मस्लहत के साथ थे चालाक होना ही पड़ा ...
मशक़्क़त का पसीना ख़ून में तहलील होता है ...
मैं तेरे सामने फ़रियाद करने वाला नहीं ...
लीजिए हम बादशाहों से भी ऊपर हो गए ...
क्या सितम है कि मदद-गार समझ लेते हैं ...
कोई बताए उसे हम-नशीन कैसे करें ...
कितनी सुख़न की महफ़िलें आबाद कर गया ...
'इश्क़ ने ख़ूब इंतिक़ाम लिया ...
'इश्क़ के ज़माने भी क्या 'अजब ज़माने थे ...
हज़ार ज़ख़्म मिले फिर भी मुस्कुराते हुए ...
हवा मिज़ाज बदलती है तब बिखरते हैं ...
हमीं अकेले नहीं ज़िंदगी से हारे हुए ...
हमारे हिस्सा में कुछ ऐसे हम-सफ़र आए ...
हैरान मेहरबान के रूमाल हो गए ...
फ़क़त ज़मीं ही नहीं आसमान मेरा है ...
इक दूसरे का हाथ भी पकड़े हुए हैं लोग ...
दिल-ओ-दिमाग़ पे अब के घुटन बला की है ...
दरवाज़ा तो बंद किया है 'आली-जाह ...
दरिया से फ़क़त इस लिए रिश्ता है हमारा ...
छोड़ कर तुझ को कहीं और निकल सकते थे ...