दर्द दिल का उभर न जाए कहीं ...
बना रहा हूँ मैं फ़ेहरिस्त छोटे लोगों की
फिर से हसीन वक़्त की बस्ती में आ गए ...
कहोगे तुम नहीं जितना वो अब उतना समझता है ...
हैं दरीचे न खिड़कियाँ घर में ...
धूप से तपते सफ़र में छाँव की बातें भली ...
चलेगी जब मोहब्बत की कभी चर्चा मिरे पीछे ...
हाथ भर दूरी पे है क़िस्मत की चाबी आप की
शब थी नज़र में शाम से पहले ...
आह असर हो गई तो क्या होगा ...
वो अदा फ़रेब-ए-महफ़िल वो नज़र बला-ए-जाँ है ...
सूरत-ए-गर्दिश-ए-हालात बदलती ही नहीं ...
रफ़ू-ए-दामन-ए-सद-तार-तार रहने दे ...
क़रार दिल को कहाँ बे-क़रार दिल ही तो है ...
फूल अश्कों के इन आँखों से पिरो भी न सके ...
माना कि उसे हम से कभी प्यार नहीं था ...
क्या कम है ये भी वा'दा-ए-फ़र्दा किया तो है ...
किया जो 'अह्द कि उस से कभी मिलूँ भी नहीं ...
जो दम के साथ थे कल तक कभी जुदा भी न थे ...
गिला उसे है अगर आ के रू-ब-रू तो करे ...