पठानिस्तान

Shayari By

“ख़ू, एक दम जल्दी बोलो, तुम कौन ऐ?”
“मैं... मैं...”

“ख़ू शैतान का बच्चा जल्दी बोलो... इंदू ऐ या मुस्लिमीन?”
“मुस्लिमीन।” [...]

ओवर कोट

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जनवरी की एक शाम को एक ख़ुशपोश नौजवान डेविस रोड से गुज़र कर माल रोड पर पहुँचा और चेरिंग क्रास का रुख़ कर के ख़रामाँ ख़रामाँ पटरी पर चलने लगा। ये नौजवान अपनी तराश ख़राश से ख़ासा फ़ैशनेबल मालूम होता था। लंबी लंबी क़लमें, चमकते हुए बाल, बारीक बारीक मूंछें गोया सुरमे की सलाई से बनाई गई हूँ। बादामी रंग का गर्म ओवर कोट पहने हुए जिसके काज में शरबती रंग के गुलाब का एकाध खिला फूल अटका हुआ, सर पर सब्ज़ फ़्लैट हैट एक ख़ास अंदाज़ से टेढ़ी रखी हुई, सफ़ेद सिल्क का गुलूबंद गले के गिर्द लिपटा हुआ, एक हाथ कोट की जेब में, दूसरे में बेद की एक छोटी छड़ी पकड़े हुए जिसे कभी कभी मज़े में आ के घुमाने लगता था।
ये हफ़्ते की शाम थी। भरपूर जाड़े का ज़माना। सर्द और तुंद हवा किसी तेज़ धार की तरह जिस्म पर आ के लगती थी मगर उस नौजवान पर उसका कुछ असर मालूम नहीं होता था और लोग ख़ुद को गर्म करने के लिए तेज़ क़दम उठा रहे थे मगर उसे उसकी ज़रूरत न थी जैसे इस कड़कड़ाते जाड़े में उसे टहलने में बड़ा मज़ा आ रहा हो।

उसकी चाल ढाल से ऐसा बांकपन टपकता था कि तांगे वाले दूर ही से देख कर सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए उसकी तरफ़ लपकते मगर वो छड़ी के इशारे से नहीं कर देता। एक ख़ाली टैक्सी भी उसे देख कर रुकी मगर उसने नो थैंक यू कह कर उसे भी टाल दिया।
जैसे जैसे वो मॉल के ज़्यादा बा-रौनक हिस्से की तरफ़ पहुँचता जाता था, उसकी चोंचाली बढ़ती जाती थी। वो मुँह से सीटी बजा के रक़्स की एक अंग्रेज़ी धुन निकालने लगा। उसके साथ ही उसके पाँव भी थिरकते हुए उठने लगे। एक दफ़ा जब आस पास कोई नहीं था तो यकबारगी कुछ ऐसा जोश आया कि उसने दौड़ कर झूट मूट बल देने की कोशिश की, गोया क्रिकेट का खेल हो रहा हो। रास्ते में वो सड़क आई जो लरैंस गार्डन की तरफ़ जाती थी मगर उस वक़्त शाम के धुंदलके और सख़्त कोहरे में उस बाग़ पर कुछ ऐसी उदासी बरस रही थी कि उसने उधर का रुख़ न किया और सीधा चेरिंग क्रास की तरफ़ चलता रहा। [...]

बाँझ

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मेरी और उसकी मुलाक़ात आज से ठीक दो बरस पहले अपोलोबंदर पर हुई। शाम का वक़्त था, सूरज की आख़िरी किरनें समुंदर की उन दराज़ लहरों के पीछे ग़ायब हो चुकी थी जो साहिल के बेंच पर बैठ कर देखने से मोटे कपड़े की तहें मालूम होती थीं। मैं गेट आफ़ इंडिया के उस तरफ़ पहला बेंच छोड़ कर जिस पर एक आदमी चम्पी वाले से अपने सर की मालिश करा रहा था, दूसरे बेंच पर बैठा था और हद्द-ए-नज़र तक फैले हुए समुंदर को देख रहा था।
दूर बहुत दूर जहां समुंदर और आसमान घुल मिल रहे थे। बड़ी बड़ी लहरें आहिस्ता आहिस्ता उठ रही थीं और ऐसा मालूम होता था कि बहुत बड़ा गदले रंग का क़ालीन है जिसे इधर से उधर समेटा जा रहा है।

साहिल के सब क़ुमक़ुमे रोशन थे जिनका अक्स किनारे के लर्ज़ां पानी पर कपकपाती हुई मोटी लकीरों की सूरत में जगह जगह रेंग रहा था। मेरे पास पथरीली दीवार के नीचे कई कश्तियों के लिपटे हुए बादबान और बांस हौले-हौले हरकत कर रहे थे। समुंदर की लहरें और तमाशाइयों की आवाज़ एक गुनगुनाहट बन कर फ़िज़ा में घुली हुई थी। कभी कभी किसी आने या जाने वाली मोटर के हॉर्न की आवाज़ बुलंद होती और यूं मालूम होता कि बड़ी दिलचस्प कहानी सुनने के दौरान में किसी ने ज़ोर से “हूँ” की है।
ऐसे माहौल में सिगरेट पीने का बहुत मज़ा आता है। मैंने जेब में हाथ डाल कर सिगरेट की डिबिया निकाली, मगर माचिस न मिली। जाने कहाँ भूल आया था। सिगरेट की डिबिया वापस जेब में रखने ही वाला था कि पास से किसी ने कहा, “माचिस लीजिएगा।” [...]

बाँझ

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मेरी और उसकी मुलाक़ात आज से ठीक दो बरस पहले अपोलोबंदर पर हुई। शाम का वक़्त था, सूरज की आख़िरी किरनें समुंदर की उन दराज़ लहरों के पीछे ग़ायब हो चुकी थी जो साहिल के बेंच पर बैठ कर देखने से मोटे कपड़े की तहें मालूम होती थीं। मैं गेट आफ़ इंडिया के उस तरफ़ पहला बेंच छोड़ कर जिस पर एक आदमी चम्पी वाले से अपने सर की मालिश करा रहा था, दूसरे बेंच पर बैठा था और हद्द-ए-नज़र तक फैले हुए समुंदर को देख रहा था।
दूर बहुत दूर जहां समुंदर और आसमान घुल मिल रहे थे। बड़ी बड़ी लहरें आहिस्ता आहिस्ता उठ रही थीं और ऐसा मालूम होता था कि बहुत बड़ा गदले रंग का क़ालीन है जिसे इधर से उधर समेटा जा रहा है।

साहिल के सब क़ुमक़ुमे रोशन थे जिनका अक्स किनारे के लर्ज़ां पानी पर कपकपाती हुई मोटी लकीरों की सूरत में जगह जगह रेंग रहा था। मेरे पास पथरीली दीवार के नीचे कई कश्तियों के लिपटे हुए बादबान और बांस हौले-हौले हरकत कर रहे थे। समुंदर की लहरें और तमाशाइयों की आवाज़ एक गुनगुनाहट बन कर फ़िज़ा में घुली हुई थी। कभी कभी किसी आने या जाने वाली मोटर के हॉर्न की आवाज़ बुलंद होती और यूं मालूम होता कि बड़ी दिलचस्प कहानी सुनने के दौरान में किसी ने ज़ोर से “हूँ” की है।
ऐसे माहौल में सिगरेट पीने का बहुत मज़ा आता है। मैंने जेब में हाथ डाल कर सिगरेट की डिबिया निकाली, मगर माचिस न मिली। जाने कहाँ भूल आया था। सिगरेट की डिबिया वापस जेब में रखने ही वाला था कि पास से किसी ने कहा, “माचिस लीजिएगा।” [...]

तोतली शहज़ादी

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शमा, नन्ही मुनी प्यारी सी लड़की थी। ख़ूबसूरत गोल गोल आँखें, सेब जैसे होंट और अनार की तरह उसका सुर्ख़ रंग था। वो आँखें झपक कर बातें करती। उसका चेहरा हर वक़्त मुस्कुराता रहता था। हंसते हंसते उसका बुरा हाल हो जाता और उसकी अक्सर हिचकी बंध जाती। इस मौक़ा पर उसकी अम्मी उसे मिस्री की एक डली देतीं। शमा उसे मुँह में डाल कर चूसने लगती और साथ साथ अपनी अम्मी से मीठी मीठी बातें भी करती।
शमा की ज़बान मोटी थी। वो लफ़्ज़ आसानी से ना बोल सकती थी। वो लफ़्ज़ आसानी से ना बोल सकती थी। इसलिए सब उसे तोतली शहज़ादी कहते थे। वो तुत, बुत, ज़बान में बातें करती, तो हर एक को उस पर बे-इख़्तियार प्यार जाता। उसकी सहेलियाँ कहतीं ‘‘शमा तुम बड़ी ख़ुश-क़िस्मत हो तुम्हें तो खाने को मिस्री की डलियां मिलती रहती हैं।’’ शमा ये सुनकर फूली ना समाती और अपनी तोतली ज़बान में पहाड़े दोहराना शुरू कर देती

‘‘अत्त दूनी दूनी, दो दूनी चार तिन दूनी तय, ताल दूनी अथ’’ वो तीसरी जमात में पढ़ती थी, मगर उसे सब पहाड़े याद थे। अंग्रेज़ी की नज़्में भी उसे आती थीं। वो अपनी मैना को ये नज़्में सुनाती और दिल ही दिल में बहुत ख़ुश होती। उनका घर एक पहाड़ी पर था एक शाम वो अपनी गुड़िया के साथ सैर के लिए बाहर निकली, तो दरख़्त की ओट में एक बोना छिपा हुआ था तोतली शहज़ादी को देखते ही वो सामने आगया, उस के सर पर एक हैट था, जिस पर चिड़ियों का घोंसला बना हुआ था। उसे देखकर तोतली शहज़ादी की हंसी निकल गई। हंसते हंसते उसे हिचकी आगई और वो लोट-पोट हो कर ज़मीन पर गिर गई। बौना दौड़ा दौड़ा उस के पास आगया, तोतली शहज़ादी अभी तक हंस रही थी। बौने ने ये हाल देखा तो उसकी भी हंसी निकल गई। वो शहज़ादी से कुछ पूछना चाहता था कि उसे भी हिचकी आगई
शहज़ादी ने मिस्री की डली मुँह में डाली और बौने से पूछा [...]

एक भूत दो जिन्न

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साक़िब बहुत ही मेहनती लड़का था। वो अपने स्कूल का काम दिल लगा कर करता और शाम को अपने ग़रीब बाप का हाथ बटाने के लिए दुकान पर बैठ जाता। उसने एक ख़ूबसूरत मैना पाल रखी थी। ये मैना उस से बड़ी मीठी मीठी, प्यारी प्यारी बातें करती। साक़िब अपनी भोली मैना से कहता ‘‘मैं तुम्हें एक ना एक दिन दुनिया की सैर कराऊँगा साक़िब के दिल की ख़्वाहिश थी कि घर और दुकान के अलावा दुनिया की और चीज़ें भी उसे देखने को मिलें। आख़िर एक दिन इसी इरादे से वो अपनी मैना को साथ लेकर निकल खड़ा हुआ। उसने थोड़ा सा पनीर भी ले लिया, ताकि सफ़र के दौरान काम आजाए। वो अपनी मैना के पिंजरे को उठाए दूर बहुत दूर तक निकल गया शाम हुई, तो साक़िब को रात गुज़ारने का ख़्याल आया। उसने पहाड़ पर एक झोंपड़ी देखी। वो बड़ी मुश्किल से पहाड़ की चोटी पर पहुंचा। जूं ही वो झोंपड़ी में दाख़िल हुआ, उस की मुलाक़ात एक भूत से हो गई। ये झोंपड़ी उसी भूत की थी।
साक़िब को नए नए दोस्त बनाने का बहुत शौक़ था। उस ने दोस्ताना लहजे में इस लंबे तड़ंगे भूत से कहा ‘‘आदाब अर्ज़ करता हूँ। मैं ज़रा सैर को निकला हूँ, आईए आप भी मेरे साथ चलिए।’’ भूत गरजदार आवाज़ में बोला चल-बे ओ, कमज़ोर और दुबले पतले इन्सान, मैं क्यों तुम्हारे साथ जाऊँ।’’

साक़िब ने कहा: ‘‘मैं देखने में दुबला पतला ज़रूर हूँ, मगर इतना भी कमज़ोर नहीं, जितना तुम समझ रहे हो।’’
इस पर भूत हंसा उस ने एक भारी पत्थर उठाया और अपने बड़े बड़े हाथों में पकड़ कर इस ज़ोर से भींचा कि उस में से पानी निकलने लगा। फिर उस ने साक़िब से सवाल किया। [...]

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