क़ुर्बानी का जानवर

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ज़फ़र भौंचक्का बैठा था। आयशा ने ​िसवय्यों का प्याला हाथ में देते हुए पूछा, ‘‘फिर क्या कहा मैडम ने?’’
‘‘कहा कि लड़का 14-13 साल का हो। किसी अच्छे घर का हो, घरेलू काम-काज का थोड़ा-बहुत तजुर्बा हो। आँख न मिलाता हो। साफ़-सुथरा रहता हो, तनख़्वाह ज़ियादा न माँगे। नाग़ा न करे। महीने पीछे पगार और रोज़ाना तीन वक़्त का खाना भी तो मिलेगा।’’

‘‘फिर?’’
‘‘फिर क्या?’’ [...]

गूँदनी

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मिर्ज़ा बिर्जीस क़द्र को में एक अर्से से जानता हूँ। हर-चंद हमारी तबीअतों और हमारी समाजी हैसियतों में बड़ा फ़र्क़ था। फिर भी हम दोनों दोस्त थे। मिर्ज़ा का तअल्लुक़ एक ऐसे घराने से था जो किसी ज़माने में बहुत मुअज्ज़िज़ और मुतमव्विल समझा जाता था मगर अब उसकी हालत उस पुराने तनावर दरख़्त की सी हो गई थी जो अंदर ही अंदर खोखला होता चला जाता है और आख़िर एक दिन अचानक ज़मीन पर आ रहता था। मिर्ज़ा इस में ज़रा सी कोताही भी न होने देता था। उसके दिल में न जाने क्यों ये ख़याल बैठ गया था कि ख़ानदान उनका वक़ार क़ायम रखने के लिए दुरुश्त मिज़ाजी और तहक्कुम लाज़िमी हैं। इस ख़याल ने उसे सख़्त दिल बना दिया था मगर ये दुरुश्ती ऊपर थी अंदर से मिर्ज़ा बड़ा नर्म था और यही हमारी दोस्ती की बुनियाद थी। एक दिन सह पहर को मैं और बिर्जीस क़द्र अनारकली में उनकी शानदार मोटर में बैठे एक मशहूर जूते वाले की दूकान से सलीम शाही जूता ख़रीद रहे थे। मिर्ज़ा ने अपना ठाठ दिखाने के लिए ये ज़रूरी समझा था कि मोटर में बैठे-बैठे दुकान के मालिक को पुकारे और जूते अपनी मोटर ही में मुलाहिज़ा करे। शहर में अभी मिर्ज़ा की साख क़ायम थी और दुकानदार आम तौर पर उसकी ये अदाएँ सहने के आदी थे चुनांचे जूते वाले ने अपने दो कारिंदे मिर्ज़ा की ख़िदमत पर मामूर कर दिए मगर मिर्ज़ा को कोई जूता पसंद नहीं आ रहा था और वो बार-बार नाक भौं चढ़ा कर उन कारिंदों को सख़्त सुस्त कह रहा था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मिर्ज़ा को दर-अस्ल जूते की ज़रूरत ही नहीं और ये झूट-मूट की ख़रीदारी महज़ भरम रखने के लिए है।
ऐन उस वक़्त एक बुढ्ढा भिकारी एक पाँच साला लड़की के कंधे पर हाथ रखे मिर्ज़ा की मोटर के पास आ खड़ा हुआ। ये बुढ्ढा अंधा था। लड़की के बालों में तिनके उलझे हुए थे। मालूम होता था मुद्दत से कंघी नहीं की गई। दोनों के तन पर चीथड़े लगे थे। अंधे पर तरस खाओ बाबा। बुड्ढे ने हाँक लगाई। बाबू जी मैं भूकी हूँ। पैसा दो। लड़की ने लजाजत से कहा। मिर्ज़ा ने उन लोगों की तरफ़ तवज्जो न की। वो बदस्तूर जूतों पर तन्क़ीद करता रहा। अंधे फ़क़ीर और लड़की ने अपना सवाल दोहराया। इस पर मिर्ज़ा ने एक निगाह ग़लत-अंदाज़ उन पर डाली और कहा। माफ़ करो, माफ़ करो। भिकारी अब भी न टले। बाबू जी रात से कुछ नहीं खाया। अंधे ने कहा, बाबू जी बड़ी भूक लग रही है, पेट में कुछ नहीं लो देखो। बच्ची ने कहा और झट मैला कुचैला कुर्ता उठा कर अपना पेट दिखाने लगी। लाग़री से बच्ची की पसलियाँ बाहर निकली हुई थीं और गिनी जा सकती थीं। बस एक पैसे के चने बाबू जी... मिर्ज़ा को उस लड़की का मैला मैला पेट देखकर घिन्न सी आई। तौबा तौबा उसने बे-ज़ारी के लहजे में कहा, भीक मांगने के लिए क्या-क्या ढंग रचाए जाते हैं। जाओ जाओ, बाबा ख़ुदा के लिए माफ़ करो... मगर फ़क़ीर अब भी न गए। क़रीब था कि मिर्ज़ा ग़ुस्से से भन्ना जाता मगर ये तमाशा इस तरह ख़त्म हो गया कि मिर्ज़ा को उस दुकानदार का कोई जूता पसंद न आया और वो अपनी मोटर वहाँ से बढ़ा ले गया।

इस वाक़ए के चंद रोज़ बाद मैं और मिर्ज़ा बिर्जीस क़द्र शहर के एक बड़े सिनेमा में एक देसी फ़िल्म देख रहे थे। फ़िल्म बहुत घटिया थी, उसमें बड़े नुक़्स थे मगर हीरोइन में बड़ी चनक मनक थी और गाती भी ख़ूब थी। उसने फ़िल्म के बहुत से उयूब पर पर्दा डाल दिया था। कहानी बड़ी दक़ियानूसी थी। उसमें एक वाक़िया ये भी था कि बैंक के चपरासी को इस इल्ज़ाम में कि उसने बैंक लूटने में चोरों की मदद की, पाँच साल क़ैद की सज़ा हो जाती है। उस चपरासी की बीवी मर चुकी है मगर उसका एक चार साला बेटा है जो अपनी बूढ़ी दादी के पास रहता है। चपरासी के क़ैद हो जाने पर ये दादी-पोता भूकों मरने लगते हैं। उधर कोठरी का किराया न मिलने पर मालिक मकान उन्हें घर से निकाल देता है। बुढ़िया पोते का हाथ पकड़ कर बाज़ार में भीक मांगने लगती है। वो हर राहगीर से कहती है, बाबू जी हम भूके हैं। एक पैसे के चने ले दो बाबू जी। लड़का कहता है। जब फ़िल्म इस मुक़ाम पर पहुंची तो मिर्ज़ा बिर्जीस क़द्र ने अंधेरे में मुझसे कहा, बया ज़रा अपना रूमाल तो देना, न जाने मेरा कहाँ गिर गया। मैं ने अपना रूमाल दे दिया। जब तक तमाशा होता रहा मैंने मिर्ज़ा को सख़्त बेचैन देखा। वो बार-बार कुर्सी पर पहलू बदलता और हाथ चेहरे तक ले जाता। ख़ुदा ख़ुदा कर के फ़िल्म ख़त्म हुई तो मैं ने देखा वो जल्दी जल्दी आँखें पोंछ पोंछ रहा है। ईं, मिर्ज़ा साहिब! मेरे मुँह से बे-इख़्तियार निकला, आप रो रहे थे।
नहीं तो। मिर्ज़ा ने भर्राई हुई आवाज़ में झूट बोलते हुए कहा, आँखों को ज़रा सिगरेट का धुआँ लग गया था और भई मैं ये सोच रहा हूँ कि सरकार ऐसे दर्दनाक फ़िल्म दिखाने की इजाज़त क्यों देती है। [...]

कतबा

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शहर से कोई डेढ़ दो मील के फ़ासले पर पर फ़िज़ा बाग़ों और फुलवारियों में घिरी हुई क़रीब क़रीब एक ही वज़ा की बनी हुई इमारतों का एक सिलसिला है जो दूर तक फैलता चला गया है। इमारतों में कई छोटे बड़े दफ़्तर हैं जिनमें कम-ओ-बेश चार हज़ार आदमी काम करते हैं। दिन के वक़्त इस इलाक़े की चहल पहल और गहमा गहमी उमूमन कमरों की चार दीवारियों ही में महदूद रहती है। मगर सुबह को साढे़ दस बजे से पहले और सह-पहर को साढे़ चार बजे के बाद वो सीधी और चौड़ी चकली सड़क जो शहर के बड़े दरवाज़े से उस इलाक़े तक जाती है, एक ऐसे दरिया का रूप धार लेती है जो पहाड़ों पर से आया हुआ और अपने साथ बहुत सा ख़स-ओ-ख़ाशाक बहा लाया हो।
गर्मी का ज़माना, सह-पहर का वक़्त, सड़कों पर दरख़्तों के साए लंबे होने शुरू हो गए थे मगर अभी तक ज़मीन की तपिश का ये हाल था कि जूतों के अंदर तलवे झुलसे जाते थे। अभी अभी एक छिड़काव गाड़ी गुज़री थी। सड़क पर जहाँ जहाँ पानी पड़ा था बुख़ारात उठ रहे थे।

शरीफ़ हुसैन क्लर्क दर्जा दोम, मामूल से कुछ सवेरे दफ़्तर से निकला और उस बड़े फाटक के बाहर आ कर खड़ा हो गया जहाँ से ताँगे वाले शहर की सवारियाँ ले जाया करते थे।
घर लौटते हुए आधे रास्ते तक ताँगे में सवार हो कर जाना एक ऐसा लुत्फ़ था जो उसे महीने के शुरू के सिर्फ़ चार पाँच रोज़ ही मिला करता था और आज का दिन भी उन्ही मुबारक दिनों में से एक था। आज खिलाफ़-ए-मामूल तनख़्वाह के आठ रोज़ बाद उसकी जेब में पाँच रुपये का नोट और कुछ आने पैसे पड़े थे। वजह ये थी कि उसकी बीवी महीने के शुरू ही में बच्चों को ले कर मैके चली गई थी और घर में वो अकेला रह गया था। दिन में दफ़्तर के हलवाई से दो-चार पूरियाँ ले कर खा ली थीं और ऊपर से पानी पी कर पेट भर लिया था। रात को शहर के किसी सस्ते से होटल में जाने की ठहराई थी। बस बे-फ़िकरी ही बेफ़िकरी थी। घर में कुछ ऐसा असासा था नहीं जिसकी रखवाली करनी पड़ती। इसलिए वो आज़ाद था कि जब चाहे घर जाए और चाहे तो सारी रात सड़कों पर घूमता रहे। [...]

आज के लैला मजनूँ

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एक थी लैला, एक था मजनूँ। मगर लैला का नाम लैला नहीं था, लिली था, लिली डी सूज़ा।
वो दोनों और उनके क़बीले सहरा-ए-अरब में नहीं रहते थे। माहिम और बांद्रा के बीच में सड़क के नीचे और खारी पानी की खाड़ी के किनारे जो झोंपड़ियों की बस्ती है वहाँ रहते थे। मगर सहरा-ए-अरब की तरह इस बस्ती में भी पानी की कमी थी। डेढ़ सौ झोंपड़ियों में जो सात सौ मर्द, औरतें और बच्चे रहते थे। इन सब के लिए मीठे पानी का सिर्फ़ एक नल था और इस नल में सिर्फ़ दो घंटे सुब्ह और दो घंटे शाम को पानी आता था। एक कनस्तर या एक घड़ा पानी लेने के लिए कई कई घंटे पहले से लाईन लगानी पड़ती थी।

एक रात को मोहन झोंपड़ी में अपने बाप की खटिया के नीचे सो रहा था कि उसकी माँ ने उसे झिंझोड़ कर उठाया। “मोहन, ए मोहन जा, नल पर अपनी गागर लाईन में रख के आ, नहीं तो पानी नहीं मिलेगा।”
मोहन की उम्र उस वक़्त मुश्किल से नौ बरस की होगी और नौ बरस के बच्चे को जो दिन-भर कीचड़ मिट्टी में दौड़ता भागता रहा हो, बड़ी पक्की नींद आती है। आधी रात को उसे उठाना आसान नहीं है। [...]

शलजम

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“खाना भिजवा दो मेरा, बहुत भूक लग रही है।”
“तीन बज चुके हैं, इस वक़्त आपको खाना कहाँ मिलेगा?”

“तीन बज चुके हैं तो क्या हुआ, खाना तो बहरहाल मिलना ही चाहिए। आख़िर मेरा हिस्सा भी तो इस घर में किसी क़दर है।”
“किस क़दर है?” [...]

ऊपर नीचे और दरमियान

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मियाँ साहब: बहुत देर के बा’द आज मिल बैठने का इत्तेफ़ाक़ हुआ है।
बेगम साहिबा: जी हाँ,

मियाँ साहब: मस्रूफ़ियतें... बहुत पीछे हटता हूँ मगर ना-अह्ल लोगों का ख़याल करके क़ौम की पेश की हुई ज़िम्मेदारियाँ सँभालनी ही पड़ती हैं।
बेगम साहिबा: अस्ल में आप ऐसे मुआमलों में बहुत नर्म दिल वाक़े हुए हैं, बिल्कुल मेरी तरह। [...]

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