जुज़ अंधेरे के न कुछ शब के ख़ज़ाने से मिला ...
हज़ार बच के चले हर तरह से दूर किया ...
चमन से दूर हवा की अमान से बाहर ...
चल रहे हैं एक ही जानिब को दरिया और हम ...
चाह कर भी तुझे हम तेरे शनासा न हुए ...
बहुत बड़ा नहीं घर खिड़कियाँ कुशादा नहीं ...
आदमी आज भी सद-हैफ़ कि इंसान नहीं ...
मादर-ए-हिन्द के माथे की शिकन दूर हुई ...
मिरे ख़याल पे जैसे कि छा गए हो तुम ...
गुल-ए-रा'ना-ओ-दिल-आरा थी लक्ष्मी ...
हिन्द माता की एक बेटी ...
दिल की वहशत को इक ज़माना हुआ ...
कितना गम्भीर घटा-टोप अँधेरा है यहाँ ...
तस्लीम उन आँखों का एजाज़-ए-मसीहाई ...
क़रनों पुराना वक़्त को ललकारता हुआ ...
न तेरी शक्ल से वाक़िफ़ न तेरी बास से लोग ...
मैं ने कब चाहा मुरादों का सफ़र ऐसा न हो ...
खड़े हैं सामने अहबाब अजगरों की तरह ...
कल आसमान जैसे कोई शो'ला-ज़ार था ...
हस्सास दिल था शर्म से नम-दीदा हो गया ...