आत्मिक अप्रकाशित ग़ज़ल
अप्रकाशित कविता की सार की खोज करें
आत्मिक शायरी की दुनिया में एक अप्रकाशित ग़ज़ल की सुंदरता का अन्वेषण करें, जहां हर पंक्ति कच्ची भावनाओं को व्यक्त करती है और कवितात्मक सौंदर्य को पकड़ती है। आनन्द उठाएं जो शायरी रूप में आत्मिक अप्रकाशित ग़ज़ल की खोज और गहरीयों में अपनी प्रेमिका में जाएं।
न भूला इज़्तिराब-ए-दम-शुमारी इंतिज़ार अपना
कि आख़िर शीशा-ए-साअ'त के काम आया ग़ुबार अपना
ज़ि-बस आतिश ने फ़स्ल-ए-रंग में रंग-ए-दिगर पाया
चराग़-ए-गुल से ढूँढे है चमन में शम्अ' ख़ार अपना
असीर-ए-बे-ज़बाँ हूँ काश के सय्याद-ए-बे-पर्वा
ब-दाम-ए-जौहर-ए-आईना हो जावे शिकार अपना
मगर हो माने-ए-दामन-कुशी ज़ौक़-ए-ख़ुद-आराई
हुआ है नक़्श-बंद आईना-ए-संग-ए-मज़ार अपना
दरेग़ ऐ ना-तवानी वर्ना हम ज़ब्त-आश्नायाँ ने
तिलिस्म-ए-रंग में बाँधा था अहद-ए-उस्तुवार अपना
अगर आसूदगी है मुद्दआ'-ए-रंज-ए-बेताबी
नियाज़-ए-गर्दिश-ए-पैमाना-ए-मै रोज़गार अपना
'असद' हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं
कि है सर-पंजा-ए-मिज़्गान-ए-आहू पुश्त-ख़ार अपना
कि आख़िर शीशा-ए-साअ'त के काम आया ग़ुबार अपना
ज़ि-बस आतिश ने फ़स्ल-ए-रंग में रंग-ए-दिगर पाया
चराग़-ए-गुल से ढूँढे है चमन में शम्अ' ख़ार अपना
असीर-ए-बे-ज़बाँ हूँ काश के सय्याद-ए-बे-पर्वा
ब-दाम-ए-जौहर-ए-आईना हो जावे शिकार अपना
मगर हो माने-ए-दामन-कुशी ज़ौक़-ए-ख़ुद-आराई
हुआ है नक़्श-बंद आईना-ए-संग-ए-मज़ार अपना
दरेग़ ऐ ना-तवानी वर्ना हम ज़ब्त-आश्नायाँ ने
तिलिस्म-ए-रंग में बाँधा था अहद-ए-उस्तुवार अपना
अगर आसूदगी है मुद्दआ'-ए-रंज-ए-बेताबी
नियाज़-ए-गर्दिश-ए-पैमाना-ए-मै रोज़गार अपना
'असद' हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं
कि है सर-पंजा-ए-मिज़्गान-ए-आहू पुश्त-ख़ार अपना
- mirza-ghalib
मैं हूँ मुश्ताक़-ए-जफ़ा मुझ पे जफ़ा और सही
तुम हो बेदाद से ख़ुश इस से सिवा और सही
ग़ैर की मर्ग का ग़म किस लिए ऐ ग़ैरत-ए-माह
हैं हवस-पेशा बहुत वो न हो और सही
तुम हो बुत फिर तुम्हें पिंदार-ए-ख़ुदाई क्यों है
तुम ख़ुदावंद ही कहलाओ ख़ुदा और सही
हुस्न में हूर से बढ़ कर नहीं होने के कभी
आप का शेवा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा और सही
तेरे कूचे का है माइल दिल-ए-मुज़्तर मेरा
का'बा एक और सही क़िबला-नुमा और सही
कोई दुनिया में मगर बाग़ नहीं है वा'इज़
ख़ुल्द भी बाग़ है ख़ैर आब-ओ-हवा और सही
क्यों न फ़िरदौस में दोज़ख़ को मिला लें यारब
सैर के वास्ते थोड़ी सी फ़ज़ा और सही
मुझ को वो दो कि जिसे खा के न पानी माँगूँ
ज़हर कुछ और सही आब-ए-बक़ा और सही
मुझ से 'ग़ालिब' ये 'अलाई' ने ग़ज़ल लिखवाई
एक बेदाद-गर-ए-रंज-फ़िज़ा और सही
तुम हो बेदाद से ख़ुश इस से सिवा और सही
ग़ैर की मर्ग का ग़म किस लिए ऐ ग़ैरत-ए-माह
हैं हवस-पेशा बहुत वो न हो और सही
तुम हो बुत फिर तुम्हें पिंदार-ए-ख़ुदाई क्यों है
तुम ख़ुदावंद ही कहलाओ ख़ुदा और सही
हुस्न में हूर से बढ़ कर नहीं होने के कभी
आप का शेवा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा और सही
तेरे कूचे का है माइल दिल-ए-मुज़्तर मेरा
का'बा एक और सही क़िबला-नुमा और सही
कोई दुनिया में मगर बाग़ नहीं है वा'इज़
ख़ुल्द भी बाग़ है ख़ैर आब-ओ-हवा और सही
क्यों न फ़िरदौस में दोज़ख़ को मिला लें यारब
सैर के वास्ते थोड़ी सी फ़ज़ा और सही
मुझ को वो दो कि जिसे खा के न पानी माँगूँ
ज़हर कुछ और सही आब-ए-बक़ा और सही
मुझ से 'ग़ालिब' ये 'अलाई' ने ग़ज़ल लिखवाई
एक बेदाद-गर-ए-रंज-फ़िज़ा और सही
- mirza-ghalib
पानी से सग-गज़ीदा डरे जिस तरह 'असद'
डरता हूँ आइने से कि मर्दुम-गज़ीदा हूँ
डरता हूँ आइने से कि मर्दुम-गज़ीदा हूँ
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