फ़लक ये जौर-ओ-सितम मुझ से ना-तवाँ के लिए

फ़लक ये जौर-ओ-सितम मुझ से ना-तवाँ के लिए
मैं ही था क्या तिरे ज़ुल्मों के इम्तिहाँ के लिए

दिल आशिक़ों के थे पामाली-ए-बुताँ के लिए
न जौर-ए-ग़ैर-ओ-जफ़ा-हा-ए-आसमाँ के लिए

मैं मुस्तइद हूँ अगर नाला-ओ-फ़ुग़ाँ के लिए
तो कुछ से कुछ अभी हो जाए आसमाँ के लिए

फँसा के यार की ज़ुल्फ़ों में हम ने दिल देखो
ख़रीदी और बला एक अपनी जाँ के लिए

सितम है फ़स्ल-ए-बहारी में बाग़बाँ का हुक्म
न होए बाग़ में बुलबुल को आशियाँ कै लिए

कहेगा नासेहा क्या फ़ाएदे की तू मेरे
हुए हैं ख़ल्क़ ही आशिक़ फ़क़त ज़ियाँ कै लिए

न ख़र्च बा-ख़ुदा उम्र-ए-अज़ीज़ अपनी कर
मिला नहीं तुझे ये नक़्द राएगाँ के लिए

यहाँ हैं टुकड़े जिगर मह-वशों के बे-देखे
ये बात कब है मयस्सर भला कताँ के लिए

हमारा रोकना अच्छा नहिं है सुन लेना
एक और रोज़ बुरा होगा पासबाँ कै लिए

न होए क्यूँ दर-ए-असनाम सज्दा-गह अपना
जबीं बनी है बुतों ही के आस्ताँ के लिए

बसा है दिल के मिरे क़स्र में तसव्वुर-ए-यार
मकीन था ये सज़ा-वार इस मकाँ के लिए

सुना के क़िस्सा-ए-ग़म अपना उस को अपने ही
दिल-ओ-जिगर ने मज़े ग़म की दास्ताँ के लिए

उसे तो रोज़ बहाने को चाहिएँ दरिया
कहाँ से लाऊँ मैं उस चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ के लिए

नहीं तो बर-सर-ए-हर-मुद्दआ' है सौ सौ बार
पर इक ज़बान जो हिलती नहीं सो हाँ कै लिए

छुपा रहे न रुख़-ए-यार ज़ुल्फ़ में क्यूँ-कर
तक़य्या फ़र्ज़ है मोमिन को हिफ़्ज़-ए-जाँ के लिए

सुना जो मद्ह भी कीजे तो कीजे ऐसे की
कि जिस की मद्ह हो फ़ख़्र अहल-ए-आसमाँ के लिए

न ये कि हर कस-ओ-ना-कस के भाट जाइए बन
पए-उमीद-ए-ज़र-ए-नक़्द-ओ-हिर्स-ए-नाँ के लिए

नहीं है मद्ह किसी के लिए यहाँ ज़ेबा
जो है तो है नबी-ए-आख़िरुज़-ज़माँ के लिए

वो वो है नाम ज़बाँ पर गर उस का आ जावे
तो लज़्ज़त और ही हासिल हो काम-ओ-जाँ के लिए

वो वो है नाम-ए-ख़ुदा देखो जिस का ज़र्रा-ए-लुत्फ़
फ़रोग़-बख़्श है इस तीरा-ख़ाक-दाँ के लिए

उसी के है रुख़-ए-अनवर से ये जहाँ रौशन
उसी से नूर है ख़ुर्शीद-ए-आसमाँ के लिए

वो कौन सरवर-ए-आलम मोहम्मद-ए-अरबी
कि जिस की ज़ात से है फ़ैज़ दो-जहाँ के लिए

अता किया है ख़ुदा ने वो हाँ उसे दिल-ओ-दस्त
कि जिस से पहुँचे है इमदाद बहर-ओ-काँ के लिए

कलीद-ए-क़ुफ़्ल-ए-दर-ए-आरज़ू हैं उस की भवें
बिला-मुबालग़ा कहता हूँ इंस-ओ-जाँ के लिए

इताअ'त उस की ज़ख़ीरा है बस सआ'दत का
यहाँ के वास्ते और मुल्क-ए-जावेदाँ के लिए

वो जो ज़बान कि हो उस की मद्ह से साकित
मजाल-ए-नुत्क़ न हो 'ऐश' उस ज़बाँ के लिए


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