इक झलक में ले गई सब लूट कर अच्छा लगा ...
बस एक उन के ही आने का इंतिज़ार हुआ ...
हर हर शजर उमीद था हर हर शजर था यास ...
दिल में जलते हैं हसरतों के अलाव ...
ज़हे-नसीब कि दुनिया ने तेरे ग़म ने मुझे
यहाँ हर शाम ...
पती के साथ में ...
साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया
ये दवा उस ने लिखी है मिरी बेज़ारी की ...
इस भरोसे पे कि शायद कोई आए घर में ...
हर मुन्हरिफ़ निगाह को क़ाइल किया गया ...
बदल के रुख़ कोई मंज़र रफ़ू किया जाए ...
अब यहीं से ज़वाल है उस का ...
ऊँचाइयों से ख़ाक में उतरे हुए भी देख ...
तुम को ख़ुद अपनी ज़ात का मतलब नहीं पता ...
तेरे बग़ैर कोई गवारा नहीं किया ...
शहर-ओ-बाज़ार से निकल आए ...
पिंजरे से क़फ़स से तो कभी जाल से उभरे ...
क्या क्या तिरे फ़िराक़ में यूँ कर नहीं गया ...
दूर निकला है उफ़ुक़ पर कहीं तारा कोई ...