निगरानी में

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'अ' अपने दोस्त 'ब' को अपना हम-मज़हब ज़ाहिर करके उसे महफ़ूज़ मक़ाम पर पहुंचाने के लिए मिल्ट्री के एक दस्ते के साथ रवाना हुआ।
रास्ते में 'ब' ने जिसका मज़हब मस्लिहतन बदल दिया गया था। मिल्ट्री वालों से पूछा,

“क्यूँ जनाब आस पास कोई वारदात तो नहीं हुई?”
जवाब मिला, “कोई ख़ास नहीं… फ़लां मोहल्ले में अलबत्ता एक कुत्ता मारा गया।” [...]

सफ़ाई पसंदी

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गाड़ी रुकी हुई थी। तीन बंदूक़्ची एक डिब्बे के पास आए।
खिड़कियों में से अंदर झांक कर उन्हों ने मुसाफ़िरों से पूछा,

“क्यूँ जनाब कोई मुर्ग़ा है।”
एक मुसाफ़िर कुछ कहते कहते रुक गया। बाक़ियों ने जवाब दिया, [...]

कस्र-ए-नफ़्सी

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चलती गाड़ी रोक ली गई। जो दूसरे मज़हब के थे उनको निकाल निकाल कर तलवारों और गोलियों से हलाक कर दिया गया।
इससे फ़ारिग़ हो कर गाड़ी के बाक़ी मुसाफ़िरों की हलवे, दूध और फलों से तवाज़ो की गई।

गाड़ी चलने से पहले तवाज़ो करने वालों के मुंतज़िम ने मुसाफ़िरों को मुख़ातब करके कहा,
“भाईयो और बहनो! हमें गाड़ी की आमद की इत्तिला बहुत देर में मिली। यही वजह है कि हम जिस तरह चाहते थे उस तरह आपकी ख़िदमत न कर सके।” [...]

टोबा टेक सिंह

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बटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदोस्तान की हुकूमतों को ख़्याल आया कि अख़लाक़ी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसलमान पागल, हिंदोस्तान के पागलख़ानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाये और जो हिंदू और सिख, पाकिस्तान के पागलख़ानों में हैं उन्हें हिंदोस्तान के हवाले कर दिया जाये।
मालूम नहीं ये बात माक़ूल थी या ग़ैरमाक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर उधर ऊंची सतह की कांफ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुक़र्रर हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गई। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदोस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए थे। जो बाक़ी थे, उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया।

यहां पाकिस्तान में चूँकि क़रीब-क़रीब तमाम हिंदू-सिख जा चुके थे इसीलिए किसी को रखने रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।
उधर का मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहौर के पागलखाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चेमिगोईयां होने लगीं। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बाक़ायदगी के साथ 'ज़मींदार' पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा, “मौलबी साब! ये पाकिस्तान क्या होता है?” तो उसने बड़े ग़ौर-ओ-फ़िक्र के बाद जवाब दिया, “हिंदोस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।” ये जवाब सुन कर उसका दोस्त मुतमइन हो गया। [...]

बचनी

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भंगिनों की बातें हो रही थीं। ख़ासतौर पर उनकी जो बटवारे से पहले अमृतसर में रहती थीं। मजीद का ये ईमान था कि अमृतसर की भंगिनों जैसी करारी छोकरियां और कहीं नहीं पाई जातीं। ख़ुदा मालूम तक़सीम के बाद वो कहाँ तितर-बितर हो गई थीं।
रशीद उनके मुक़ाबले में गुजरियों की तारीफ़ करता था। उसने मजीद से कहा, “तुम ठीक कहते हो कि अमृतसरी भंगिनें अपनी जवानी के ज़माने में बड़ी पुरकशिश होती हैं, लेकिन उनकी ये जवानी ख़त्रानियों की तरह ज़्यादा देर तक क़ाएम नहीं रहती... बस एक दिन जवान होती हैं और देखते ही देखते अधेड़ हो जाती हैं... उनकी जवानी मालूम नहीं कौन सा चोर चुरा के ले जाता है।”

“ख़ुदा की क़सम... हमारे हाँ एक भंगिन कोठा कमाने आती थी, इतनी कड़ियल जवानी थी कि मैं अपनी कमज़ोर जवानी को महसूस कर के उससे कभी बात न कर सका...” ईसाई मिशनरियों ने उसे अपने मज़हब में दाख़िल कर लिया था।
“नाम उसका फ़ातिमा था। पहले घर वाले उसे फातो कहते थे... मगर जब वो ईसाई हुई तो उसे मिस फातो के नाम से पुकारा जाने लगा। सुबह को वो ब्रेकफास्ट करती थी, दोपहर को लंच और शाम को डिनर... लेकिन चंद महीनों के बाद मैंने उसे देखा कि उसकी सारी कड़ियल जवानी जैसे पिघल गई है... उसकी छातियां जो बड़ी तंद-ख़ू थीं और इस तरह ऊपर उठती रहती थीं जैसे अभी अपना सारा जवान बदन आप पर दाग़ देंगी, इस क़दर नीचे ढलक गई थीं कि उनका नाम-ओ-निशान भी नहीं मिलता था।” [...]

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