शातिर की बीवी

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(1)
उम्दा किस्म का सियाह-रंग का चमकदार जूता पहन कर घर से बाहर निकलने का असल लुतफ़ तो जनाब जब है जब मुँह में पान भी हो, तंबाकू के मज़े लेते हुए जूते पर नज़र डालते हुए बेद हिलाते जा रहे हैं। यही सोच कर में जल्दी-जल्दी चलते घर से दौड़ा। जल्दी में पान भी ख़ुद बनाया। अब देखता हूँ तो छालीया नदारद। मैंने ख़ानम को आवाज़ दी कि छालीया लाना और उन्होंने उस्तानी जी को पुकारा। उस्तानी जी वापिस मुझे पुकारा कि वो सामने ताक़ में रखी है। मैं दौड़ा हुआ पहुंचा। एक रकाबी में कटी और बे कटी यानी साबित छालीया रखी हुई थी। सरौता भी रखा हुआ था और सुबे से ताज्जुब की बात ये कि शतरंज का एक रख़स भी छालीया के साथ कटा रखा था। इस के तीन टुकड़े थे। एक तो आधा और दो पाओ पाओ। साफ़ ज़ाहिर है कि छालीया के धोके में कतरा गया है, मगर यहां किधर से आया। ग़ुस्सा और रंज तो गुमशुदगी का वैसे ही था। अब रुख की हालत-ए-ज़ार जो देखी तो मेरा वही हाल हुआ जो अली-बाबा का क़ासिम की लाश को देखकर हुआ था। ख़ानम के सामने जा कर रकाबी जूं की तूं रख दी। ख़ानम ने भवें चढ़ा कर देखा और यक-दम उनके ख़ूबसूरत चेहरे पर ताज्जु-बख़ेज़ मुस्कुराहट सी आकर रख गई और उन्होंने मस्नूई ताज्जुब से उस्तानी जी की तरफ़ रकाबी करते हुए देखा। उस्तानी जी एक दम से भवें चढ़ा कर दाँतों तले ज़बान दाब के आँखें फाड़ दें, फिर संजीदा हो कर बोलीं,

जब ही तो मैं कहूं या अल्लाह इतनी मज़बूत और सख़्त छालीया कहाँ से आ गई। कल रात अंधेरे में कट गया। जब से रकाबी जूं की तूं वहीं रखी है।
अजी ये यहां आया कैसे ? मैंने तेज़ हो कर कहा। [...]

गूँगी मुहब्बत

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वो दोनों जवान थीं और ज़ाहिर है कि जवानी की बहार-आफ़रीनी हर निस्वानी पैकर के ख़द्द-ओ-ख़ाल में एक ख़ास शगुफ़्तगी और एक ख़ास दिल-आवेज़ी पैदा कर देती है... चुनाँचे वो दोनों हसीन भी थीं। दोनों के क़द भी क़रीबन-क़रीबन यकसाँ थे। दोनों की उ'म्रों में भी कोई ख़ास फ़र्क़ न था। एक की उ'म्र सोलह साल के क़रीब होगी और दूसरी की सत्रह या अठारह के लगभग।
मगर इन चीज़ों के बा-वजूद दोनों में बहुत बड़ा फ़र्क़ था। एक को फ़ितरतन हक़ हासिल था कि वो ख़ूब हँसे और हर वक़्त हँसती रहे और दूसरी दुनिया में सिर्फ़ इस ग़रज़ से पैदा हुई थी कि वो ख़्वाह हँसे या रोए लेकिन दूसरों को ज़रूर हँसाए। एक इशारों में अहकाम सादर करती थी और दूसरी उन अहकाम की बे-चून-ओ-चरा ता'मील कर देती थी और सबसे बढ़कर ये एक की ज़बान उसके मुँह में थी और दूसरी की ज़बान उसके हाथों के इशारों में।

एक का नाम था इंदिरा... काग़ज़ की एक मशहूर फ़र्म के वाहिद मालिक सेठ बद्रीप्रशाद की इकलौती बेटी... दूसरी का नाम था ज्योती... लेकिन ये नाम एक शख़्स भी न जानता था। आख़िर एक गूँगी लड़की का नाम मा'लूम करने की ज़रूरत भी क्या है? जिस तरह हर शख़्स गूँगी के नाम से वाक़िफ़ था। उसी तरह वो ये भी नहीं जानता था कि वो किस ख़ानदान से तअ'ल्लुक़ रखती है और उसके वालिदैन कौन थे। इंदिरा ने दो एक-बार उसके ख़ानदानी हालात मा'लूम करने की मा'मूली कोशिश की। मगर जब देखा कि इस सिलसिले में हर कोशिश फ़ुज़ूल है। तो उसने जाँच पड़ताल करने का इरादा ही दिल से निकाल दिया।
कोई औ'रत भी ख़ास तौर पर अपनी ख़ादिमा के ख़ानदानी हालात मा'लूम करने के लिए ज़ियादा तग-ओ-दव नहीं करती। फिर इंदिरा को क्या पड़ी थी कि वो अपनी गूँगी ख़ादिमा के हालात दरियाफ़्त करती? उसके लिए यही काफ़ी था कि उसके घर में एक गूँगी लड़की ज़िंदगी के दिन गुज़ार रही है जो उसकी ख़ादिमा भी है और ज़रीआ-ए-तफ़रीह भी। [...]

रज़्ज़ो बाजी

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सीतापुर में तहसील सिधाली अपनी झीलों और शिकारियों के लिए मशहूर थी। अब झीलों में धान ‎बोया जाता है। बंदूक़ें बेच कर चक्कियाँ लगाई गई हैं, और लाइसेंस पर मिले हुए कारतूस “ब्लैक” कर ‎के शेरवानियाँ बनाई जाती हैं। यहाँ छोटे-छोटे क़स्बों का ज़ंजीरा फैला हुआ था, जिनमें शुयूख़ आबाद ‎थे जो अपने मफ़रूर माज़ी की याद में नामों के आगे ख़ान लगाते थे और हर क़िस्म के शिकार के ‎लिए गुंडे, कुत्ते और शिकरे पालते थे।
उनमें सारनपुर के बड़े भैया रखू चचा और छोटे भैया पाचू चचा बहुत मुमताज़ थे। मैंने रखू चचा का ‎बुढ़ापा देखा है। उनके सफ़ेद अबरुओं के नीचे टर्नती आँखों से चिनगारियाँ और आवाज़ से लपटें ‎निकलती थीं। रज़्ज़ो बाजी उन्ही रखू चचा की इकलौती बेटी थीं। मैंने लड़कपन में रज़्ज़ो बाजी के ‎हुस्न और उस जहेज़ के अफ़साने सुने थे, जिसे उनकी दो सौतेली साहिब-ए-जायदाद माएँ जोड़-जोड़ ‎कर मर गई थीं। शादी-ब्याह की महफ़िलों में मीरासनें इतने लक़लक़े से उनका ज़िक्र करतीं कि टेढ़े ‎बेनचे लोग भी उनकी ड्योढ़ी पर मंडलाने लगते।

जब रज़्ज़ो बाजी की माँ मर गईं और रखू चचा पर फ़ालिज गिरा तो उन्होंने मजबूर हो कर एक ‎रिश्ता क़ुबूल कर लिया। मगर रज़्ज़ो बाजी पर ऐ’न-मंगनी के दिन जिन्नात आ गए और रज़्ज़ो बाजी ‎की ड्योढ़ी से रिश्ते के 'कागा' हमेशा के लिए उड़ गए। जब रखू चचा मर गए तो पाचू चचा उनके ‎साथ तमाम हिंदोस्तान की दरगाहों का पैकरमा करते रहे लेकिन जिन्नातों को न जाना था, न गए। ‎फिर रज़्ज़ो बाजी की उ'म्र ऐसा पैमाना बन गई, जिसके क़रीब पहुँचने के ख़ौफ़ से सूखी हुई कुँवारियाँ ‎लरज़ उठतीं।
जब भी रज़्ज़ो बाजी का ज़िक्र होता, मेरे वुजूद में एक टूटा हुआ काँटा खटकने लगता और मैं अपने ‎यादों के कारवाँ को किसी फ़र्ज़ी मसरूफ़ियत के सहरा में धकेल देता। रज़्ज़ो बाजी का जब रजिस्ट्री ‎लिफ़ाफ़ा मुझे मिला तो मैं ऐसा बद-हवास हुआ कि ख़त फाड़ दिया। लिखा था कि वो हज करने जा ‎रही हैं और मैं फ़ौरन सारंगपुर पहुँच जाऊँ, लेकिन इस तरह कि गोया मैं उनसे नहीं पाचू चचा से ‎मिलने आया हूँ, और ये भी कि मैं ख़त पढ़ने के बा'द फ़ौरन जला दूँ। मैंने रज़्ज़ो बाजी के एक हुक्म ‎की फ़ौरी तामील कर दी। ख़त के शोलों के उस पार एक दिन चमक रहा था। पंद्रह साल पहले का ‎एक दिन जब मैं बी.ए. में पढ़ता था और मुहर्रम करने घर आया हुआ था। [...]

सबसे छोटा ग़म

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उसने तीनों तरफ़ की जालियों में बँधे हुए हज़ारों बल्कि लाखों धागों को देखा और उन में दस सवा दस साल क़ब्ल अपने बाँधे हुए धागे को तलाश करने लगी।
बाईं तरफ़ वाली जाली पर जिसके बाहर गेंदे के पीले पीले फूल और हार ढेर थे और बहुत से दिये जल रहे थे, उसने अपने धागे को पहचानने की कोशिश की। उसे ख़ूब अच्छी तरह याद था कि उस तरफ़ जाली के बिल्कुल कोने में उसने धागे में एक गिरह लगाई थी और फिर दूसरी गिरह जावेद ने। उसे ये भी याद था कि अभी उसकी उँगलियाँ पूरी तरह गिरह लगा भी न पाई थीं कि जावेद की उँगलियाँ वहाँ पहुँच गई थीं और उँगलियों के इस लम्स के बाद जावेद उसकी आँखों में झाँक कर मुस्कुराने लगा था और वो शर्मा कर नीचे देखने लगी थी।

लेकिन उनका बाँधा हुआ धागा कौन सा था? उस लम्हे उसे ख़याल आया कि उस वक़्त उस जगह शायद बहुत ज़ियादा भीड़ थी और जावेद ने आँखों ही आँखों में इशारा किया था और वो सामने वाली जाली पर चली गई थी। ये सोच कर उसने दर्मियान वाली जाली का रुख़ किया लेकिन क़दम आगे बढ़ाने से क़ब्ल उसने एक-बार फिर उस जाली पर नज़र डाली जैसे वो अपना बाँधा हुआ धागा पहचान ही तो लेगी।
दूसरी जाली पर पहुँचते-पहुँचते उसे ऐसा लगा जैसे पहली जाली पर जा कर उसने ग़लती की थी और उसे उसकी याद-दाश्त ने धोका दिया था। धागा तो उसने यहीं बाँधा था, बिल्कुल कोने में। लेकिन यहाँ भी लाखों धागे बंधे थे। किसी में एक गिरह थी, किसी में दो। उनमें उसका अपना कौन सा था? उसने कोने के धागों पर हाथ फेरा, आहिस्ता-आहिस्ता, जैसे जावेद के हाथों के लम्स से वो अपने धागे को पहचान ही तो लेगी। लेकिन कहीं ख़्वाहिशों की गर्मी थी, कहीं आरज़ूओं की नर्मी और कहीं मायूसियों की तारीकी और मसाइब की सख़्ती। [...]

वापसी का टिकट

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इंसान ने इंसान को ईज़ा पहुँचाने के लिए जो मुख़्तलिफ़ आले और तरीक़े इख़्तियार किए हैं उनमें सबसे ज़ियादा ख़तरनाक है टेलीफ़ोन साँप के काटे का मंत्र तो हो सकता है मगर टेलीफ़ोन के मारे को तो पानी भी नहीं मिलता।
मुझे तो रात-भर इस कम्बख़्त के डर से नींद नहीं आती कि सुब्ह-सवेरे न जाने किस की मनहूस आवाज़ सुनाई देगी। दो ढ़ाई बजे आँख लग भी गई तो ख़्वाब में क्या देखता हूँ कि सारी दुनिया की घंटियाँ और घंटे-घड़ियाल बेक-वक़्त बजने शुरू’ हो गए। मंदिरों के पीतल के बड़े-बड़े घंटे, पुलिस के थाने का घड़ियाल, दरवाज़ों की बिजली वाली घंटियाँ, साईकलों की ट्रिंग-ट्रिंग, फ़ायर इंजनों की क्लिंग-क्लिंग। और जब आँख खुलती है तो मा’लूम होता है कि टेलीफ़ोन की घंटी बज रही है। इस ग़ैर वक़्त रात को किस का फ़ोन आया है? ज़रूर ट्रंक काल होगी। पल-भर में न जाने कितने वहम दिल धड़काते हैं। एक दोस्त मद्रास में बीमार है। एक रिश्तेदार लंदन और बंबई के दरमियान हवाई जहाज़ में है। भतीजे का मैट्रिक का नतीजा निकलने वाला है।

मैं फ़ोन उठाकर कहता हूँ, “हैलो।”
दूसरी तरफ़ से घबराई हुई आवाज़ आती है, “चुन्नी भाई, केम छो।” मैं कहता हूँ कि यहाँ न कोई चुन्नी भाई है न केम छो। मगर वो कहता है, “चुन्नी भाई। टाटा डलीज़ डार पर जा रहा है।” मैं कहता हूँ, “जाने दो।” [...]

रूपा

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नीम सार से आगे क्रिया के अंधेरे जंगल के निकलते ही गोमती मग़रूर हसीनाओं की तरह दामन उठाकर चलती है... दूर तक फैले हुए रेतीले चमचमाते दामन में नबी नगर घड़ा है जैसे किसी बद-शौक़ रईस-ज़ादे ने अपने बुर्राक़ कपड़ों पर चिकनी मिट्टी से भरी हुई दवात उंडेल ली हो। मिट्टी के टूटे-फूटे मकान बचे खुचे छप्परों की टोपियाँ पहने बड़े फूहड़पने से बैठे हैं।
यह गाँव अवध के देहातों की ज़िद है। इसके गिर्द न तो बाँसी की वो घनी बाढ़ है जिसमें फँस कर सांप मर जाते हैं, न छतनार पीपलों और झलदारे बरगदों के वो ख़ामोश शामियाने हैं जिनके कुंजों में गालों के गुलाब और होंटों के शहतूत उगते हैं, न वो चौड़े चकले पनघट हैं जहाँ कुकरे बजाती पनिहारिनों के पैरों के बिछुवे अपने घुंघरुओं के डंक उठाए राहगीरों की राह तका करते हैं मगर दूर दूर तक यह गाँव जाना जाता है। यहाँ की भैंसें मशहूर हैं। यहाँ के गद्दी मशहूर हैं। यहाँ का रजब मशहूर है। सारंग आबाद राज का हाथी... वहाँ बड़हल के पेड़ों के झंडे के नीचे तक आकर रुक जाता है... कि हाथी के पैरों बराबर ऊँची दीवारों के पीछे कुलेलें करती हुई ग़रीब रानियों के खुले ढ़ले जिस्मों पर निगाहों की गर्द न पड़ जाये।

(2)
दस-बारह बरस का रजब अपने बाप के साथ सारंग आबाद राज की भैंसें लगाए गढ़ी जाया करता था। अपनी भूरी भैंसें लगाकर उसने अंगड़ाई ली तो सलीक़े के श्लोके का बटन चट से टूट कर गिर पड़ा। बटन उठाकर निगाह उठाई तो बौखला गया। सरकार खड़े हुए घूर रहे थे उसने जल्दी से सलाम कर लिया। [...]

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