरामदेह बना देते हैं।
किसी रांड बेवा के यहाँ एक तोता पला था। वो हर वक़्त उस औरत को मुग़ल्लिज़ात सुनाया करता था। एक दिन उनके यहाँ एक पीर साहब तशरीफ़ लाए। तोते को सुनकर कहने लगे


अरे तेरा तोता बड़ा फ़ह्हाश है
पिंजरा खोल दे
ये उड़ जाये
कहने लगी


रहने दीजिए मियां साहब
घर में मर्दवे की ऐसी बोली तो सुनाई देती है।
कोई शख़्स शराब बहुत पीता था। उसने पादरी के कहे से शराब तर्क कर दी। कुछ दिनों के बाद पादरी साहब अपने पन्द-ओ-नसाइह पर नाज़ करते हुए घर में दाख़िल हुए और पूछा कि कहो
अब तुम्हारे मियां मारधाड़ दंगा फ़साद तो नहीं करते। निहायत मायूसी से कहने लगी


अरे हुज़ूर अब तो वो मियां ऐसे मालूम ही नहीं होते
कोई देखे तो कहे मेहमान तरीक़ घर में आए हैं।
चार्ल्स डिकन्स ने एक शख़्स साइक्स अमे का हाल लिखा है कि वो भी अपनी नेक शरीफ़ ख़स्लत
मेहनती


चाहने वाली बीवी को न सिर्फ़ मारता ही था बल्कि जो कुछ मेहनत मज़दूरी करके वो कमा लाती थी
वो भी शराब में उड़ा देता था और ख़ुद उसमें दुनिया का कोई ऐब न था जो न हो। चोर परले सिरे का था
एक हमदर्द ने उस औरत को मश्वरा दिया कि उसको छोड़ दे। उसने कहा कि अफ़सोस है दुनिया उस की बुराई से वाक़िफ़ है
ख़ूबी से नहीं वाक़िफ़। अब इन बातों के बाद कोई क्या कह सकता है कि कौन मर्द अच्छा है और कौन औरत।


मेरे एक दोस्त एक डिप्टी साहब का हाल बयान करते हैं कि वो दौरे पर थे और मैं उनसे मिलने गया। मालूम हुआ कि डिप्टी साहब ग़ुस्ल फ़रमा रहे हैं। ये बैठे रहे
जब देर हुई तो उन्होंने फिर दरयाफ़्त किया। मालूम हुआ अभी तक ग़ुस्ल में हैं। सरकारी काम था जिसके नातमाम रह जाने में दोनों की बदनामी थी। इस वजह से संग आमद सख़्त आमद इंतज़ार करते रहे। मगर डिप्टी साहब आज निकलने का नाम लेते हैं न कल। उनकी आँतें क़ुल हुवल्लाह पढ़ रही हैं
मगर उनकी बरामदगी की कोई सूरत नहीं दिखाई देती। ख़ैर
कई घंटों के बाद तलबी हुई तो ये क्या देखते हैं कि डिप्टी साहब दफ़्तर की मेज़ के पास कुर्सी पर बड़ी शान से तशरीफ़ फ़र्मा हैं। मिसलों का ढेर लगा है मगर ख़ाली पतलून और खड़ाऊँ पहने बैठे हैं। काँधों पर पतलून की गेल्स अलबत्ता दिखाई देती है। काम पूरा करके जब ये बाहर निकले


न ताब हुई
अर्दली से अनोखी वज़ा का सबब पूछ ही बैठे। मालूम हुआ बेगम को किसी बात पर ग़ुस्सा आगया है। उन्होंने हुक्म दिया कि आज इस मूँडी-काटे को कपड़े न दिए जाएं। ख़्याल तो कीजिए जाड़ों का महीना ख़ेमा की ज़िंदगी लेकिन अगर डिप्टी साहब को ये बातें पसंद हैं तो हम आप बुरा मानने वाले कौन।
पीटर पुंडर ने लिखा है कि स्काटलैंड में मैंने एक शख़्स को देखा कि अपनी बीबी को मारता है
मुझे ऐसा जोश पैदा हुआ कि मैं घर में घुस गया और उस औरत को बचाने लगा


मेरा ये करना था कि दोनों मेरे ऊपर पलट पड़े और मुझको मार के बाहर कर दिया। लीजिए साहब हम तुम राज़ी तो क्या करें क़ाज़ी
ग़ालिब ने कहा है

कभी जो याद भी आता हूँ तो वो कहते हैं


कि आज बज़्म में कुछ फ़ित्ना-ओ-फ़साद नहीं
क्यों साहब
अगर किसी को फ़ित्ना व फ़साद ही वाला शरीक-ए-ज़िंदगी पसंद हो तो हमारी आपकी पसंदीदगी नापसंदीदगी क्या चीज़ है और कौन कह सकता है कि ये बीबी अच्छी और ये बुरी है। अक्सरों को आसपास के घरों से इस तरह की बातें सुनने का इत्तफ़ाक़ हुआ होगा कि अरे
ये हाथ थकें


इलाही तन-तन कोढ़ टपके
मिचमिचाती खाट निकले
तब मेरे दिल में ठंडक पड़े। अड़ोसी पड़ोसी इधर उधर खड़े नफ़रीन कर रहे हैं कि भई क्या बुरे लोग हैं। क्या कुत्ते-बिल्ली की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं
लीजिए साहब शोर-ओ-शग़ब मिट गया। मियां निकल कर अपने काम पर चले गए


बी हमसाई कुछ तो हमदर्दी करने के ख़्याल से और ज़्यादातर टोह लेने को खिड़की की तरफ़ से अंदर दाख़िल हुईं। देखा कि एक तरफ़ का गाल सूजा हुआ है
आँखों की लाली बावजूद मुँह धोने के अभी मिटी नहीं है। हाल तो सब पहले ही से जानती थीं
मगर अंजान बन कर पूछने लगी
ऐ बहन


ये क्या हुआ? जवाब मिला बहन
क्या कहें
आप ही लड़े
आप ही ख़फ़ा हो कर चले गए


खाना भी नहीं खाया
ये देखो वैसे ही रखा है
पान की डिबिया भी नहीं ले गए
दिल कुढ़ता है कि दिनभर बबिन पान के रहेंगे


मुँह साबुन हो जाएगा। लीजिए साहब ये तो गई थीं कि वो मियां की अगर एक बुराई करेंगी तो हम दस करेंगे। वहाँ रंग ही दूसरा देखा। अपना सा मुँह लेकर चली आईं।
एक दूसरे मरहूम दोस्त कहा करते थे कि बीबी के नाज़-ओ-अंदाज़ हर तरह के उठाए जा सकते हैं
लेकिन एक बात नाक़ाबिल-ए-माफ़ी है
वो ये कि ये लोग कभी कभी मर जाती हैं। इसी के मुक़ाबिल ये दूसरा लतीफ़ा सुनिए।


एक साहिब ने बयान किया कि मेरी बीबी दो ही बरस के अंदर दाग़-ए-मुफ़ारक़त दे गईं। ज़रा सा लड़का एक फूसड़ा अपनी निशानी छोड़ गईं। मेरी एक बड़ी साली थीं जो शायद इसी इंतज़ार में पहले ही से रँडापा खे रही थीं। ख़ुशदामन साहिबा कहने लगीं
मियां तुम्हारी साली मौजूद है अगर अक़द करलेते तो मुर्दा रिश्ता फिर ज़िंदा होजाता। मैंने भी सोचा कि अब वो जवान जहाँ न रही तो ये अधेड़ क्या रहेगी
लाओ कर भी लो। लड़के की ख़ाला है
बच्चा भी पल जाएगा


जहेज़ भी अच्छा-ख़ासा हाथ लगेगा। उनके मरने के बाद इंशाअल्लाह तआला अपनी हमसिन ढूंढ कर करलेंगे।
लीजिए साहब अक़द होने को तो हो गया मगर वो आज मरती हैं न कल। वो तो पहले ही से बूढ़ी थीं
मेरे भी दाँत गिर गए
मगर वो जाने का नाम ही नहीं लेतीं। इधर मैं कहीं सफ़र को तैयार हुआ और उधर वो इमाम-ए-ज़ामन लिए ड्यूढ़ी के पास पहुँच गईं। इमाम-ए-ज़ामन की ज़मानत में सौंपा कहो क़बूल किया। जिस तरह पीठ दिखाते जाते हो इसी तरह असल ख़ैर से वापस आकर मुँह दिखाना नसीब हो। उन साहब का बयान है कि बड़ी बीबी के मरने से तो मायूसी हो ही चुकी है। मैंने ये वतीरा इख़्तियार किया है कि इधर इन्होंने इमाम-ए-ज़ामन बाँधा


उधर मैंने भी एक चीथड़ा लेकर उनके दाहिने बाज़ू पर बांध दिया और कहना शुरू किया
“ख़ुदा तुम्हारे साये में हमें परवान चढ़ाए।” वो पोपला मुँह बटुवा सा लेकर हँसने लगीं
हटो भी तुम्हारी मज़ाख़... की बातें कभी न जाएँगी।
अब ज़रा ग़ौर फ़रमाइए। अगर उन साहब को कहीं हमने सलाह दी होती कि बड़ी साली से करलो तो ख़ुदा वास्ते को


हम ही तो बदनाम होते। नहीं साहब इस मुआमले में यही ठीक है कि अपनी अपनी डफ़ली और अपना अपना राग।
मज़ाक़-ए-इश्क़ ये है नुक्ता-चीं न बन नासेह
निगाह मेरी
परख मेरी


आँख मेरी है
जिन्हें नज़र नहीं ऐ आरज़ू वो क्या जानें
ख़ज़फ़ समेटे हैं या मोतियों की ढेरी है?

- chaudhari-mohammad-ali-rudaulvi