आदमी

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खिड़की के नीचे उन्हें गुज़रता हुआ देखता रहा। फिर यकायक खिड़की ज़ोर से बंद की। मुड़कर पंखे का बटन ऑन किया। फिर पंखे का बटन ऑफ़ किया। मेज़ के पास कुर्सी पे टिक कर धीमे से बोला, “आज तवक्कुल से भी ज़ियादा हैं। रोज़ बढ़ते ही जा रहे हैं।”
सरफ़राज़ ने हथेलियों पर से सर उठाया और अनवार को देखा, “तुमने तो दो ही दिन देखा है ना। मैं बहुत दिन से देख रहा हूँ। खिड़की बंद रखूँ तो घुटन होती है, खोल दूँ तो दिल और ज़ियादा घबराता है। लगता है जैसे सब इधर ही आ रहे हों।”

सरफ़राज़ चुप हो गया। फिर एक लम्हे के बा’द बोला, “आज तुमसे इतने बरसों के बा’द मुलाक़ात हुई थी तो दिल कितना ख़ुश था कि फिर ये लोग...”
“मैंने तुम्हें सफ़र का वाक़ि’आ भी तो बता दिया था। मैं भी सिर्फ़ दो ही दिन से थोड़े ही देख रहा हूँ। उधर गाँव में भी आजकल यही ‘आलम है। कुछ अंदाज़ा ही नहीं हो पाता क्या होगा।” [...]

दो मुंही

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सोचती हूँ कि मैं त्याग क्लीनिक में गई ही क्यों? क्या फ़ायदा हुआ भला? अपनी बीमारी दूर कराने के लिए गई थी, सारी मख़लूक़ को बीमार कर के आ गई। वही बात हुई ना। बुढ़िया बुढ़िया तेरा कूबड़ दूर हो जाये या सारी दुनिया कुबड़ी हो जाये।
लेकिन त्याग बीती सुनाने से पहले में अपना तआरुफ़ तो करा लूं। मैं सांवरी हूँ। तीस साल की। सलमान से मैरिज हुए दो साल हुए हैं। लव मैरिज थी। मेरे ख़द्द-ओ-ख़ाल आम से हैं यानी एवरेज से कुछ बेहतर। हाँ ज़ेह्न की तीखी हूँ। काठी मज़बूत है जिस्म तना तना... लेकिन नहीं मैं ग़लत बयानी कर रही हूँ। कस्र-ए-नफ़सी से काम ले रही हूँ। मेरे ख़द्द-ओ-ख़ाल एवरेज सही लेकिन मुझमें बड़ा चार्म है। राह चलते सर उठा कर, गर्दन मोड़ मोड़ कर देखते हैं तो यूं देखते हैं जैसे सर से पांव तक उल्लू के पट्ठे बन गए हों। बस में नहीं रहते, कन्ट्रोल्ज़ हाथ से छूट जाते हैं। डोलते हैं, पतवार छूट जाये तो कश्ती डोलती है ना।

मैं लड़कीपन से निकल आई हूँ। लेकिन अभी लड़की ही हूँ। औरत नहीं बनी। अल्लाह न करे कि बनूँ।
अजीब सा आलम है। जैसे शाम को डिस्क होती है, रात नहीं पड़ी। दिन भी नहीं रहा लेकिन दिन दिन सा लगता है। [...]

घर तक

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लिंगा
स्वामी

हम रास्ता भूल गए हैं। लेकिन मेरा ख़्याल है, हमारा गाँव यहाँ से क़रीब ही है। उधर देखिए स्वामी। सफ़ेद लकीर दिखाई दे रही है ना, वही होगी सड़क। नहीं वो तो पानी बह रहा है। एक छोटा सा नाला।
इधर आ, इस टीले पर चढ़ कर देखें। शायद कुछ पता चले। [...]

उसका पति

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लोग कहते थे कि नत्थू का सर इसलिए गंजा हुआ है कि वो हर वक़्त सोचता रहता है। इस बयान में काफ़ी सदाक़त है क्योंकि सोचते वक़्त नत्थू सर खुजलाया करता है।
उसके बाल चूँकि बहुत खुरदरे और ख़ुश्क हैं और तेल न मलने के बाइस बहुत ख़स्ता हो गए हैं, इसलिए बार बार खुजलाने से उस के सर का दरमियानी हिस्सा बालों से बिल्कुल बेनियाज़ हो गया है। अगर उसका सर हर रोज़ धोया जाता तो ये हिस्सा ज़रूर चमकता। मगर मैल की ज़्यादती के बाइस उसकी हालत बिल्कुल उस तवे की सी हो गई है जिस पर हर रोज़ रोटियां पकाई जाएं मगर उसे साफ़ न किया जाये।

नत्थू भट्टे पर ईंटें बनाने का काम करता था। यही वजह है कि वो अक्सर अपने ख़यालात को कच्ची ईंटें समझता था और किसी पर फ़ौरन ही ज़ाहिर नहीं किया करता था। उसका ये उसूल था कि ख़याल को अच्छी तरह पका कर बाहर निकालना चाहिए ताकि जिस इमारत में भी वो इस्तेमाल हो उसका एक मज़बूत हिस्सा बन जाये।
गांव वाले उसके ख़यालात की क़द्र करते थे और मुश्किल बात में उससे मशवरा लिया करते थे, लेकिन इस क़दर हौसला-अफ़ज़ाई से नत्थू अपने आपको अहम नहीं समझने लगा था। जिस तरह गांव में शंभू का काम हर वक़्त लड़ते-झगड़ते रहना था, उसी तरह उसका काम हर वक़्त दूसरों को मशवरा देते रहना था। [...]

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