जहाँ से आगे भी होगा कहीं कोई मंज़र ...
इस से पहले तो पुर-यक़ीं भी न थे ...
हम ऐसे लोग तिरा दर तलाश करते हैं ...
भरोसा किस ने तोड़ा है हमारा ...
बहुत ख़ुशी भी अगर हो ख़ुशी नहीं होती ...
बदन से मावरा हो कर कोई रिश्ता बना लेगा ...
अब हैरतों से बचने की सूरत कहाँ से लाए ...
आँखें तुम्हारे साथ हैं मंज़र तुम्हारे साथ ...
आज फिर दर्द है एहसास है तन्हाई है ...
ज़िंदा रहने को भी लाज़िम है सहारा कोई ...
तुझ को लगता है 'आरज़ी दुख है ...
ख़िज़ाँ के दौर में खिलती बहार मेरे लिए ...
झील सी आँख को दरियाओं का धारा कर के ...
इस से ही बाक़ी है साँसों की रवानी लोगो ...
हम ने जज़्बात को सीने में दबा रक्खा है ...
हिज्र में वस्ल के इम्कान बना सकते हैं ...
गर मोहब्बत हो तो ऐसा नहीं करते जानाँ ...
दिल में रह जाते हैं सब लोग भुलाने वाले ...
चार-सू है ये कैसी ख़ामोशी ...
शहर-ए-दिल काश कि इक शहर-ए-तमन्ना होता ...