आत्मिक अप्रकाशित शेर

अप्रकाशित कविता की सार की खोज

आत्मिक शायरी के माध्यम से अप्रकाशित शेर की सुंदरता की खोज करें, जहां प्रत्येक पंक्ति कच्ची भावनाओं को व्यक्त करती है और कवितात्मक सौंदर्य को पकड़ती है। आनंद उठाएं जो शायरी रूप में आत्मिक अप्रकाशित शेर की खोज और गहरीयों में अपनी प्रेमिका में जाएं।

ज़ख़्म-ए-दिल तुम ने दिखाया है कि जी जाने है
ऐसे हँसते को रुलाया है कि जी जाने है

- mirza-ghalib


याद आया जो वो कहना कि नहीं वाह ग़लत
की तसव्वुर ने ब-सहरा-ए-हवस राह ग़लत

- mirza-ghalib


तर्ज़-ए-बे-दिल में रेख़्ता कहना
असद अल्लाह ख़ाँ क़यामत है

- mirza-ghalib


शमशीर साफ़ यार जो ज़हराब दादा हो
वो ख़त सब्ज़ है कि ब रुख़्सार सादा हो

- mirza-ghalib


सबा लगा वो तपाँचे तरफ़ से बुलबुल की
कि रू-ए-ग़ुंचा-ए-गुल सू-ए-आश्याँ फिर जाए

- mirza-ghalib


नियाज़-ए-इश्क़ ख़िर्मन-सोज़-ए-अस्बाब-ए-हवस बेहतर
जो हो जावे निसार-ए-बर्क़ मुश्त-ए-ख़ार-ओ-ख़स बेहतर

- mirza-ghalib


मिले दो मुर्शिदों को क़ुदरत-ए-हक़ से हैं दो तालिब
निज़ाम-उद्दीन को ख़ुसरव सिराज-उद्दीन को ग़ालिब

- mirza-ghalib


मस्जिद के ज़ेर-ए-साया इक घर बना लिया है
ये बंदा-ए-कमीना हम-साया-ए-ख़ुदा है

- mirza-ghalib


ख़ुशी जीने की क्या मरने का ग़म क्या
हमारी ज़िंदगी क्या और हम क्या

- mirza-ghalib


जिस दिन से कि हम ग़म-ज़दा ज़ंजीर बपा हैं
कपड़ों में जवीं बख़िये के टाँकों से सिवा हैं

- mirza-ghalib


इन दिल-फ़रेबियों से न क्यूँ उस पे प्यार आए
रूठा जो बे-गुनाह तो बे-उज़्र मन गया

- mirza-ghalib


हँसते हैं देख देख के सब ना-तवाँ मुझे
ये रंग ज़र्द है चमन ज़ाफ़राँ मुझे

- mirza-ghalib


देखता हूँ उसे थी जिस की तमन्ना मुझ को
आज बेदारी में है ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा मुझ को

- mirza-ghalib


दम-ए-वापसीं बर-सर-राह है
अज़ीज़ो अब अल्लाह ही अल्लाह है

- mirza-ghalib


बुतो तौबा करो तुम क्या हो जब ए'तिबार आता है
तू यूसुफ़ सा हसीं बिकने सर-ए-बाज़ार आता है

- mirza-ghalib


ज़रा कर ज़ोर सीने पर कि तीर-ए-पुर-सितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले जो दिल निकले तो दम निकले

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वो बात चाहते हो कि जो बात चाहिए
साहब के हम-नशीं को करामात चाहिए

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वली-अहदी में शाही हो मुबारक
इनायात-ए-इलाही हो मुबारक

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तुम सलामत रहो क़यामत तक
दौलत-ओ-इज़्ज़-ओ-जाह रोज़-अफ़्ज़ूँ

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तिमसाल-ए-जल्वा अर्ज़ कर ऐ हुस्न कब तलक
आईना-ए-ख़याल को देखा करे कोई

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थका जब क़तरा-ए-बे-दस्त-ओ-पा बाला दवीदन से
ज़-बहर-ए-यादगारी-हा गिरह देता है गौहर की

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था तो ख़त पर न था जवाब-तलब
कोई उस का जवाब क्या लिखता

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ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होने तक

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तहरीर है ये 'ग़ालिब'-ए-यज़्दाँ-परस्त की
तारीख़ उस की आज नौवीं है अगस्त की

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सिनीन-ए-उम्र के सत्तर हुए शुमार बरस
बहुत जियूँ तो जियूँ और तीन चार बरस

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