लगती नहीं है गर्मी-सर्दी ...
क्यों क़फ़स में इधर-उधर देखें ...
कोई तितली नहीं बताती है ...
कोई दुकाँ न ख़रीदार देख सकता हूँ ...
कोई दरवाज़े पे बैठा नहीं देखा जाता ...
किसी ने न जब देखा-भाला मुझे ...
ख़ुदा को भूलना आसान है ...
ख़ौफ़ मंजधार से जो खाता है ...
कर रहे हैं दवा ख़याल कई ...
कैसे तेवर हैं अब हवा के देख ...
कहीं से जब कोई आवाज़ आई ...
कभी आवाज़ दे इक बार कोई ...
जो लिखा है वही पढ़ा है अभी ...
जो कहा वो नहीं किया उस ने ...
जो चूज़े आशियाने में मरे हैं ...
जो चिड़िया मेरे घर आ जा रही थी ...
जो बनेगा वही बनाना है ...
जिसे बोला था काँटे तोड़ डाले ...
जिन्हें हम याद कर के रो रहे हैं ...
जीने लगता है ज़िंदगी के बग़ैर ...